पंकज बुरहानपुरी के सम्मान में काव्य गोष्ठी आयोजन सम्पन्न


जबलपुर

जबलपुर संस्कारधानी में पंकज बुरहानपुरी ( डॉ यमुना प्रसाद दुबे ) गंगा जमुना के तट से पधारे वरिष्ठ कवि के सम्मान में काव्य गोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम में शहर के वरिष्ठ कवि साहित्यकार उपस्थित रहे। निरंजन द्विवेदी वत्स, कवि संगम त्रिपाठी, विजय विश्वकर्मा, मदन श्रीवास्तव, प्रकाश सिंह ठाकुर, एम. पी. सिंह ' निकुंज', मानसिंह ' दीपक', सुनील सिंह तोमर प्रमुख रूप से उपस्थित रहे। 

गीत और गज़लों के दौर में बहुत सुन्दर रचनाएं प्रस्तुत की गयीं। कवि  पंकज बुरहानपुरी जी ने अपने गीतों से आयोजन को ऊंचाईयों तक पहुंचाया। वरिष्ठ कवि विजय विश्वकर्मा के संचालन में गीत ग़ज़ल हास्य व्यंग की रचनाएं प्रवाहित हुई। आभार प्रकाश सिंह ठाकुर ने अभिव्यक्त किया।

प्रदेश उपाध्यक्ष गणेश सिंह राजावत के नेतृत्व में धूमधाम से मनाया गया नरेंद्र मोदी विचार मंच का 23वां स्थापना दिवस


बैढ़न/सिंगरौली

नरेंद्र मोदी विचार मंच के 23वें स्थापना दिवस के अवसर पर सिंगरौली के बैढ़न में भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन मंच के प्रदेश उपाध्यक्ष गणेश सिंह राजावत के नेतृत्व में संपन्न हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं, जनप्रतिनिधियों एवं आम नागरिकों ने सहभागिता की।

कार्यक्रम में मंच की प्रदेश सचिव रश्मि साकेत की विशेष उपस्थिति रही। उन्होंने अपने संबोधन में नरेंद्र मोदी विचार मंच की स्थापना, उद्देश्यों एवं राष्ट्र निर्माण में उसकी भूमिका पर प्रकाश डालते हुए केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा संचालित विभिन्न जनहितकारी योजनाओं की विस्तृत जानकारी उपस्थित जनसमुदाय के साथ साझा की। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री Narendra Modi के नेतृत्व में देश विकास, आत्मनिर्भरता और जनकल्याण के नए आयाम स्थापित कर रहा है तथा इन योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना सभी कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी है।

कार्यक्रम की मुख्य अतिथि सिंगरौली नगर निगम की महापौर Rani Agrawal रहीं। उन्होंने अपने संबोधन में शासन की विभिन्न महत्वाकांक्षी योजनाओं, नगरीय विकास कार्यों एवं जनकल्याणकारी कार्यक्रमों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए नागरिकों से योजनाओं का अधिक से अधिक लाभ लेने का आह्वान किया।

इस अवसर पर सिंगरौली भाजपा जिला अध्यक्ष देवेंद्र पांडे, नगर निगम अधिकारी सुंदरलाल शाह, नगर निगम के पटेल साहब, समूह अध्यक्ष उर्मिला देवी, सुमन साकेत सहित बड़ी संख्या में महिला कार्यकर्ता एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

कार्यक्रम के दौरान राष्ट्र निर्माण, सामाजिक जागरूकता, संगठन विस्तार तथा केंद्र एवं राज्य सरकार की योजनाओं को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया गया। मंच के पदाधिकारियों ने कहा कि नरेंद्र मोदी विचार मंच राष्ट्रवाद, सामाजिक समरसता और जनसेवा के मूल्यों को लेकर निरंतर कार्य कर रहा है तथा आने वाले समय में संगठन को और अधिक मजबूत बनाया जाएगा।

बैढ़न में आयोजित इस कार्यक्रम में हजारों की संख्या में लोगों की उपस्थिति रही, जिससे आयोजन स्थल राष्ट्रभक्ति, उत्साह और जनसहभागिता से सराबोर दिखाई दिया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रहित एवं जनकल्याण के संकल्प के साथ हुआ।

गंगांजलि साझा संग्रह राजेंद्र कुमार तिवारी को किया भेंट-  कवि संगम त्रिपाठी 


जबलपुर

गंगांजलि साझा काव्य संग्रह राजेंद्र कुमार तिवारी मंदसौर को उनके जबलपुर आगमन पर सौजन्य मुलाकात कर कवि संगम त्रिपाठी ने भेंट किया। राजेंद्र कुमार तिवारी मंदसौर वरिष्ठ कवि साहित्यकार समाजसेवी व हिंदी प्रेमी हैं।

गंगांजलि साझा काव्य संग्रह के संपादक डॉ अजय शुक्ल है व इस संग्रह में कवि संगम त्रिपाठी हास्य व्यंगकार जबलपुर मध्यप्रदेश, कवि पंकज बुरहानपुरी कवि लेखक बुरहानपुर,‌ कवि श्याम फतनपुरी कवि गीतकार गोमती नगर लखनऊ, डॉ सोमनाथ शुक्ल कवि लेखक प्रयागराज की रचनाएं संग्रहित हैं। गंगांजलि साझा काव्य संग्रह भावनाओं का काव्य संगम है।

बूंदों के नौलखा हार से सज, धज कर इठलाती आजा, आजा बरखा रानी आजा



 बूंदों के नौलखा हार


आजा बरखा रानी आजा।


बूंदों के नौलखा हार से सज 

धज कर इठलाती आजा,

       आजा बरखा रानी आजा।


इंद्रधनुष बनकर बूंदों की 

सतरंगी किरनें आईं हैं,

बिजली बदली पुरवा तेरी 

अगवानी करने आईं हैं।


बैठ अश्वमेघों के रथ पर 

नीलगगन से नीचे आजा। 

      आजा बरखा रानी आजा।


उमड़ घुमड़ कर तुझे बुलातीं

काली काली मस्त घटाएं,

कोयल मोर पपीहे तुझको 

रह-रह कर आवाज लगाएं।


बूंदों की पाजेब पहन कर 

छम छम छम छम करती आजा।

       आजा बरखा रानी आजा।


गीतकार अनिल भारद्वाज एडवोकेट हाईकोर्ट ग्वालियर

डॉ. अरुण अज्ञानी कलाव्योम कविश्री सम्मान से हुए सम्मानित


भोपाल

कवि, साहित्यकार, लेखक एवं प्रोफेसर डॉ. अरुण अज्ञानी (डॉ. अरुण खोबरे) को कलाव्योम कविश्री सम्मान 2026 से सम्मानित किया गया। सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्था कलाव्योम फाउंडेशन द्वारा साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें यह सम्मान प्रदान किया गया। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल में प्रोफेसर डॉ. अरुण खोबरे जिन्हें कवि के रुप अरुण अज्ञानी के नाम से भी जाना जाता है इससे पूर्व भी साहित्य के क्षेत्र में कई पुरुस्कार व सम्मान प्राप्त कर चुके हैं। इस अवसर पर संस्था के पदाधिकारी अशोक श्रीमाल, आलोक शर्मा, मोहित कुमार आदि उपस्थित थे। गौरतलब है कि डॉ. अरुण खोबरे ने विश्व की सबसे बड़ी श्रीरामचरित मानस का लेखन भी किया है। पिछले साल ही उनका नाम लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हुआ था। इससे पहले ओएमजी बुक ऑफ रिकॉर्ड, भारत वर्ल्ड रिकॉर्ड, मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड, ग्लोबल गोल्ड टैलेंट बुक ऑफ रिकॉर्ड, वंडर बुक ऑफ रिकॉर्ड, रॉयल सक्सेस इंटरनेशनल बुक ऑफ रिकॉर्ड,  गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी डॉ खोबरे का नाम दर्ज हो चुका है। उन्हें अब तक उत्कृष्ट लोक कवि सम्मान, संतश्री भूरा भगत राष्ट्रीय रत्न सम्मान, इंडियन आईकॉन अवार्ड, एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी पर्सनाल्टी ऑफ इंडिया, उत्कृष्ट मीडिया गुरु शिक्षक सम्मान, कतिया विभूति सम्मान, इंडियाज बेस्ट मीडिया टीचर अवार्ड, एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी पर्सनाल्टी ऑफ वर्ल्ड, ग्लोबल एपेक्स अवार्ड समेत कई, राष्ट्र गौरव सम्मान सहित कई सम्मानों व पुरुस्कारों से नवाजा जा चुका है। एमसीयू में शिक्षक के अलावा वे अटल बिहारी वाजपेई हिंदी विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग में विभागाध्यक्ष एवं परीक्षा नियंत्रक का दायित्व भी संभाल चुके हैं। उन्होंने कलाव्योम कविश्री सम्मान 2026 को भगवान राम जी के परम भक्त श्री हनुमान जी को समर्पित किया है।

