दैनिक रुस्तम-ए-हिन्द, संविधान जनता का है, सत्ता जनता की अमानत है और प्रत्येक सार्वजनिक पद जवाबदेही का दायित्व है
दैनिक रुस्तम-ए-हिन्द
संविधान जनता का है, सत्ता जनता की अमानत है और प्रत्येक सार्वजनिक पद जवाबदेही का दायित्व है।
*प्रधानमंत्री से लेकर पुलिसकर्मी तक, सांसद से लेकर न्यायाधीश तक और मीडिया से लेकर सुरक्षा एजेंसियों तक—हर संस्था को याद रखना होगा कि लोकतंत्र में अधिकारों के साथ कर्तव्य भी आते हैं*
*न्यू दिल्ली से पत्रकार ऊषा माहना*
भारत की स्वतंत्रता लाखों लोगों के संघर्ष, त्याग और बलिदान से प्राप्त हुई। संविधान निर्माताओं ने एक ऐसी व्यवस्था स्थापित की जिसमें किसी राजा, परिवार, राजनीतिक दल, धार्मिक संगठन अथवा शक्तिशाली व्यक्ति को देश का मालिक बनने का अधिकार नहीं है।
भारत का नागरिक किसी प्रधानमंत्री की प्रजा नहीं है। वह एक स्वतंत्र गणराज्य का नागरिक है। उसका सम्मान किसी नेता की कृपा पर निर्भर नहीं है। उसके अधिकार किसी राजनीतिक दल की सदस्यता से नहीं मिलते। उसके मौलिक अधिकार संविधान से संरक्षित हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों अथवा कोई अन्य प्रधानमंत्री, भारतीय जनता पार्टी की सरकार हो अथवा किसी अन्य दल की सरकार—भारत के संविधान और कानून की कसौटी सभी के लिए समान होनी चाहिए।
सत्ता जनता की अमानत है, सार्वजनिक पद निजी विशेषाधिकार नहीं और वर्दी कानून से ऊपर होने का प्रमाणपत्र नहीं है।
यही इस सम्पादकीय का मूल संदेश है।
संविधान सर्वोपरि : देश किसी व्यक्ति की निजी सम्पत्ति नहीं
भारतीय संविधान की प्रस्तावना भारत को सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य घोषित करती है और न्याय, स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुता के आदर्श स्थापित करती है।
संविधान का अनुच्छेद चौदह कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है। अनुच्छेद उन्नीस नागरिकों को निर्धारित संवैधानिक सीमाओं के अधीन अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण सभा और संगठन बनाने की स्वतंत्रता देता है। अनुच्छेद इक्कीस जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है।
इन प्रावधानों का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होगा जब एक साधारण नागरिक भी अपनी सरकार से निर्भीक होकर पूछ सके—
मेरे अधिकारों का उल्लंघन क्यों हुआ?
मेरी शिकायत पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
मेरे परिवार को न्याय क्यों नहीं मिला?
मेरे शांतिपूर्ण प्रदर्शन को रोकने का कानूनी आधार क्या है?
मेरे नाम पर खर्च होने वाले सार्वजनिक धन का हिसाब कहाँ है?
और यदि कोई अधिकारी कानून तोड़ता है, तो उसके विरुद्ध कार्रवाई कौन करेगा?
