दबंग पब्लिक प्रवक्ता

कर्मचारी संघ की प्रदेश कार्यकारिणी घोषित,संतोष तिवारी, बालगंगाधर व कौशल ने बढ़ाया सम्मान


अनूपपु्र

कलेक्ट्रेट मे कलेक्टर के रीडर पद पर पदस्थ संतोष तिवारी को मध्यप्रदेश लिपिक वर्गीय शासकीय कर्मचारी संघ का प्रांतीय सचिव नियुक्त किया गया है। इस नियुक्ति से जिले गणमान्य लोगों ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए श्री तिवारी सहित अन्य नव नियुक्त पदाधिकारियों को शुभकामनाएँ प्रदान किया है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार मध्यप्रदेश लिपिक वर्गीय शासकीय कर्मचारी संघ के प्रांताध्यक्ष मुकेश चतुर्वेदी ने प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा करते हुए कलेक्ट्रेट मे पदस्थ संतोष तिवारी को प्रांतीय सचिव, अनूपपुर जनपद मे पदस्थ बालगंगाधर सेंगर को वरिष्ठ उप प्रांताध्यक्ष एवं कौशल प्रसाद केवट को उप प्रांताध्यक्ष नियुक्त किया है।

प्रदेश कार्यकारिणी मे अनूपपु्र जिले से तीन वरिष्ठ कर्मचारियों को स्थान मिलने से जिले का गौरव बढा है। जिले के गणमान्य लोगों , अधिकारियों- कर्मचारियों और शुभ चिंतकों ने नव नियुक्त पदाधिकारियों को शुभकामनाएँ देते हुए कर्मचारियों और जिले के हित मे कार्य करने की अपेक्षा की है।

भोजन के नाम पर जहर, पराठे में मिला सड़ा आलू, ग्राहक पहुँच गया अस्पताल 


अनूपपुर

जिले में बैठे आला अधिकारी इतने लापरवाह हो गए हैं, की किसी दुकान होटल से कुछ भी बिक रहा है कोई देखने वाला नही है। जिला मुख्यालय में भोजन के नाम पर ज़हर परोसा जा रहा है, एक आम नागरिक की जान की कीमत इतनी सस्ती हो गई है कि होटल और ढाबा संचालक लापरवाही की सारी हदें पार कर दें। इसी तरह का मामला अजीत ढाबा का है, जहाँ पराठे के अंदर से सड़ा हुआ आलू मिला, जिसे खाने के बाद एक व्यक्ति की तबीयत बिगड़ गई। जिस कारण से उसे अस्पताल जाकर अपना इलाज कराना पड़ा, अगर यही पराठा किसी बच्चे या बुजुर्ग ने खा लिया होता तो क्या होता। खाद्य निरीक्षक की सह पर खाद्य सुरक्षा नियमों की जिले में खुलेआम धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। जब कि खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम 2006 के तहत: अस्वच्छ भोजन परोसना दंडनीय अपराध है। ऐसे मामलों में होटल/ढाबा का लाइसेंस निरस्त किया जा सकता है। भारी जुर्माना और जेल तक की सजा का प्रावधान है। सवाल उठता है कि जिम्मेदार कौन,  खाद्य निरीक्षक नियमित जांच क्यू नही कर रहे हैं, ढाबों की किचन की गुणवत्ता क्यू नही देखी जा रही है। आम जनता की सेहत भगवान भरोसे छोड़ दी गई है। प्रशासन की लापरवाही से आम जनता पिस रही है।

सचिव ने किया चमत्कारिक अदृश्य विकास, कागजों पर ही उगा दिया 5 लाख का पार्क, 14.89 लाख के अमृत सरोवर घोटाला

*बिना सत्यापन के कैसे हुआ भुगतान, सीईओ, इंजीनियर व सचिव ने किया गोल माल*


अनूपपुर। 

जिले के ग्राम पंचायत रेउला सचिव विमल साहू की जादुई कलम ने फाइलों में एक ऐसा हरा-भरा पार्क खड़ा कर दिया है, जिसे रेउला की जनता आज भी अपनी आँखों से देखने के लिए तरस रही है। यह मामला सीधे तौर पर जनता की गाढ़ी कमाई पर डाका डालने और सरकारी योजनाओं का मजाक उड़ाने का एक ज्वलंत उदाहरण बन गया है।

सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक रेउला में 'ग्रामीण पार्क' निर्माण के लिए ₹4,79,000 की भारी-भरकम राशि स्वीकृत की गई थी। पंचायत राज के कड़े नियम और निर्देश स्पष्ट रूप से कहते हैं कि किसी भी निर्माण कार्य का भुगतान उसकी भौतिक प्रगति यानी जमीन पर हुए काम को देखकर ही किस्तों में किया जाएगा। लेकिन यहाँ तो सचिव विमल साहू की 'सेटिंग' और रसूख के आगे नियम बौने साबित हो गए। धरातल पर काम के नाम पर एक पत्थर भी नहीं हिला और न ही सौंदर्यीकरण की, कोई काम ही नही हुआ, मगर सचिव की प्रशासनिक चतुराई देखिए कि उन्होंने लगभग ₹4,00,000 की राशि का आहरण सफलतापूर्वक कर लिया। बिना काम के इतनी बड़ी रकम की निकासी करना न केवल वित्तीय अनियमितता है, बल्कि एक गहरी आपराधिक साजिश की ओर इशारा करता है।