बस व ट्रक की जोरदार टक्कर, 6 लोग हुए घायल, नाराज ग्रामीणों ने सांसद का काफिला रोका 


उमरिया

जिले के बिरसिंहपुर पाली थाना क्षेत्र में सुबह भीषण सड़क हादसा हो गया। तेंदूपत्ता गोदाम के पास कोरबा से बिलासपुर जा रही शिव ट्रेवल्स की बस और ट्रक में आमने-सामने जोरदार भिड़ंत हो गई।

टक्कर इतनी तेज थी कि बस का अगला हिस्सा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया और ड्राइवर केबिन में फंस गया। मौके पर पहुंची पुलिस और स्थानीय लोगों ने काफी मशक्कत के बाद ड्राइवर को सुरक्षित बाहर निकाला।

बस में करीब 40 से 50 यात्री सवार थे। हादसे में आगे की सीट पर बैठे करीब 6 यात्रियों को चोटें आई हैं। गनीमत रही कि कोई जनहानि नहीं हुई। सूचना मिलते ही 108 एम्बुलेंस मौके पर पहुंची। सभी घायलों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पाली ले जाया गया, जहां उनका उपचार चल रहा है। दो यात्रियों की हालत गंभीर बताई जा रही है।

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक ट्रक गलत साइड से आ रहा था, जिससे यह हादसा हुआ। पाली पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। क्रेन की मदद से दोनों वाहनों को सड़क से हटाया गया, जिसके बाद जाम खुला।

*ग्रामीणों व किसानों ने रोका सांसद का काफिला*


शहडोल जिले के ब्यौहारी विधानसभा क्षेत्र के दौरे पर पहुंचे सीधी सांसद डॉ. राजेश मिश्रा को ग्रामीणों के विरोध का सामना करना पड़ा। जन चौपाल कार्यक्रम में शामिल होने जा रहे सांसद का काफिला भमरहा प्रथम गांव में ग्रामीणों ने रोक लिया और झापर नदी पर बने पुल को चालू कराने तथा अधिग्रहित भूमि का मुआवजा दिलाने की मांग उठाई। लगभग एक घंटे तक सांसद का काफिला मौके पर रुका रहा, जहां ग्रामीणों ने अपनी समस्याएं विस्तार से बताईं।

जानकारी के अनुसार सीधी संसदीय क्षेत्र के सांसद डॉ. राजेश मिश्रा मंगलवार को ब्यौहारी विधानसभा के ग्राम कोना टोला में आयोजित जन चौपाल में शामिल होने तथा ग्रामीणों के बीच रात्रि विश्राम के लिए जा रहे थे। उनके साथ ब्यौहारी विधायक शरद जुगलाल कोल भी मौजूद थे। इसी दौरान रास्ते में भमरहा प्रथम गांव के लोगों ने उनका काफिला रोक लिया।

ग्रामीणों का आरोप है कि झापर नदी पर बना पुल करीब तीन वर्ष पहले पूरी तरह तैयार हो चुका है, लेकिन आज तक आम लोगों के लिए चालू नहीं किया गया। पुल के दोनों ओर पहुंच मार्ग के लिए स्थानीय किसानों की भूमि अधिग्रहित की गई थी, लेकिन प्रभावित किसानों को अब तक मुआवजे की राशि नहीं मिली है। इसी वजह से पुल का उपयोग शुरू नहीं हो सका है। पुल निर्माण पूरा होने के बावजूद करीब 30 किसानों को उनकी जमीन का मुआवजा नहीं मिला है। 

ग्रामीणों और किसानों ने सांसद के समक्ष अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए जल्द समाधान की मांग की। सांसद डॉ. राजेश मिश्रा ने मौके पर लोगों से चर्चा की और उन्हें आश्वस्त किया।

अमित कुमार श्रीवास्तव बने नरेंद्र मोदी विचार मंच मध्यप्रदेश के प्रदेश सह मीडिया प्रभारी


रिपोर्ट- रामकेश द्विवेदी

सीधी

नरेंद्र मोदी विचार मंच भारत, मध्यप्रदेश द्वारा अमित कुमार श्रीवास्तव, निवासी तहसील कुसमी जिला सीधी को प्रदेश सह मीडिया प्रभारी पद पर नियुक्त किया गया है। यह नियुक्ति 13 जून 2026 से आगामी आदेश तक प्रभावी रहेगी।

जारी नियुक्ति पत्र में संगठन ने विश्वास व्यक्त किया है कि अमित कुमार श्रीवास्तव अपने कर्तव्यों का निष्ठा, ईमानदारी एवं समर्पण भाव से निर्वहन करते हुए संगठन को मजबूत बनाने और राष्ट्रहित के कार्यों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

नियुक्ति पत्र में कहा गया है कि उनके द्वारा किया गया कार्य संगठन के उद्देश्यों को गति प्रदान करेगा तथा सशक्त, समृद्ध और विकसित भारत के निर्माण में योगदान देगा।

अमित कुमार श्रीवास्तव की इस नियुक्ति पर क्षेत्र के सामाजिक, राजनीतिक एवं पत्रकारिता जगत से जुड़े लोगों ने उन्हें बधाई एवं शुभकामनाएं दी हैं। समर्थकों ने आशा व्यक्त की है कि वे संगठन और समाज के हित में प्रभावी भूमिका निभाते हुए अपनी जिम्मेदारियों का सफलतापूर्वक निर्वहन करेंगे।

रसोई की सीटी से रेल के इंजन तक: प्रेशर कुकर के आविष्कार की अनोखी कहानी 


जैसा की हम सभी जानते हैं कि जेम्स वाट (James Watt) ने प्रेशर कुकर की सीटी से प्रभावित हो कर एक ऐसा आधुनिक इंजन बनाया जिसने पूरी दुनिया में औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) ला दी। लेकिन क्या आप प्रेशर कुकर के अविष्कार की कहानी जानना चाहेंगें, तो आइए जानते हैं प्रेशर कुकर के अविष्कार की कहानी क्या है? 

प्रेशर कुकर का आविष्कार डेनिस पैपिन (Denis Papin) ने 1679 में किया था। डेनिस पैपिन एक फ्रांसीसी (French) भौतिकविज्ञानी (Physicist) और गणितज्ञ थे। शुरुआत में उन्होंने इसका नाम "स्टीम डाइजेस्टर" (Steam Digester) रखा था। उस समय वैज्ञानिक इस बात पर रिसर्च कर रहे थे कि हवा और भाप (steam) का दबाव कैसे काम करता है। डेनिस पैपिन यह साबित करना चाहते थे कि यदि हम पानी और भाप को एक मजबूत, पूरी तरह बंद बर्तन में बंद कर दें, तो अंदर का दबाव (pressure) बढ़ जाता है। इस बढ़ते दबाव के कारण पानी का उबलने का तापमान (boiling point) भी बढ़ जाता है। यानी पानी 100 डिग्री सेल्सियस से भी ज्यादा गर्म हो जाता है, जिससे खाना बहुत तेजी से पक सकता है। यह विशुद्ध रूप से एक वैज्ञानिक प्रयोग था। दूसरा उस जमाने में आम लोगों और सैनिकों के लिए भोजन की कमी एक बड़ी समस्या थी। पैपिन एक ऐसा उपकरण बनाना चाहते थे जो बेकार समझे जाने वाले भोजन को भी खाने योग्य बना सके। वह देखना चाहते थे कि क्या अत्यधिक ऊंचे तापमान और दबाव से जानवरों की सख्त हड्डियों को भी इतना मुलायम बनाया जा सकता है कि उनसे पोषण (जिलेटिन और शोरबा) निकाला जा सके। उनका यह प्रयोग बेहद सफल रहा। उनके स्टीम डाइजेस्टर ने हड्डियों को पूरी तरह से नर्म कर दिया, जिससे गरीबों के लिए सूथ और स्टॉक बनाना आसान हो गया। डेनिस पैपिन का मकसद सिर्फ रोजमर्रा का खाना जल्दी पकाना नहीं था, बल्कि विज्ञान के सिद्धांतों का उपयोग करके कम संसाधनों (जैसे हड्डियों और सख्त मांस) से ज्यादा से ज्यादा पोषण निकालना और भाप की शक्ति को दुनिया के सामने साबित करना था।