इन प्रश्नों को उठाने वाला नागरिक लोकतंत्र का विरोधी नहीं है। वह लोकतंत्र को जवाबदेह बनाने की प्रक्रिया में भाग ले रहा है।
प्रधानमंत्री जनता के प्रति जवाबदेह हैं, जनता प्रधानमंत्री के प्रति अधीनस्थ नहीं
नरेंद्र मोदी वर्ष दो हजार एक में गुजरात के मुख्यमंत्री नियुक्त हुए। फरवरी दो हजार दो में उन्होंने राजकोट-द्वितीय विधानसभा उपचुनाव जीता। इसके बाद वर्ष दो हजार चौदह, दो हजार उन्नीस और दो हजार चौबीस के लोकसभा चुनावों के बाद वे प्रधानमंत्री बने।
इन घटनाओं का संवैधानिक क्रम सार्वजनिक अभिलेखों में उपलब्ध है। उनके प्रधानमंत्री बनने की प्रक्रिया को केवल इसलिए अवैध नहीं कहा जा सकता कि पहले उन्हें भारतीय जनता पार्टी के संसदीय दल ने अपना नेता चुना था। प्रधानमंत्री की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद पचहत्तर के अनुसार होती है।
लेकिन प्रधानमंत्री की नियुक्ति वैध होने का अर्थ यह नहीं कि उनके प्रत्येक निर्णय को वैध मान लिया जाए।
किसी सरकार की वैधता और उसके प्रत्येक कार्य की वैधता दो अलग प्रश्न हैं। चुनाव जीतने वाली सरकार भी न्यायिक समीक्षा, संसदीय निगरानी, नागरिक आलोचना और सार्वजनिक जवाबदेही के अधीन रहती है।
प्रधानमंत्री को अपनी सरकार के निर्णयों, सार्वजनिक खर्च, नीतिगत परिणामों और प्रशासनिक जवाबदेही पर प्रश्नों का सामना करना चाहिए।
इसी तरह, प्रधानमंत्री पर लगाए गए गंभीर आरोपों की जाँच भी प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए। न लोकप्रियता किसी व्यक्ति को कानून से ऊपर बनाती है, न राजनीतिक विरोध किसी व्यक्ति को अपने आप अपराधी सिद्ध करता है।
भारत को न अंधभक्ति चाहिए, न अंधविरोध—भारत को प्रमाण, विवेक और न्याय चाहिए।
चुनावी पारदर्शिता : मतदाता का विश्वास सर्वोपरि
नरेंद्र मोदी की वैवाहिक स्थिति, शैक्षणिक योग्यता और चुनावी हलफनामों को लेकर सार्वजनिक विवाद हुए हैं।
वर्ष दो हजार चौदह के चुनाव में उन्होंने जशोदाबेन का नाम पत्नी के रूप में दर्ज किया। इससे पहले के चुनावी नामांकन में वैवाहिक स्थिति का कॉलम खाली छोड़े जाने के बारे में समकालीन समाचार माध्यमों में रिपोर्टें प्रकाशित हुई थीं।
शैक्षणिक योग्यता के खुलासे के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय का महत्त्वपूर्ण निर्णय मई दो हजार दो में आया। इसलिए फरवरी दो हजार दो के उपचुनाव और उसके बाद के चुनावों के दस्तावेजों को अलग-अलग देखना आवश्यक है।
जाति के विषय में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग से संबंधित सरकारी वक्तव्य के अनुसार, मोढ-घांची समुदाय को गुजरात की राज्य सूची में वर्ष उन्नीस सौ चौरानवे और केंद्रीय अन्य पिछड़ा वर्ग सूची में वर्ष उन्नीस सौ निन्यानवे में शामिल किया गया था। इसलिए यह कहना कि नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद अपनी जाति को अन्य पिछड़ा वर्ग की सूची में शामिल कराया, उपलब्ध आधिकारिक विवरण से पुष्ट नहीं होता।
लेकिन चुनावी पारदर्शिता का व्यापक प्रश्न आज भी महत्त्वपूर्ण है।
हमारी माँग है कि उम्मीदवारों के मूल नामांकन-पत्र, हलफनामे, लागू नियम और संबंधित आधिकारिक निर्णय नागरिकों के लिए यथासंभव सुलभ हों। जहाँ किसी विवरण में विसंगति का आरोप है, वहाँ उसका सत्यापन हो। जहाँ नियमों का उल्लंघन प्रमाणित हो, वहाँ कानून के अनुसार कार्रवाई हो।
यह माँग केवल नरेंद्र मोदी के लिए नहीं है। हर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक और उम्मीदवार के लिए समान रूप से लागू होनी चाहिए।