इस पूरे खेल में सबसे संदिग्ध और रहस्यमयी भूमिका उन तकनीकी अधिकारियों और इंजीनियरों की नजर आती है, जिन्होंने दफ्तर के बंद कमरों में बैठकर 'वर्चुअल पार्क' की मूल्यांकन रिपोर्ट तैयार कर दी। यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर किस आधार पर मूल्यांकन की फाइलें दौड़ाई गईं और किसने उस बंजर जमीन पर हरियाली देखकर हस्ताक्षर कर दिए, क्या उन जिम्मेदार अधिकारियों को जमीन पर फैला सन्नाटा और कटीली झाड़ियाँ दिखाई नहीं दीं, या फिर 'कमीशन' के खेल ने उनकी आँखों पर भ्रष्टाचार की पट्टी बांध दी थी? यह साफ है कि यह घोटाला केवल एक सचिव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मूल्यांकन करने वाले से लेकर भुगतान की फाइल आगे बढ़ाने वाले हर हाथ की अपनी हिस्सेदारी नजर आती है।

हैरानी की बात तो यह भी है कि जनपद पंचायत अनूपपुर के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) की नाक के नीचे इतना बड़ा फर्जीवाड़ा हो गया और प्रशासन को इसकी भनक तक नहीं लगी। ग्रामीणों के बीच यह चर्चा आम है कि सरपंच, सचिव और जनपद के कुछ प्रभावशाली अधिकारियों ने मिलकर भ्रष्टाचार का एक ऐसा 'सुरक्षा कवच' तैयार किया है, जिसे भेद पाना किसी आम आदमी के बस की बात नहीं है। बिना वरिष्ठ अधिकारियों के संरक्षण या उनकी मौन सहमति के, एक सचिव की इतनी हिम्मत कैसे हो सकती है कि वह सरेआम शासन के खजाने में सेंध लगा दे? यह लापरवाही है या मिलीभगत, इसकी उच्च स्तरीय जांच अब अनिवार्य हो गई है।

रेउला पंचायत का यह मामला प्रदेश सरकार के उन दावों की भी पोल खोलता है जिनमें भ्रष्टाचार के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' की बात कही जाती है। जिस पैसे से गाँव के मासूम बच्चों के खेलने के लिए पार्क बनना था और बुजुर्गों के लिए टहलने की जगह तैयार होनी थी, वह पैसा आज सचिव और उनके गिरोह की विलासिता का साधन बन रहा है। विमल साहू जैसे कर्मचारी सरकारी व्यवस्था के लिए किसी 'कैंसर' से कम नहीं हैं, जो अंदर ही अंदर विकास की जड़ों को खोखला कर रहे हैं। अब देखना यह है कि क्या जिला कलेक्टर महोदय इस 'बिना काम, पूरा दाम' वाले घोटाले पर कड़ा संज्ञान लेंगे या फिर हमेशा की तरह जांच की फाइलें ठंडे बस्ते में डाल दी जाएंगी? रेउला की जनता अब दोषियों को सलाखों के पीछे देखने और अपने हक के पैसे की वसूली का इंतजार कर रही है।

14.89 लाख के अमृत सरोवर घोटाला, सत्यापन में मिला 2 लाख का कार्य*


जनपद पंचायत अनूपपुर क्षेत्र अंतर्गत ग्राम पंचायत छोहरी  में मनरेगा के तहत स्वीकृत अमृत सरोवर निर्माण कार्य में गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं कार्यस्थल पर लगे सूचना बोर्ड के अनुसार इस निर्माण के लिए 14.89 लाख रुपए की राशि स्वीकृत की गई थी, जिसमें 6.14 लाख श्रम और 8.77 लाख सामग्री मद में व्यय दर्शाया गया है। कार्य प्रारंभ तिथि 23 मई 2022 अंकित है, जबकि पूर्णता तिथि स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं है।

मामले में जब स्थल निरीक्षण कर भौतिक सत्यापन किया गया तो मौके पर महज लगभग 2 लाख रुपए के आसपास ही कार्य होना पाया गया, जिससे शेष राशि के उपयोग पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं ग्रामीणों का आरोप है कि कार्य न तो स्वीकृत मानकों के अनुसार हुआ और न ही राशि का पारदर्शी उपयोग किया गया।

ग्रामीणों ने सरपंच और संबंधित जिम्मेदारों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए कहा कि पंचायत में अन्य निर्माण कार्यों में भी अनियमितताएं हुई हैं उन्होंने जिला प्रशासन से पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है।

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