डेनिस पैपिन के इस "स्टीम डाइजेस्टर" से जुड़े कुछ बहुत ही दिलचस्प और मजेदार किस्से यहाँ दिए गए हैं।

 1. शाही मेहमानों के सामने 'हड्डियों का हलवा'

1682 में, डेनिस पैपिन ने लंदन की सबसे प्रतिष्ठित विज्ञान संस्था, रॉयल सोसाइटी के वैज्ञानिकों और इंग्लैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय (King Charles II) के लिए एक शाही दावत रखी। इस दावत में सारा खाना उनके नए आविष्कार (स्टीम डाइजेस्टर) में पकाया गया था। जब मेहमानों को खाना परोसा गया, तो वे हैरान रह गए। जो जानवरों की हड्डियाँ चबाने लायक भी नहीं होती थीं, वे कुकर के भारी दबाव के कारण इतनी नर्म और जेली जैसी हो चुकी थीं कि राजा और वैज्ञानिकों ने उन्हें बड़े चाव से खाया। इस दावत को इतिहास में "द फिलॉसॉफिकल सपर" (The Philosophical Supper) के नाम से जाना जाता है।

 2. जब कुकर बन गया तो उसका पहला धमाका!

शुरुआत में जब पैपिन ने यह डिवाइस बनाया, तो इसमें कोई सेफ्टी वॉल्व नहीं था। एक प्रयोग के दौरान, भाप का दबाव इतना ज्यादा बढ़ गया कि वह लोहे का भारी बर्तन एक जोरदार धमाके के साथ फट गया। कमरे की खिड़कियां टूट गईं और दीवारें हिल गईं। इस खतरे को टालने के लिए पैपिन ने "सेफ्टी वाल्व" (Safety Valve) का आविष्कार किया। यह वही वाल्व है जो आज हमारे घरों के कुकर में 'सीटी' के रूप में काम करता है। जब अंदर का दबाव ज्यादा हो जाता है, तो यह वाल्व अतिरिक्त भाप को बाहर निकाल देता है।

3. रसोइयों का डर और 'जादू टोना'

जब यह आविष्कार पहली बार सामने आया, तो उस जमाने के आम रसोइये (Chefs) और लोग इससे बेहद डर गए थे। लोग सदियों से खुली आग पर खाना पकाते आ रहे थे। एक बंद लोहे के डिब्बे से अजीब सी आवाजें आना और अचानक सीटी से तेज भाप निकलना उन्हें किसी 'जादू-टोने' या भूतिया मशीन जैसा लगता था। कई रसोइयों ने तो इसे इस्तेमाल करने से साफ मना कर दिया था क्योंकि उन्हें डर था कि यह उनके किचन को उड़ा देगा।

आज जो ट्रेनें पटरियों पर दौड़ रही हैं, उनकी शुरुआत एक किचन के कुकर से हुई थी!  जब वैज्ञानिकों ने देखा कि पैपिन के कुकर के अंदर की भाप में इतनी ताकत है कि वह भारी-भरकम ढक्कन और वजन को भी ऊपर उठा देती है, तो थॉमस न्यूकॉमेन और जेम्स वाट जैसे वैज्ञानिकों को एक नया विचार आया। उन्होंने सोचा, "अगर यह भाप एक ढक्कन उठा सकती है, तो यह एक बड़ा पहिया या पिस्टन भी घुमा सकती है!" इसी सोच ने आगे चलकर दुनिया के पहले भाप के इंजन (Steam Engine) को जन्म दिया। एक छोटा सा प्रयोग जो किचन में खाना जल्दी पकाने के लिए शुरू हुआ था, उसने न सिर्फ दुनिया का खान-पान बदला, बल्कि पूरी औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) की नींव रख दी। 1713 के आसपास पैपिन का लंदन में निधन हो गया। जिनका आविष्कार (प्रेशर कुकर) आज दुनिया के हर घर की रसोई में मौजूद है, और जिनके सिद्धांतों ने पूरी दुनिया को ट्रेनों और फैक्ट्रियों का 'भाप इंजन' दिया।


*सुशी सक्सेना*

आग उगलती दोपहरी ये अंगारे सा दिन, कब आषाढ़ घन गरजेंगे कब बरसेगा सावन



*गर्म हवा के झोंके*


आग उगलती दोपहरी ये अंगारे सा दिन,

कब आषाढ़ घन गरजेंगे कब बरसेगा सावन।


प्यासे अधर नदी झरनों के,

कंठ कुओं के सूखे,

दिन भर के दुबके नीड़ों में,

पंछी सोऐं भूखे।


प्रातः से ही तपन तपस्विन करने लगी हवन,

कब मेघों का बिजुरियों से होगा मधुर मिलन।


सड़कों पर सन्नाटा लेटा,

मृग मरीचिका बनकर,

गर्म हवा के झोंके चलते,

रात-रात भर तन कर।


भीषण गर्मी लगती है सूरज की सगी बहन,

कब रिमझिम के गीत गुनगुनाएंगे धरा गगन।


रखा निर्जला व्रत इस ऋतु ने,

पांव छांव के व्याकुल,

श्वेत अंगोछा बांधे सिर पर,

हांफ रहा मलयानिल।


पंखा झलती पल्लू के कोने से सांझ दुल्हन,

उमस खोल कर बैठी वक्षस्थल के सब बंधन।


आग उगलताती दोपहरी ये अंगारे सा दिन,

कब आषाढ़ घन गरजेंगे कब बरसेगा सावन।


गीतकार अनिल भारद्वाज एडवोकेट हाई कोर्ट  ग्वालियर

डॉक्टर सत्यनारायण तिवारी छत्तीसगढ आध्यात्म विभूषण सम्मान से हुए सम्मानित 


लोरमी

लोरमी-मनियारी साहित्य एवम सेवा समिति लोरमी के अध्यक्ष, श्रीमद्भागवत व मानस परिवार छत्तीसगढ के संयोजक व संस्थापक, शिक्षाविद, साहित्यकार, कथावाचक एवम समाज सेवक डाक्टर सत्यनारायण तिवारी हिमान्शु महाराज को विभिन्न क्षेत्रो मे किए गए योगदान के लिए, सरस्वती शिशु मंदिर तिलकनगर बिलासपुर के सभागार मे छत्तीसगढ राजभाषा आयोग के पूर्व अध्यक्ष डाक्टर विनय कुमार पाठक,छत्तीसगढ राज भाषा आयोग के सचिव डाक्टर अभिलाषा बेहार,वरिष्ट समाज सेवी एस डी बडगैया,डॉक्टर रमेश चंद्र श्रीवास्तव,डॉक्टर बिष्णु कुमार तिवारी के कर कमलो राज्य स्तरीय  छत्तीसगढ आध्यात्म विभूषण सम्मान 2026 से पर्यावरण एवम पर्यटन विकास समिति बिलासपुर द्वारा सम्मानित किया गया। शासकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय हरदीबान्ध के प्रधानपाठक सारधा लोरमी निवासी डॉक्टर तिवारी इसके पूर्व राज्यपाल सम्मान सहित करीब दो सौ से अधिक शासकीय/अशासकीय सम्मान से सम्मानित किए जा चूके है। सरस्वती शिशु मंदिर तिलकनगर बिलासपुर के सभागार मे शाम 6 बजे डॉक्टर  तिवारी सहित 24 विभूतियो का सम्मान तथा विभिन्न प्रकार की पर्यावरण संरक्षण व जागरण के कार्यक्रम समिति  व छात्र छात्राओ को प्रशस्तिपत्र व मेडल प्रदान कर सम्मानित किया। उक्त जानकारी समिति क अध्यक्ष डाक्टर विवेक तिवारी एवम कार्यक्रम संचालक डॉक्टर राघवेन्द्र दुबे ने दी। राज्य स्तरीय छत्तीसगढ आध्यात्म विभूषण सम्मान 2026से सम्मानित होने पर केन्द्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू उपमुख्यमंत्री अरूण साव, जनपद अध्यक्ष वर्षा विक्रम सिंह, उपाध्यक्ष राजेंद्र साहू, नगर पालिकाध्यक्ष सुजीत वर्मा, उपाध्यक्ष डाक्टर अशोक जायसवाल सहित अनेक गणमान्य नागरिको एवम संगठनो ने  डॉक्टर सत्यनारायण तिवारी हिमान्शु महाराज को हार्दिक बधाई प्रेषित किए है। कवि संगम त्रिपाठी संस्थापक प्रेरणा हिंदी प्रचारिणी सभा ने बधाई दी और कहा कि डॉ सत्यनारायण तिवारी साहित्य, समाज व धर्म सेवा में प्रेरणादायक कार्य कर रहे हैं।