मतदाता का विश्वास राजनीतिक प्रचार से नहीं, सत्यापन योग्य जानकारी से मजबूत होता है।
किसान आंदोलन : सरकार का कर्तव्य केवल कानून बनाना नहीं, जनता को सुनना भी है
वर्ष दो हजार बीस से दो हजार इक्कीस के किसान आंदोलन ने सरकार और नागरिकों के बीच संवाद की आवश्यकता को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया।
कृषि कानूनों के विरोध में हजारों किसान दिल्ली की सीमाओं पर एकत्र हुए। आंदोलन के दौरान किसान संगठनों ने सात सौ से अधिक किसानों की मृत्यु का दावा किया। दिसंबर दो हजार इक्कीस में केंद्र सरकार ने संसद में बताया कि कृषि मंत्रालय के पास आंदोलन के दौरान मृत किसानों का समेकित अभिलेख उपलब्ध नहीं था।
यह अंतर समझना आवश्यक है कि आंदोलन के दौरान हुई सभी मौतों को पुलिस कार्रवाई का परिणाम नहीं कहा जा सकता। मौतों के कारण अलग-अलग थे। फिर भी इतने बड़े आंदोलन में मृतकों का सत्यापन योग्य सार्वजनिक लेखा तैयार करने की माँग उचित है।
सरकार का दायित्व है कि वह नागरिकों की शिकायतों को सुने, संवाद करे और कानून-व्यवस्था बनाए रखते हुए मानवाधिकारों की रक्षा करे।
यदि किसी प्रदर्शन में पुलिस बल का दुरुपयोग हुआ, किसी व्यक्ति को गैरकानूनी ढंग से हिरासत में रखा गया या किसी परिवार को अनुचित नुकसान पहुँचा, तो उस घटना की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।
पुलिस का कार्य किसानों को शत्रु मानना नहीं है। पुलिस का कार्य कानून के अनुसार नागरिकों और सार्वजनिक व्यवस्था की रक्षा करना है।
किसान की आवाज सुनना सरकार की कमजोरी नहीं, लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है।
मणिपुर : नागरिकों की सुरक्षा राजनीति से ऊपर
मणिपुर में मई दो हजार तेईस से शुरू हुई जातीय हिंसा ने नागरिक सुरक्षा, विस्थापन, राहत और न्याय से जुड़े गंभीर प्रश्न पैदा किए।
जब नागरिक अपने घरों से विस्थापित हों, परिवार बिछुड़ जाएँ, महिलाओं के विरुद्ध गंभीर अपराधों की शिकायतें सामने आएँ और समुदायों के बीच विश्वास टूट जाए, तब शासन की जिम्मेदारी केवल बयान जारी करना नहीं रह जाती।
केंद्र सरकार, राज्य प्रशासन और संबंधित सुरक्षा एजेंसियों को नागरिकों की रक्षा, राहत, पुनर्वास, अपराधों की निष्पक्ष जाँच और न्यायिक प्रक्रिया में सहयोग के लिए जवाबदेह होना चाहिए।
हम माँग करते हैं कि प्रभावित परिवारों की स्थिति, दर्ज मामलों की प्रगति, राहत शिविरों की दशा और पुनर्वास की योजनाओं पर सत्यापन योग्य सार्वजनिक रिपोर्टें उपलब्ध कराई जाएँ।
किसी भी राजनीतिक दल को मणिपुर की पीड़ा को केवल अपने विरोधियों पर आरोप लगाने के लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। पीड़ित नागरिकों को न्याय और सुरक्षा मिलना सबसे महत्त्वपूर्ण है।
यदि हिंसा जारी है, तो ताजा और विश्वसनीय अभिलेखों के आधार पर उसकी वर्तमान स्थिति स्पष्ट की जाए। यदि कहीं शांति बहाल हुई है, तब भी न्याय और पुनर्वास के दायित्व समाप्त नहीं हो जाते।
विद्यार्थियों और युवाओं की आवाज को अपराध न समझा जाए
विद्यार्थियों के प्रदर्शन अक्सर भर्ती परीक्षाओं, प्रश्नपत्र लीक, परिणामों में अनियमितता, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था से संबंधित शिकायतों के कारण होते हैं।
एक विद्यार्थी के लिए परीक्षा वर्षों की मेहनत और परिवार की आर्थिक क्षमता से जुड़ी होती है। यदि किसी परीक्षा में अनियमितता का आरोप सामने आता है, तो संबंधित संस्था को प्रमाणों के आधार पर जाँच करनी चाहिए और परिणामों के बारे में स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए।
