आदिवासी छात्रों का भविष्य लील गई प्राचार्य की तानाशाही, राष्ट्रीय छात्रवृत्ति परीक्षा में एक भी पंजीयन नही, अंतिम तिथि खत्म

आदिवासी छात्रों का भविष्य लील गई प्राचार्य की तानाशाही, राष्ट्रीय छात्रवृत्ति परीक्षा में एक भी पंजीयन नही, अंतिम तिथि खत्म

* बड़ी तुम्मी विद्यालय का मामला, प्राचार्य पर कार्यवाही की मांग*


अनूपपुर

आदिवासी विकासखंड पुष्पराजगढ़ के आदिवासी अंचल स्थित शासकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय बड़ी तुम्मी में प्राचार्य की तानाशाही ने कक्षा 8वीं के 12 गरीब आदिवासी छात्रों के भविष्य को अंधकार में डाल दिया है।

राज्य शिक्षा केंद्र की महत्वपूर्ण योजना राष्ट्रीय आय-सह-मेधा छात्रवृत्ति परीक्षा 2026-27 जो कक्षा 8वीं के छात्रों के लिए आयोजित की जानी थी, उसमें बड़ी तुम्मी विद्यालय में अध्ययनरत 12 छात्रों का पंजीयन होना था, लेकिन पंजीयन न होने के कारण इन सभी छात्रों के भविष्य में अंधकार के बादल छा गए हैं। यह योजना चयनित गरीब छात्रों को कक्षा 9वीं से 12वीं तक प्रतिवर्ष 12 हजार रुपये वार्षिक छात्रवृत्ति देती है।

विकासखंड स्रोत समन्वयक हर प्रसाद तिवारी द्वारा 22 अगस्त 2026 को जारी प्रगति प्रतिवेदन के अनुसार पडमनिया संकुल के 10 विद्यालयों ने जहाँ शत-प्रतिशत लक्ष्य पूरा कर लिया है, वहीं बड़ी तुम्मी में 12 छात्रों के लक्ष्य के विरुद्ध एक भी पंजीयन नहीं हुआ और अब अंतिम तिथि समाप्त होने से पंजीयन की कोई संभावना नहीं बची है।

राष्ट्रीय छात्रवृत्ति प्रतियोगिता परीक्षा में छात्रों के पंजीयन की जिम्मेदारी संबंधित प्राचार्य के पासवर्ड लॉगिन से होनी थी, किन्तु आदिवासी छात्रों को सबक सिखाने के लिए बैठे प्राचार्य ने छात्रों का पंजीयन न कर राष्ट्रीय आय-सह-मेधा छात्रवृत्ति परीक्षा में सिर्फ उन्हें बाहर का रास्ता नहीं दिखाया अपितु इन छात्रों के सुनहरे भविष्य में कील ठोंक कर उन्हें गरीबी और कंगाली की ओर ढकेल दिया है।

ग्रामीणों का कहना है कि गत वर्ष भी प्राचार्य ने एक भी पंजीयन नहीं कराया था जिसकी शिकायत आयुक्त शहडोल संभाग और मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में हुई थी लेकिन शिक्षा विभाग ने कोई कार्यवाही नहीं की। कार्यवाही न होने से प्राचार्य के हौसले बुलंद हैं और इस वर्ष भी वही लापरवाही दोहराई गई।

अब पालकों का साफ कहना है कि इस घोर लापरवाही के लिए प्राचार्य पर कड़ी कार्यवाही होनी चाहिए, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि शिक्षा विभाग क्या करेगा, क्योंकि पिछले साल कार्यवाही न होने के कारण ही छात्रों का मनोबल पूरी तरह टूट चुका है और वे खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। लगातार दो साल से आदिवासी छात्रों को प्राचार्य की तानाशाही की कीमत चुकानी पड़ रही है। न जाने इतनी महत्वपूर्ण शासन की योजना में लापरवाही बरतने के बावजूद जिले के आला अधिकारी और राज्य स्तर के अधिकारी एक प्राचार्य के सामने बौने साबित हो रहे हैं।

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