आधुनिक भारत का सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आंदोलन है इप्टा, मुंबई में संपन्न हुआ इप्टा का राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव

*आठ दशक से अधिक समय तक सक्रिय संगठन इप्टा देश का महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आंदोलन बन चुका है*


मुम्बई

                 जब देश स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत था, दुनिया विश्व युद्ध से जूझ रही थी। बंगाल के लोग अकाल की त्रासदी भोग रहे थे। उसी दौरान 25 मई 1943 को विभिन्न राज्यों, रियासतों से आए लेखकों, कलाकारों ने मुंबई में इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (भारतीय जन नाट्य संघ) इप्टा का गठन किया था। युद्ध, अकाल, राजनीतिक दमन के दौर में इप्टा ने रंगमंच, संगीत, नृत्य, सिनेमा को फासीवाद, सांप्रदायिकता, गरीबी के खिलाफ प्रतिरोध में बदल दिया। इप्टा का ध्येय वाक्य है, "इप्टा की नायक जनता है"। 

                   आठ दशक से अधिक समय तक सक्रिय संगठन इप्टा देश का महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आंदोलन बन चुका है। संगठन ने प्रमाणित किया है कि कला केवल मनोरंजन नहीं, अपितु सामाजिक परिवर्तन की प्रेरणा भी बनती है।

              वर्षों तक इप्टा मुंबई में नाट्य महोत्सव आयोजित करती रही है, लेकिन अनेक कारणों से यह सिलसिला जारी नहीं रह सका। 24 वर्ष पश्चात इप्टा ने 20 से 27 मई तक कैफ़ी और शौकत आज़मी से प्रेरित होकर तथा इप्टा के पुनर्गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले जितेंद्र रघुवंशी की स्मृति में समारोह आयोजित किया। मुंबई माटुंगा के मैसूर एसोसिएशन ऑडिटोरियम में इप्टा की राष्ट्रीय समिति के नेतृत्व एवं इप्टा मुंबई की मेजबानी में संपन्न समारोह में दिल्ली, महाराष्ट्र के नासिक, मुंबई, पंजाब के कपूरथला, मध्य प्रदेश के इंदौर, उत्तर प्रदेश के लखनऊ, तमिलनाडु, उड़ीसा, बिहार के पटना इकाइयों के कलाकारों ने हिंदी, तमिल, मराठी, उड़िया, पंजाबी में 12 नाट्य प्रस्तुतियां दीं।

                 आदिवासी, दलित समाज के अलावा विषमता, नारी सम्मान, सामाजिक न्याय, सांप्रदायिकता, पर्यावरण, बाजारवाद जैसे मुद्दों पर कलाकारों ने नाटकों का मंचन किया।  

                    इप्टा जेएनयू के नाटक *गोह* में वंदना टेटे, अनुज लुगुन और जसिंता केरकेट्टा की कविताओं को आधार बनाकर आदिवासियों का जीवन, उनकी संस्कृति, मिथक, उनका रहन-सहन, पर्यावरण बचाने के संघर्ष , इन सबकी राजनीतिक वास्तविकताओं को तलाशने का प्रयास किया गया। इस प्रस्तुति का निर्देशन जेएनयू की पूरी टीम ने किया।        

                  इप्टा तमिलनाडु का नाटक *उर्यनथा थीरप्पु* (उच्चतम निर्णय) एक राजनीतिक नाटक है, जो भव्य विकास परियोजनाओं और सामान्य नागरिकों के अधिकारों के बीच संघर्ष को सामने लाता है। नाटक प्राकृतिक संसाधनों — जल, जंगल और जमीन  के बीच सामूहिक संबंधों पर जोर देता है। इस नाटक के निर्देशक आनंद बसु हैं।

              इप्टा नासिक का नाटक *उपथ शुम्भ* (पथभ्रष्ट दैत्य) एक व्यंग्यात्मक कॉमेडी ड्रामा है, जो मनोरंजन उद्योग की चमक-दमक के नीचे की असली क्रूरता को उजागर करता है। यह नाटक चार संघर्षरत कलाकारों की कहानी है, जो एक ऐसी दुनिया में अपना रास्ता तलाश रहे हैं, जो सब कुछ मांगती है और बदले में कुछ नहीं देती। नाटक का निर्देशन मुकेश काले ने किया है।     

                इप्टा पंजाब का नाटक *कूड़े विच खिड़िया गुलाब* (कूड़े में खिला गुलाब) सफाईकर्मी पिता-पुत्र की कहानी है, जिसे वर्ण और वर्गीय नजरिए से बुना गया है। नाटक सुखांत है। यह नाटक उन लोगों को भी जवाब देता है, जो आरक्षण पर सवाल उठाते हैं। निर्देशन इंद्रजीत रूपोवाली ने किया।  

               इप्टा इंदौर का नाटक *आजादी के तराने* स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान भारत छोड़ो आंदोलन से होते हुए देश की आजादी तक पहुंचता है। चिमूर, बलिया, मिदनापुर में स्थानीय विद्रोह हुए, जिनमें साधारण नागरिक, श्रमिक, किसान, विद्यार्थी, गृहिणियां शामिल थीं। उनके संघर्ष को नाटक में दर्शाया गया है। शोध पर आधारित प्रस्तुति का कालखंड 1942 से 1947 तक का है। नाटक की समाप्ति पर टिप्पणी करते हुए विख्यात फिल्म निर्देशक आनंद पटवर्धन ने कहा कि "नाटक यह भी दिखाता है कि आजादी की लड़ाई में कौन शामिल नहीं था"। इस नाटक का निर्देशन गुलरेज़ और सारिका श्रीवास्तव ने किया।        

                  इप्टा लखनऊ द्वारा प्रस्तुत नाटक *सपना मेरा यही सखी* मध्यकालीन चार कवयित्रियों की विद्रोही भावना को वर्तमान संदर्भों में समझने का प्रयास है। इन स्त्रियों ने अपने अस्तित्व के लिए समाज के रीति-रिवाज, परंपराओं को छोड़कर परिवार और समाज से विद्रोह किया तथा निर्वासन भोगा। ये महिलाएं थीं — मीराबाई, अक्का महादेवी, अंडाल और लल्लन। नाटक यह दिखाता है कि विद्रोही महिलाओं को समाज या तो देवी मानता है अथवा उनकी निंदा करता है। नाटक का निर्देशन वेद राकेश ने किया।       

                इप्टा मुंबई ने बलराज साहनी की *मेरी फिल्मी आत्मकथा* पर संगीतमय प्रस्तुति दी, जो संस्मरण और गीतों के माध्यम से आगे बढ़ती है। निर्देशन निधि कांत पांडे ने किया।   

           इप्टा मुंबई की अन्य प्रस्तुति *आनंद ही आनंद* थी। यह चेतन, देव और विजय आनंद के बीच रिश्तों की कहानी है। यह तीनों भाइयों के हिंदी सिनेमा में योगदान और देवानंद के स्टार बनने की प्रक्रिया की पड़ताल करती है। इस प्रस्तुति की निर्माता अनुराधा डार हैं।

                  इप्टा उड़ीसा का नाटक *एकनुआ सकलारा अपेक्षारे* (एक नई सुबह के इंतजार में) उन दो बेटों के विरोधी विचारों के संघर्ष की कहानी है। एक भ्रष्ट राजनेता है, दूसरा सशस्त्र क्रांति में विश्वास करता है। अंत में पिता के समझाने पर दोनों पुत्र गांधीवादी मूल्यों को अपनाते हैं। निर्देशन श्री विक्रम केसरी जेना ने किया।   