युवाओं को केवल इसलिए अपराधी नहीं समझा जा सकता कि वे सरकार से असहमत हैं।
यदि किसी प्रदर्शन में हिंसा होती है, तो हिंसा में शामिल व्यक्तियों की पहचान प्रमाणों के आधार पर की जाए। यदि पुलिस बल का प्रयोग आवश्यक हो, तो वह कानूनसम्मत, अनुपातिक और जवाबदेह होना चाहिए।
सरकार को युवाओं की शिकायतों का उत्तर देना चाहिए। जहाँ गलती हुई है, उसे स्वीकार कर सुधार करना चाहिए। जहाँ आरोप गलत हैं, वहाँ दस्तावेजों के आधार पर स्पष्टता देनी चाहिए।
युवा देश का भविष्य हैं। उनकी आवाज को सुनना राष्ट्र के भविष्य को सुनना है।
दस अक्टूबर का प्रदर्शन और निर्वाचन आयोग की जवाबदेही
मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर उठे विवादों ने निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और पारदर्शिता पर गंभीर सार्वजनिक प्रश्न खड़े किए हैं।
पच्चीस सितंबर दो हजार छब्बीस की समाचार रिपोर्ट के अनुसार, दो निर्वाचन आयुक्तों ने आयोग के कुछ निर्णयों पर कम से कम चौदह बार औपचारिक आपत्तियाँ दर्ज की थीं। दूसरी ओर, आयोग की ओर से निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाने की बात कही गई। इन परस्पर विरोधी दावों का समाधान मूल अभिलेखों, आयोग की प्रक्रिया और न्यायिक समीक्षा के आधार पर होना चाहिए।
नौ अक्टूबर दो हजार छब्बीस को प्रकाशित समाचारों के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने कॉकरोच जनता पार्टी और कुछ छात्र संगठनों के दस अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन को अनुमति देने से इनकार किया। पुलिस ने देर से सूचना दिए जाने, पिछले प्रदर्शन में शर्तों के कथित उल्लंघन और कानून-व्यवस्था की चिंताओं का हवाला दिया। प्रदर्शनकारियों और अन्य याचिकाकर्ताओं ने प्रतिबंध को चुनौती दी।
यहाँ पुलिस के बताए कारणों को भी दर्ज करना चाहिए और प्रदर्शनकारियों के संवैधानिक अधिकारों को भी।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय स्वतः अवैध नहीं होता, लेकिन उसे कानून के आधार, वास्तविक सुरक्षा आवश्यकता और अनुपातिकता की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
यदि किसी प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी जाती, तो प्रशासन को जहाँ संभव हो, वैकल्पिक स्थान या व्यवस्था पर विचार करना चाहिए। यदि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा एक सौ तिरसठ के अंतर्गत प्रतिबंध लागू हैं, तो उनके कानूनी आधार, दायरे और अवधि की समीक्षा की जानी चाहिए।
मतदाता सूची में किसी पात्र नागरिक का नाम गलत ढंग से हटाया गया है या नहीं, यह एक अलग और अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। प्रत्येक पात्र मतदाता को अपना नाम जाँचने, आपत्ति दर्ज करने और कानून के अनुसार अपील करने का वास्तविक अवसर मिलना चाहिए।
निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि उसके निर्णय प्रश्नों से परे हैं। और आयोग की आलोचना का अर्थ यह भी नहीं कि उसके विरुद्ध लगाए गए सभी आरोप स्वतः प्रमाणित हो जाते हैं।
मतदाता का अधिकार, निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता और प्रदर्शनकारी की स्वतंत्रता—तीनों की रक्षा आवश्यक है।**
सुरक्षा एजेंसियाँ : जनता की रक्षा के लिए, जनता को डराने के लिए नहीं
भारत की पुलिस, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल, जाँच एजेंसियाँ और अन्य सुरक्षा संस्थाएँ कानून लागू करने तथा नागरिकों की सुरक्षा के लिए गठित की गई हैं।