         इप्टा जोधपुर ने कृष्ण चंदर की कहानी *थाली का बैंगन* प्रस्तुत की, जो जाति और धर्म के नाम पर वसूली करने वाली प्रवृत्ति पर गहरी चोट करती है। यह गरीबों के जीवन के अंधेरे की कथा है। नाटक जीने के लिए शॉर्टकट के उपाय, अज्ञानता और अवसरवादिता पर गहरा व्यंग्य है। नाटक को दर्शक अपने समय से जोड़कर महसूस कर सकते हैं। समझ सकते हैं कि जाति-धर्म के नाम पर किस तरह बंटकर हमने जीवन को नर्क बना दिया है। इस प्रस्तुति के निर्देशक डॉक्टर विकास कपूर हैं।       

                इप्टा बिहार की प्रस्तुति *कोर्ट मार्शल* बहुचर्चित और सर्वाधिक देखा गया नाटक है। कहानी एक युवा सैनिक की है, जिस पर अपने अधिकारी की हत्या करने और एक अन्य को घायल करने का आरोप है। मुकदमे की अदालती कार्यवाही में इस कथित अपराध के पीछे जो कारण हैं, वे जातिवाद के घिनौने चेहरे को उजागर करते हैं। निर्देशन तनवीर अख्तर ने किया। 

              इप्टा मुंबई की प्रस्तुति *हम परवाने : द स्टोरी ऑफ अशफ़ाकउल्ला खान वारसी* अशफाक उल्ला और रामप्रसाद बिस्मिल से प्रेरित है। धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादी अशफाक काकोरी ट्रेन का खजाना लूटने वालों में शामिल थे। उन्होंने ब्रिटिश सरकार को चुनौती दी थी। इन्हीं के बलिदान से भगत सिंह और उनके साथियों ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन संगठन का गठन किया था। नाट्य प्रस्तुति का निर्देशन रमेश तलवार ने किया।        

          उल्लेखनीय है कि 25 मई 1943 को मुंबई के मारवाड़ी विद्यालय में आयोजित इप्टा के सम्मेलन को भेजे अपने संदेश में जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि "भारत में जन नाट्य के विकास की व्यापक संभावनाएं हैं, बशर्ते वह जनता और उसकी परंपराओं पर आधारित हो।"         

            देश में परमाणु विज्ञान के आधार स्तंभ होमी जहांगीर भाभा ने भारत सरकार द्वारा इप्टा के स्वर्ण जयंती वर्ष के अवसर पर स्मारक डाक टिकट जारी करने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा था कि "इप्टा को मिली सार्वजनिक मान्यता पर सभी को गर्व करने का पूरा अधिकार है।"उल्लेखनीय है कि "इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन" ( इप्टा) का नामकरण स्वयं डॉक्टर भाभा ने ही किया था।


हरनाम सिंह

कागज़ों में कैद नागरिक, पहचान, अधिकार और भारतीय लोकतंत्र का बदलता चेहरा- राजकुमार अग्रवाल


भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है। संविधान हर नागरिक को समानता, स्वतंत्रता, गरिमा और जीवन जीने का अधिकार देता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में आम भारतीय नागरिक के जीवन का एक बड़ा हिस्सा कागज़ों, प्रमाण पत्रों, बायोमेट्रिक सत्यापन, डिजिटल पहचान और सरकारी प्रक्रियाओं में उलझता चला गया है। आज भारत का नागरिक अपने अस्तित्व को साबित करने के लिए बार-बार सरकार के सामने खड़ा दिखाई देता है। वह जन्म लेता है तो जन्म प्रमाण पत्र चाहिए, स्कूल जाता है तो आधार चाहिए, मोबाइल लेना है तो बायोमेट्रिक चाहिए, बैंक खाता खोलना है तो केवाईसी चाहिए, शादी करनी है तो विवाह प्रमाण पत्र चाहिए, यात्रा करनी है तो पहचान पत्र चाहिए, जमीन खरीदनी है तो दर्जनों दस्तावेज चाहिए, सरकारी योजना लेनी है तो हर महीने जीवित होने का प्रमाण चाहिए।

यह स्थिति केवल प्रशासनिक व्यवस्था का विस्तार नहीं रह गई है, बल्कि धीरे-धीरे नागरिक और राज्य के बीच अविश्वास का प्रतीक बनती जा रही है। सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र में नागरिक सरकार के लिए बना है या सरकार नागरिकों के लिए? क्या किसी व्यक्ति की पहचान केवल कागज़ों और बायोमेट्रिक डेटा से तय होगी? क्या इंसान की गरिमा से बड़ा कोई दस्तावेज हो सकता है?

*पहचान का संकट: नागरिक या दस्तावेज?*

भारत में आज एक सामान्य नागरिक के पास कई प्रकार के पहचान पत्र होते हैं—आधार कार्ड, वोटर कार्ड, राशन कार्ड, पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट, परिवार पहचान पत्र, जन्म प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र, बैंक पासबुक, बिजली बिल, गैस कनेक्शन, स्वास्थ्य कार्ड और न जाने कितने अन्य दस्तावेज।

विडंबना यह है कि इनमें से कोई भी दस्तावेज हर जगह मान्य नहीं होता। एक विभाग कहता है आधार लाओ, दूसरा कहता है राशन कार्ड चाहिए, तीसरा कहता है परिवार पहचान पत्र जरूरी है, चौथा कहता है केवल पासपोर्ट चलेगा। नागरिक की पहचान कभी पूरी नहीं मानी जाती।

यह स्थिति केवल तकनीकी अव्यवस्था नहीं है, बल्कि प्रशासनिक सोच का परिणाम है जिसमें नागरिक को हमेशा “संदेह” की नजर से देखा जाता है। सरकारें मानकर चलती हैं कि व्यक्ति गलत जानकारी दे सकता है, इसलिए हर कदम पर प्रमाण मांगो, सत्यापन कराओ, बायोमेट्रिक लो, फोटो लो, हस्ताक्षर मिलाओ, फाइल बनाओ और नागरिक को दफ्तर-दफ्तर भटकाओ।

एक गरीब मजदूर, किसान, विधवा महिला या बुजुर्ग व्यक्ति के लिए यह प्रक्रिया किसी यातना से कम नहीं होती। वह सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाता है, साइबर कैफे में पैसे खर्च करता है, लाइन में खड़ा रहता है और अंत में अक्सर सुनता है—“सिस्टम डाउन है, कल आना।”

*डिजिटल इंडिया: सुविधा या नया बोझ?*

डिजिटल इंडिया का विचार सुनने में आकर्षक लगता है। सरकार ने दावा किया कि डिजिटल तकनीक भ्रष्टाचार कम करेगी, पारदर्शिता बढ़ाएगी और लोगों को सुविधा देगी। लेकिन जमीनी सच्चाई अलग दिखाई देती है।

आज गांवों में लाखों लोग ऐसे हैं जिनके पास स्मार्टफोन नहीं है। इंटरनेट की गुणवत्ता खराब है। बुजुर्गों को तकनीक समझ नहीं आती। पढ़े-लिखे लोग भी कई बार ऑनलाइन पोर्टल और ऐप्स की जटिलता से परेशान हो जाते हैं।

सरकारें मान बैठी हैं कि हर नागरिक डिजिटल रूप से सक्षम है। लेकिन भारत की वास्तविकता यह नहीं है। यहां अभी भी करोड़ों लोग ऐसे हैं जो ऑनलाइन फार्म भरने, ऐप डाउनलोड करने, ओटीपी डालने और दस्तावेज अपलोड करने की प्रक्रिया से डरते हैं।

डिजिटल इंडिया का सपना तब तक अधूरा रहेगा जब तक तकनीक इंसान के लिए सरल नहीं बनती। अगर तकनीक नागरिक को और अधिक परेशान करे, तो वह सुविधा नहीं बल्कि नया बोझ बन जाती है।

*आधार और बायोमेट्रिक का जाल*

आधार कार्ड को शुरू में केवल एक पहचान परियोजना बताया गया था। बाद में धीरे-धीरे इसे हर चीज से जोड़ दिया गया—बैंक खाते, मोबाइल नंबर, राशन, पेंशन, छात्रवृत्ति, गैस सब्सिडी, स्कूल दाखिला, अस्पताल और यहां तक कि मृत्यु प्रमाण पत्र तक।

आज स्थिति यह है कि अगर किसी व्यक्ति का फिंगरप्रिंट मशीन में मैच नहीं हुआ, तो उसका राशन रुक सकता है। बुजुर्गों के अंगूठे कई बार मशीन नहीं पहचानती। मजदूरों के हाथों की रेखाएं मिट जाती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट नहीं चलता। लेकिन सिस्टम कहता है—“ऑथेंटिकेशन फेल।”

सवाल यह है कि क्या किसी इंसान का जीवन एक मशीन के सफल या असफल होने पर निर्भर होना चाहिए?

तकनीक का उद्देश्य इंसान की मदद करना होना चाहिए, न कि इंसान को मशीन के सामने असहाय बना देना।

*नाम पर भी नियंत्रण?*

भारतीय समाज में नाम केवल पहचान नहीं होता, वह संस्कृति, परिवार, परंपरा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा होता है। लेकिन आज नाम बदलना भी एक कठिन प्रशासनिक प्रक्रिया बन चुका है।

कई राज्यों में स्कूल रिकॉर्ड, आधार, परिवार पहचान पत्र, बैंक खाते और अन्य दस्तावेजों में नाम की छोटी सी गलती सुधारने में महीनों नहीं बल्कि वर्षों लग जाते हैं।

हरियाणा जैसे राज्यों में पुराने रिकॉर्ड बदलवाना लगभग असंभव माना जाता है। जिन लोगों के नाम 1970 या 1980 के दशक में स्कूलों में गलत दर्ज हो गए थे, वे आज तक सुधार के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

लोकतंत्र में किसी व्यक्ति को अपने नाम, पहचान और निजी जीवन पर अधिकार होना चाहिए। लेकिन जब एक नागरिक अपने ही नाम में बदलाव नहीं करवा पाता, तब यह केवल प्रशासनिक समस्या नहीं रहती, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रश्न में बदल जाती है।

*हरियाणा की “जीवंत प्रमाण” व्यवस्था और महिलाओं का अपमान*

हरियाणा सरकार की दीन दयालु लाडो लक्ष्मी योजना ने एक गंभीर बहस को जन्म दिया है। योजना के तहत आर्थिक सहायता पाने वाली महिलाओं से हर महीने “जीवित होने का प्रमाण” मांगा जा रहा है। मोबाइल पर संदेश भेजे जाते हैं जिनमें महिलाओं से अपनी फोटो अपलोड करने को कहा जाता है ताकि वे साबित कर सकें कि वे जीवित हैं।

यह केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं है। यह एक सामाजिक और मानवीय प्रश्न है।

एक ओर सरकार महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की बात करती है, दूसरी ओर उन्हीं महिलाओं से हर महीने जिंदा होने का सबूत मांगती है।

ग्रामीण क्षेत्रों में हजारों महिलाएं ऐसी हैं जिनके पास स्मार्टफोन नहीं है। उन्हें साइबर कैफे या दूसरों के मोबाइल पर निर्भर रहना पड़ता है। कई महिलाएं तकनीकी जानकारी के अभाव में योजना से वंचित हो सकती हैं।

सवाल यह भी है कि जब बुजुर्ग पेंशन, विधवा पेंशन और अन्य योजनाओं में हर महीने ऐसा प्रमाण नहीं मांगा जाता, तो केवल महिलाओं के लिए यह व्यवस्था क्यों?

आर्थिक सहायता देना स्वागत योग्य कदम हो सकता है, लेकिन सहायता के बदले किसी नागरिक की गरिमा को ठेस पहुंचाना लोकतांत्रिक संवेदनशीलता नहीं कहलाता।

*सरकारी अविश्वास की राजनीति*

भारत की प्रशासनिक व्यवस्था में एक गहरी मानसिकता दिखाई देती है—नागरिक पर भरोसा मत करो।

अगर कोई व्यक्ति पेंशन ले रहा है, तो उससे बार-बार जीवित होने का प्रमाण मांगो। अगर कोई किसान सब्सिडी चाहता है, तो उससे कई प्रमाण पत्र मांगो। अगर कोई छात्र छात्रवृत्ति चाहता है, तो उसकी पहचान, आय, निवास, जाति और बैंक खाते का बार-बार सत्यापन करो।

सरकारें यह भूल जाती हैं कि हर अतिरिक्त दस्तावेज गरीब व्यक्ति के लिए अतिरिक्त बोझ होता है।.

जिस देश में करोड़ों लोग रोज कमाकर खाते हैं, वहां बार-बार दफ्तरों के चक्कर लगाना आर्थिक और मानसिक दोनों प्रकार का उत्पीड़न बन जाता है।

*क्या नागरिक की स्वतंत्रता घट रही है?*

भारतीय संविधान व्यक्ति को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है। लेकिन आज नागरिक का जीवन लगातार निगरानी, सत्यापन और डेटा संग्रह के दायरे में आ रहा है।

मोबाइल नंबर से लेकर बैंक खाते तक, यात्रा से लेकर खरीदारी तक, लगभग हर गतिविधि किसी न किसी डिजिटल रिकॉर्ड में दर्ज हो रही है।

सरकारें इसे सुरक्षा और पारदर्शिता का नाम देती हैं। लेकिन लोकतंत्र में सबसे बड़ा सवाल हमेशा यह होता है—राज्य की शक्ति की सीमा क्या होनी चाहिए?

अगर सरकार नागरिक के हर कदम पर निगरानी रखे, हर सुविधा के बदले पहचान मांगे और हर अधिकार को कागजी प्रक्रिया से जोड़ दे, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे नियंत्रण तंत्र में बदल सकता है।

*संघीय ढांचा और अलग-अलग राज्यों की समस्याएं*

भारत एक संघीय लोकतंत्र है। अलग-अलग राज्यों की अपनी प्रशासनिक व्यवस्थाएं हैं। लेकिन लगभग हर राज्य में नागरिक दस्तावेजों और सत्यापन की समस्याओं से जूझ रहा है।

*उत्तर प्रदेश*

जाति प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र और आय प्रमाण पत्र के लिए लंबी प्रक्रियाएं आम शिकायत हैं।

*बिहार*

भूमि रिकॉर्ड और पहचान दस्तावेजों में त्रुटियां वर्षों तक लोगों को परेशान करती हैं।

*राजस्थान*

डिजिटल सेवाओं के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में तकनीकी पहुंच सीमित है।

*पंजाब*

भूमि रजिस्ट्रेशन और राजस्व रिकॉर्ड में देरी आम समस्या है।

*महाराष्ट्र*

शहरी क्षेत्रों में ऑनलाइन सिस्टम होने के बावजूद कई सेवाओं में दस्तावेजों की पुनरावृत्ति होती है।

*हरियाणा*

परिवार पहचान पत्र, सामाजिक योजनाओं और दस्तावेज सत्यापन की जटिलता लगातार विवाद का विषय रही है।

इससे स्पष्ट है कि समस्या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है। यह पूरे प्रशासनिक ढांचे की सोच से जुड़ा मुद्दा है।

*गरीब सबसे ज्यादा क्यों परेशान होता है?*

एक अमीर व्यक्ति एजेंट रख सकता है, वकील कर सकता है, निजी सुविधा ले सकता है। लेकिन गरीब व्यक्ति के पास समय, संसाधन और तकनीकी सहायता नहीं होती।

अगर किसी मजदूर का राशन कार्ड बंद हो जाए, तो उसका परिवार भूखा रह सकता है। अगर किसी बुजुर्ग की पेंशन रुक जाए, तो उसकी दवा बंद हो सकती है। अगर किसी महिला का दस्तावेज गलत हो जाए, तो वह सरकारी योजना से बाहर हो सकती है।

कागजी व्यवस्था का सबसे बड़ा बोझ हमेशा कमजोर वर्ग पर पड़ता है।

*क्या यह विकास का मॉडल है?*

सरकारें अक्सर कहती हैं कि यह सब “सिस्टम सुधार” के लिए जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास का अर्थ केवल डेटा संग्रह और सत्यापन है?