उनके पास शक्तियाँ हैं, लेकिन उन शक्तियों के साथ सीमाएँ और दायित्व भी हैं।
किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने, बल प्रयोग करने, तलाशी लेने या सार्वजनिक सभा को नियंत्रित करने के लिए कानून में निर्धारित आधार और प्रक्रिया का पालन होना चाहिए। किसी अधिकारी को अपनी वर्दी के कारण नागरिकों के साथ मनमाना व्यवहार करने का अधिकार नहीं मिलता।
ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान वर्ष उन्नीस सौ उन्नीस में जलियाँवाला बाग में जनरल डायर के नेतृत्व में हुई गोलीबारी भारत के इतिहास में राज्यसत्ता के दमन का भयावह उदाहरण है। स्वतंत्र भारत की पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों का उद्देश्य उस औपनिवेशिक मानसिकता से पूरी तरह अलग होना चाहिए।
यह तुलना किसी वर्तमान अधिकारी को बिना प्रमाण जनरल डायर के समान घोषित करने के लिए नहीं, बल्कि एक स्पष्ट चेतावनी के रूप में है।
कानून लागू करने वाली शक्ति कभी भी नागरिकों के सम्मान और जीवन के अधिकार को तुच्छ नहीं समझ सकती।
पुलिस का सम्मान जनता के विश्वास से बनता है। यह विश्वास तभी कायम होगा जब पुलिस निष्पक्ष हो, शिकायतों की जाँच करे, बल प्रयोग का उचित हिसाब दे और गलत कार्य करने वाले अधिकारियों को जवाबदेह ठहराए।
न्यायपालिका : स्वतंत्रता के साथ निष्पक्षता और सार्वजनिक विश्वास
न्यायपालिका सरकार का विभाग नहीं है। उसका स्वतंत्र संवैधानिक स्थान है और उसका प्रमुख दायित्व कानून के अनुसार न्याय करना है।
न्यायाधीशों को राजनीतिक दबाव से मुक्त रहना चाहिए। न्यायिक निर्णयों की आलोचना भी तथ्यों, कानून और सम्मानजनक भाषा के आधार पर होनी चाहिए।
यदि किसी न्यायिक निर्णय से असहमति है, तो अपील, पुनर्विचार और कानून में उपलब्ध अन्य उपाय अपनाए जा सकते हैं। किसी न्यायाधीश पर भ्रष्टाचार, पक्षपात या दबाव का आरोप तभी स्थापित माना जा सकता है जब पर्याप्त प्रमाण और उचित प्रक्रिया उपलब्ध हों।
इसी प्रकार न्यायपालिका की स्वतंत्रता के नाम पर न्यायिक जवाबदेही के वैध प्रश्नों को हमेशा के लिए बंद नहीं किया जा सकता।
न्यायपालिका का सम्मान उसके स्वतंत्र, निष्पक्ष और तर्कपूर्ण न्याय से मजबूत होता है।
मीडिया : सत्ता का प्रचारक नहीं, जनता का प्रहरी
मीडिया को लोकतंत्र का महत्त्वपूर्ण प्रहरी माना जाता है। उसका दायित्व सरकार, विपक्ष, उद्योग, प्रशासन और सार्वजनिक संस्थाओं के कार्यों की स्वतंत्र पड़ताल करना है।
मीडिया का अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक खबर सरकार के विरुद्ध हो। सरकार की वास्तविक उपलब्धियों को प्रकाशित करना भी पत्रकारिता है। लेकिन गलतियों, भ्रष्टाचार के आरोपों, मानवाधिकारों के उल्लंघन और सार्वजनिक धन के उपयोग की जाँच करना भी उतना ही आवश्यक है।
किसी पत्रकार पर दबाव डालने, धमकाने या उसके काम में बाधा डालने की शिकायत हो, तो उसकी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए। किसी मीडिया संस्थान को विज्ञापन, आर्थिक दबाव या राजनीतिक संबंधों के कारण तथ्यों से समझौता नहीं करना चाहिए।
साथ ही, पत्रकारिता को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। किसी व्यक्ति को अपराधी घोषित करने से पहले प्रमाण होना चाहिए। किसी मृत्यु को राजनीतिक षड्यंत्र बताने से पहले जाँच होनी चाहिए। किसी सरकारी कार्रवाई को अवैध कहने से पहले लागू कानून और आदेश का अध्ययन होना चाहिए।
मीडिया की विश्वसनीयता उसकी निर्भीकता और उसकी तथ्यात्मक ईमानदारी—दोनों से बनती है।