*विकास का वास्तविक अर्थ होना चाहिए—*

शिक्षा की सरल पहुंच

स्वास्थ्य सुविधाएं

रोजगार

सुरक्षित जीवन

न्याय तक आसान पहुंच

सम्मानजनक प्रशासन

अगर नागरिक अपना अधिकांश समय केवल प्रमाण पत्र बनवाने में बिताने लगे, तो यह विकास नहीं बल्कि प्रशासनिक जटिलता का विस्तार कहलाएगा।

*लोकतंत्र का मूल प्रश्न: सरकार किसके लिए?*

लोकतंत्र का आधार नागरिक होता है। सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है ताकि वह जनता की सुविधा और अधिकारों की रक्षा कर सके।

लेकिन जब नागरिक ही सरकार के सामने बार-बार अपनी पहचान साबित करने लगे, तब लोकतांत्रिक संतुलन बिगड़ने लगता है।

सरकार का काम नागरिक को सम्मान देना है, न कि उसे हर समय शक की निगाह से देखना।

अगर कोई व्यक्ति दस्तावेज नहीं बनवाना चाहता, तो उसे बुनियादी अधिकारों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। नागरिकता का अर्थ केवल सरकारी डेटाबेस में दर्ज होना नहीं है। नागरिकता एक संवैधानिक और मानवीय संबंध है।

*कोरोना काल और पहचान की राजनीति*

कोरोना महामारी के दौरान भी लोगों को कई प्रकार के प्रमाण और दस्तावेजों से गुजरना पड़ा। कई जगह राशन, यात्रा और सहायता योजनाओं के लिए पहचान आधारित प्रक्रियाएं लागू की गईं।

इस दौरान यह स्पष्ट हुआ कि भारत की प्रशासनिक व्यवस्था संकट के समय भी कागजी नियंत्रण से बाहर नहीं निकल पाती।

जब लोगों को तत्काल राहत चाहिए थी, तब भी कई स्थानों पर दस्तावेज प्राथमिकता बन गए।

*क्या समाधान संभव है?*

समस्या केवल आलोचना से हल नहीं होगी। कुछ बुनियादी सुधार जरूरी हैं—

1. एकीकृत पहचान व्यवस्था

अगर सरकार पहचान प्रणाली बना चुकी है, तो एक ही पहचान हर विभाग में मान्य होनी चाहिए।

2. मानव आधारित विकल्प

जहां डिजिटल सत्यापन असफल हो, वहां मानवीय विकल्प उपलब्ध होना चाहिए।

3. ग्रामीण डिजिटल सहायता

हर गांव में मुफ्त तकनीकी सहायता केंद्र स्थापित होने चाहिए।

4. दस्तावेजों की संख्या कम हो

सरकारी सेवाओं में आवश्यक दस्तावेजों की सीमा तय होनी चाहिए।

5. सम्मानजनक प्रशासन

किसी भी योजना में ऐसी भाषा और प्रक्रिया न हो जो नागरिक की गरिमा को ठेस पहुंचाए।

6. डेटा सुरक्षा कानून

नागरिकों के बायोमैट्रिक और निजी डेटा की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

*सबसे बड़ा सवाल*

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है—क्या सरकार नागरिक पर भरोसा करती है?

अगर हर महीने किसी महिला से पूछा जाए कि “साबित करो कि तुम जीवित हो,” तो यह केवल तकनीकी सत्यापन नहीं बल्कि राज्य और नागरिक के बीच अविश्वास का प्रतीक बन जाता है।

एक लोकतंत्र में सरकार का दायित्व नागरिक को सम्मान देना है, न कि उसे हर समय प्रमाण देने के लिए मजबूर करना।

भारत एक महान लोकतांत्रिक राष्ट्र है, लेकिन लोकतंत्र केवल चुनावों से मजबूत नहीं होता। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब नागरिक सम्मान महसूस करे, जब प्रशासन सरल हो, जब सरकार जनता पर भरोसा करे और जब व्यक्ति की गरिमा को कागजों से ऊपर रखा जाए।

आज जरूरत इस बात की है कि भारत डिजिटल और प्रशासनिक सुधारों को मानवीय दृष्टिकोण से देखे। तकनीक नागरिक की सेवक बने, मालिक नहीं। दस्तावेज सुविधा का माध्यम बनें, उत्पीड़न का नहीं।

अगर भारत को वास्तव में विकसित राष्ट्र बनना है, तो उसे केवल डिजिटल डेटा नहीं बल्कि मानवीय गरिमा को केंद्र में रखना होगा। क्योंकि किसी भी लोकतंत्र की असली पहचान उसके नागरिकों के सम्मान से होती है, न कि उनके पास मौजूद कागजों की संख्या से।

*लेखक*

राजकुमार अग्रवाल

वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, राजनीतिक विश्लेषक एवं दुभाषी दैनिक ‘अटल हिन्द’ के सम्पादक।


नाबालिग बालिका से दुष्कर्म का आरोपी गिरफ्तार, दो ट्रको की टक्कर, दोनो चालक घायल, अस्पताल में भर्ती


अनूपपुर

कोतवाली अनूपपुर पुलिस द्वारा 17 वर्षीय नाबालिग बालिका के साथ दुष्कर्म के आरोपी को जिला शहडोल से गिरफ्तार किया गया है। नाबालिग बालिका द्वारा अपने माता पिता के साथ थाना कोतवाली अनूपपुर पहुंचकर रिपोर्ट दर्ज कराई गई कि रिस्तेदारी में बरहो के कार्यक्रम के दौरान मोहित पटेल निवासी ग्राम पड़रिया थाना बुढार जिला शहडोल से परिचय और दोस्ती होने के बाद मोहित पटेल नाबालिग बालिका के घर आना जाना करने लगा और इस बीच आरोपी द्वारा नाबालिग बालिका के साथ शारीरिक दुष्कर्म किया गया है। उक्त रिपोर्ट पर थाना कोतवाली अनूपपुर में अपराध क्रमांक 292/26 धारा 64(2) (m), बीएनएस एवं 5,6 पाक्सो एक्ट पंजीबद्ध किया गया।

टी.आई. कोतवाली अरविन्द जैन के नेतृत्व में महिला उपनिरीक्षक सरिता लकड़ा, प्रधान आरक्षक रीतेश सिहं, शेख रसीद एवं आरक्षक अब्दुल महिला आरक्षक अंकिता सोनी की टीम के द्वारा नाबालिग बालिका का मेडिकल परीक्षण कराया जाकर तत्काल चन्दघण्टो में आरोपी नवयुवक मोहित पटेल पिता भगवानदास पटेल उम्र करीब 23 साल निवासी ग्राम पड़रिया थाना बुढार जिला शहडोल को घर से गिरफ्तार कर न्यायालय पेश किये जाने पर उक्त प्रकरण में जेल भेजा गया है।

*दो ट्रको की जोरदार टक्कर, दोनो चालक हुए घायल, अस्पताल में भर्ती*


शहडोल जिले के जयसिंहनगर और गोहपारू थाना क्षेत्र की सीमा में स्थित चुन्दी नदी के पास रविवार सुबह दो ट्रकों की आमने-सामने जोरदार भिड़ंत हो गई। हादसा इतना भीषण था कि दोनों ट्रकों के केबिन बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए और चालक अंदर ही फंस गए। घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस टीम मौके पर पहुंची और स्थानीय लोगों की मदद से राहत एवं बचाव कार्य शुरू किया गया।

पुलिस और ग्रामीणों ने काफी मशक्कत के बाद दोनों ट्रकों को पीछे खिंचवाकर केबिन में फंसे चालकों को बाहर निकाला। रेस्क्यू के दौरान मौके पर लोगों की भीड़ जमा रही। गंभीर रूप से घायल दोनों चालकों को तत्काल उपचार के लिए अस्पताल भेजा गया, जहां उनका इलाज जारी है।

समय रहते पुलिस द्वारा किए गए रेस्क्यू के कारण दोनों घायलों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। प्रारंभिक जांच में तेज रफ्तार और सड़क पर नियंत्रण खोने की आशंका जताई जा रही है। पुलिस दुर्घटना के कारणों की जांच शुरू कर दी है।

तप रहे धरती गगन, उगल रही है आग, नहाने देता नहीं टंकी का उबला पानी, उफ ये भयंकर गर्मी