प्रधानमंत्री, मंत्रिमंडल, संसद और प्रशासन के लिए सार्वजनिक आचरण की कसौटी
प्रधानमंत्री और मंत्रियों का दायित्व है कि वे सार्वजनिक हित में निर्णय लें, संसद को उत्तर दें और अपने विभागों की जवाबदेही सुनिश्चित करें।
सांसदों और विधायकों का दायित्व है कि वे नागरिकों के हितों का प्रतिनिधित्व करें, कानूनों पर गंभीर विचार करें और सरकारी निर्णयों की निगरानी करें।
कार्यपालिका का दायित्व है कि वह कानून लागू करे, सेवाएँ प्रदान करे और नागरिकों की शिकायतों का समाधान करे।
न्यायपालिका का दायित्व है कि वह स्वतंत्र और निष्पक्ष न्याय करे।
मीडिया का दायित्व है कि वह तथ्य सामने लाए, सत्ता से प्रश्न पूछे और जनता को सत्यापित जानकारी उपलब्ध कराए।
निर्वाचन आयोग का दायित्व है कि वह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया सुनिश्चित करे।
पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों का दायित्व है कि वे कानून के अनुसार नागरिकों और सार्वजनिक व्यवस्था की रक्षा करें।
इन संस्थाओं के अधिकार अलग-अलग हैं, लेकिन उनके काम का मूल्यांकन संविधान, कानून, सार्वजनिक हित और जवाबदेही की कसौटी पर होना चाहिए।
हम केवल आलोचना नहीं, व्यवस्था में सुधार चाहते हैं
दैनिक रुस्तम-ए-हिन्द निम्नलिखित सार्वजनिक सुधारों की माँग करता है—
पारदर्शिता: सार्वजनिक निर्णयों, सरकारी खर्च और कानून-व्यवस्था से संबंधित आदेशों का कानून के अनुसार अधिकतम प्रकटीकरण हो।
2. स्वतंत्र जाँच: जहाँ गंभीर दुरुपयोग के विश्वसनीय प्रमाण हों, वहाँ निष्पक्ष और स्वतंत्र जाँच सुनिश्चित की जाए।
3. नागरिक अधिकार: शांतिपूर्ण प्रदर्शन, अभिव्यक्ति और वैधानिक शिकायत के अधिकारों की रक्षा की जाए।
4. पुलिस जवाबदेही: हिरासत, बल प्रयोग और मानवाधिकार संबंधी शिकायतों की स्वतंत्र समीक्षा हो तथा दोष सिद्ध होने पर उचित कार्रवाई की जाए।
5. चुनावी पारदर्शिता: उम्मीदवारों के हलफनामे, मतदाता सूची में परिवर्तन और निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़े अभिलेख सुलभ तथा सत्यापन योग्य हों।
6.पीड़ितों को न्याय: किसान आंदोलन, मणिपुर की हिंसा, विद्यार्थियों की शिकायतों और अन्य मामलों में पीड़ितों की स्थिति तथा न्यायिक प्रगति का पारदर्शी लेखा उपलब्ध हो।
7. संसदीय निगरानी: सार्वजनिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर संसद और संबंधित विधानसभाओं में गंभीर समीक्षा हो।
8. गवाहों की सुरक्षा: गंभीर अपराधों या सरकारी दुरुपयोग की जाँच में सहयोग करने वाले गवाहों को कानून के अनुसार संरक्षण मिले।
9. मीडिया की स्वतंत्रता:** पत्रकारों की सुरक्षा, सूचना तक पहुँच और स्वतंत्र तथ्य-जाँच के लिए प्रभावी व्यवस्था हो।
10. समान कानून: किसी भी व्यक्ति को उसके पद, राजनीतिक दल, धर्म, जाति, आर्थिक स्थिति या सामाजिक प्रभाव के कारण विशेष छूट न मिले।
11. हर सार्वजनिक पदाधिकारी को स्वयं से पूछना चाहिए
क्या मैंने अपने पद का उपयोग जनता की सेवा के लिए किया?
क्या मैंने किसी नागरिक की शिकायत को केवल इसलिए अनदेखा किया क्योंकि वह प्रभावशाली नहीं था?
क्या मैंने किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी के अधिकारों का सम्मान किया?
क्या मैंने सरकारी धन को जनता की अमानत समझा?
क्या मैंने अपने अधीनस्थ अधिकारियों से कानून के अनुसार काम करने की अपेक्षा की?
क्या मैंने अपनी गलती सामने आने पर उसे स्वीकार कर सुधार किया?
क्या मैंने किसी राजनीतिक या व्यक्तिगत निष्ठा को संविधान से ऊपर रखा?
यदि किसी अधिकारी को इन प्रश्नों का उत्तर अपने विवेक के सामने देना पड़े, तो उसे पद की शक्ति नहीं, अपने सार्वजनिक दायित्व की याद आनी चाहिए।
अपराधबोध केवल भाषण से नहीं पैदा होता। वह तब पैदा होता है जब व्यक्ति अपने कार्यों का सामना प्रमाणों, कानून और पीड़ितों के अनुभव के सामने करता है। लेकिन किसी को अपराधी घोषित करने और दंडित करने का अधिकार केवल उचित कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से ही प्रयोग किया जाना चाहिए।
हमारी माँग बदले की नहीं, जवाबदेही की है। हमारी माँग किसी संस्था को कमजोर करने की नहीं, उसे जनता के प्रति अधिक विश्वसनीय बनाने की है।
अंतिम संदेश : भारत की जनता को उसका संवैधानिक सम्मान मिलना चाहिए
भारत का लोकतंत्र किसी एक चुनाव, किसी एक प्रधानमंत्री या किसी एक राजनीतिक दल से बड़ा है।
सरकारें बदल सकती हैं। राजनीतिक बहुमत बदल सकते हैं। सार्वजनिक पदों पर नए लोग आ सकते हैं। लेकिन संविधान के मूल आदर्श स्थायी हैं।
किसान को अपनी शिकायत रखने का अधिकार है। विद्यार्थी को परीक्षा में निष्पक्षता माँगने का अधिकार है। नागरिक को अपने मताधिकार की रक्षा का अधिकार है। पत्रकार को तथ्यों की पड़ताल करने का अधिकार है। किसी भी व्यक्ति को कानून के अनुसार निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार है।
इसी प्रकार प्रत्येक नागरिक का दायित्व भी है कि वह शांतिपूर्ण, संवैधानिक और जिम्मेदार तरीके से अपने अधिकारों का उपयोग करे।
प्रधानमंत्री और मंत्रियों को याद रखना चाहिए कि सत्ता जनता से प्राप्त जनादेश के माध्यम से चलती है। संसद को याद रखना चाहिए कि वह नागरिकों के प्रतिनिधित्व के लिए है। प्रशासन को याद रखना चाहिए कि उसकी शक्तियाँ कानून से आती हैं। न्यायपालिका को याद रखना चाहिए कि न्याय की स्वतंत्रता और निष्पक्षता लोकतंत्र की आधारशिला हैं। मीडिया को याद रखना चाहिए कि जनता का विश्वास उसकी सबसे बड़ी पूँजी है। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को याद रखना चाहिए कि उनकी वर्दी जनता की रक्षा का दायित्व है, जनता पर मनमानी का अधिकार नहीं।
भारत में किसी भी व्यक्ति को बिना प्रमाण अपराधी नहीं कहा जाना चाहिए। लेकिन किसी भी व्यक्ति को उसके पद, शक्ति या लोकप्रियता के कारण विश्वसनीय आरोपों की निष्पक्ष जाँच से बचाया भी नहीं जाना चाहिए।
यदि कोई अधिकारी कानून तोड़ता है, तो जाँच हो। यदि कोई नेता सार्वजनिक कर्तव्य में विफल होता है, तो लोकतांत्रिक और वैधानिक जवाबदेही तय हो। यदि किसी नागरिक के अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो उसे प्रभावी उपचार मिले। यदि किसी आरोप में सत्य नहीं है, तो तथ्य सामने आकर उस भ्रम को दूर करें।
यही न्याय है। यही संवैधानिक शासन है। यही लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है।
भारत की जनता किसी नेता की प्रजा नहीं है। भारत की जनता इस गणराज्य की नागरिक शक्ति है।
भारत किसी परिवार की जागीर नहीं। भारत किसी दल की निजी संपत्ति नहीं। भारत किसी अधिकारी की व्यक्तिगत सत्ता नहीं।
भारत का संविधान सभी सार्वजनिक पदों की सीमाएँ निर्धारित करता है और प्रत्येक नागरिक की गरिमा की रक्षा करता है।
आइए, हम ऐसी व्यवस्था की माँग करें जिसमें किसी ईमानदार अधिकारी को राजनीतिक दबाव से डरना न पड़े, किसी पत्रकार को सत्य लिखने से भयभीत न होना पड़े, किसी किसान को अपनी बात कहने के लिए अपमानित न होना पड़े, किसी विद्यार्थी को न्याय माँगने के लिए दंडित न होना पड़े और किसी नागरिक को अपने अधिकारों के लिए अकेला संघर्ष न करना पड़े।
सत्ता को संविधान के अधीन, संस्थाओं को जवाबदेह, पुलिस को निष्पक्ष, मीडिया को स्वतंत्र और जनता को अधिकार-संपन्न बनाना ही भारत की लोकतांत्रिक रक्षा का मार्ग है।
न किसी की गुलामी। न किसी के प्रति अंधभक्ति। न बिना प्रमाण किसी को अपराधी घोषित करना।
केवल सत्य, संविधान, न्याय और जनता के प्रति जवाबदेही।