*उफ ये भयंकर गर्मी*


तप रहे धरती गगन उफ ये भयंकर गर्मी,

उगल रही है आग उफ ये भयंकर गर्मी।


इसके जुल्मो सितम से बिजली ही बचाती है,

एसी फ्रिज कूलरों से ठंडकें बरसाती है,

रौब बिजली ने अगर झाड़ा गर्मी मैडम पर,

वो उसके ट्रांसफार्मर ही फूंक जाती है।


 नहाने देता नहीं टंकी का उबला पानी,

फिर सताती है जमके उफ ये भयंकर गर्मी।


ब्यूटी पार्लर से सज के नौतपा में आती है,

फिर तो ये गरमा-गरम हीरोइन सी लगती हैं,

गर्मियों की लगे मिस इंडिया मिस वर्ल्ड कभी, 

मलिका-ए-तपन ग्रीष्म सुंंदरी सी लगती है।


आ रही लू की बिकनी पहने छुपा लो चेहरे, 

कनपटी सेक देगी उफ ये भयंकर गर्मी।


*गीतकार अनिल भारद्वाज एडवोकेट हाईकोर्ट ग्वालियर*

सशक्त हस्ताक्षर का चतुर्थ वार्षिकोत्सव दिव्यता-भव्यता हर्ष व उल्लास के साथ समारोह संपन्न - कवि संगम त्रिपाठी 


जबलपुर

सशक्त हस्ताक्षर का चतुर्थ वार्षिक कार्यक्रम बड़ी दिव्यता-भव्यता के साथ कला वीथिका में हर्ष व उल्लास के साथ सम्पन्न हुआ ၊ संस्थापक गणेश श्रीवास्तव प्यासा ने अपनी वाणी से सभी अतिथियों का अभिनंदन किया।प्रथम चरण में राष्ट्रीय कवि सम्मेलन हुआ जिसमें देश के कोने से आये। कवि-कवियित्रियों ने सहभागिता की ၊ दूसरे चरण में विमोचन व सम्मान समारोह हुआ ၊

मुख्य अतिथि रजनी साहू सुधा अध्यक्षता महामहोपाध्याय आचार्य डॉ. हरिशंकर दुबे, विशिष्ट अतिथि डॉ. अन्नपूर्णा तिवारी अनु , आनंद ज्योति पाठक, डॉ. कुमकुम शुक्ला, रत्ना श्रीवास्तव, डॉ. सुरेन्द्रलाल साहू निर्विकार,सारस्वत अतिथि राजेश पाठक प्रवीण, समीक्षक डॉ. मुकुल तिवारी, यशोवर्धन पाठक की गरिमामय उपस्थिति रही ၊ सशक्त हस्ताक्षर की स्मारिका सहित रजनी साहू सुधा की पुस्तक समवेतस्वर एवं डॉ. अन्नपूर्णा तिवारी की पुस्तक  सृजन मेरे-भाव मेरे का विमोचन हुआ ၊ सभी अतिथियों का शाल, कलमश्री,अंगवस्त्रम्,मानपत्र,स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया ၊

कार्यक्रम में डॉ. हरिदास बड़ोदे हरिप्रेम मेहरा बैतूल,डॉ. मनोज फगवाड़वी  फगवाड़ा पंजाब,सुवीर श्रीवास्तव वीर, शिवानी भगत,जी.डी. अग्रवाल,निरंजन द्विवेदी वत्स, मदन श्रीवास्तव, बालमुकुंद लखेरा ढीमरखेड़ा,मनोहर सोनी, राजवीर शर्मा पत्रकार अम्बाह,डॉ. नीरज चौधरी नीर,राम वल्लभ गुप्त इंदौरी,अमरेन्द्र नारायण,विवेक शैलार, सिद्धेश्वरी सराफ शीलू,विष्णु बाजपेई विकल कटनी,सुरेश सचान पटेल कानपुर, विवेक गुप्ता सहर,विजय बागरी कछार गाँव, जयप्रकाश श्रीवास्तव,प्रकाश सिंह ठाकुर इंद्राना,सलिल,सुभाष मणि वैरागी, सुभाष तिवारी,उज्जवल मिश्रा,प्रेमकुमार पालीवाल,नायकजी,संदीप सक्सेना, अन्नपूर्णा दुबे,अनंतराम चौबे, डॉ. ललिता यादव बिलासपुर,डॉ. निवेदिता वर्मा मेघा भाटापारा,रश्मि अग्रवाल किरन बिलासपुर, डॉ. नवनीता दुबे मण्डला,लखन लाल रजक, अमरजीतसिंह,अनुराधा चौधरी,पार्वती पटेल,मनोज दुबे,डॉ. तनुजा चौधरी, डाॅ. अनुराधा गर्ग दीप्ति, दिवाकर शर्मा,संदीपजी,तरुणा खरे, प्रीति नामदेव भूमिजा, अनुजा दुबे पूजा महाराष्ट्र,मधु जैन माधवी मैहर, रागिनी मित्तल कटनी,महेश स्थापक, नंदनी प्रसाद पाण्डेय, केशरी प्रसाद पाण्डेय,संजय पाण्डेय,महब जबलपुरी,सलिल तिवारी,अमरसिंह वर्मा, रितु सक्सेना, चंद्रकला सक्सेना, वंदना सोनी विनम्र, नीतू आशीष साहू, नीतू रंजीत साहू,शिल्पा साहू, रेखा साहू,सीमा साहू, डॉ.संध्या शुक्ल मृदुल, डॉ. दीप्ति खरे, डाॅ. उर्मिला साँईप्रीत कटनी,अमिता शुक्ल, अरुण शुक्ल,सरोज खरे,सचिन खरे, रजनी कैलाश साहू,कुंजीलाल चक्रवर्ती निर्झर भेड़ाघाट,सुशील श्रीवास्तव,एड. तृप्ति त्रिवेदी,प्रदीप नामदेव नम्र पनागर,एड. प्रभा खरे अखिल, डॉ. सलमा जमाल,सुभाष शलभ,डॉ. छाया सिंह,उर्मिला श्रीवास्तव,प्रभा विश्वकर्मा शील,मीना भट्ट, करुणा दुबे कीर्तिश्री, विजय नेमा अनुज,संतोष नेमा संतोष,सुरेश मिश्र विचित्र,अभय तिवारी,रुपराम नामदेव, कैलाश नामदेव, आनंद श्रीवास्तव,रश्मि खरे, निर्मला तिवारी, शाश्वत खरे,आरती श्रीवास्तव नृत्य,ओ.पी. श्रीवास्तव, आरती श्रीवास्तव,सुरेश सोनी दर्पण,अमरनाथ सोनी,डॉ. भावना दीक्षित, चंद्रप्रकाश श्रीवास्तव,यू.एस.दुबे,विशेष सहयोगी मदन श्रीवास्तव, कवि संगम त्रिपाठी,संचालन गणेश श्रीवास्तव, सिद्धेश्वरी सराफ शीलू, आभार प्रदर्शन लखन रजक ने किया।

प्रेरणा हिंदी प्रचारिणी सभा ने आदेश जैन को दिया राष्ट्रभाषा सम्मान


नागपुर

प्रेरणा हिंदी प्रचारिणी सभा के संस्थापक कवि संगम त्रिपाठी, प्रदीप मिश्र अजनबी दिल्ली महासचिव प्रेरणा हिंदी प्रचारिणी सभा व डॉ लाल सिंह किरार राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रेरणा हिंदी प्रचारिणी सभा के मार्गदर्शन में नागपूर आकाशवाणी विभावरी के उद्घोषक व विदर्भ हिंदी साहित्य सम्मेलन के संयोजक साहित्यिक मंच के संस्थापक आदेश जैन को सम्मानित किया गया।

प्रेरणा राष्ट्रभाषा  सम्मान स्मृति चिन्ह, अंगवस्त्र आदि आदेश जैन को मेघा अग्रवाल नागपुर महाराष्ट्र हिंदी प्रचारक व कवयित्री ने प्रदान किया। प्रेरणा हिंदी प्रचारिणी सभा हिंदी सेवियों को सम्मानित करने के साथ ही हिंदी राष्ट्रभाषा अभियान को सतत प्रचारित व प्रसारित कर रही है।

अखिल भारतीय लोधी, क्षत्रिय महासभा व गोंड महासभा के तत्वावधान में राजा हिरदेशाह की होगी शौर्य यात्रा


भोपाल

अखिल भारतीय लोधी, लोधा, लोध क्षत्रिय महासभा मध्यप्रदेश, राजा हिरदेशाह शोध संस्था तथा गोंड महासभा के तत्वावधान में 28 अप्रैल 2026 को राजा हिरदेशाह लोधी के बलिदान दिवस पर शौर्य यात्रा का आयोजन भोपाल के जम्बूरी मैदान पर आयोजित किया जा रहा है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव होंगे। प्रदेश के श्रम तथा पंचायत कल्याण मंत्री प्रहलाद पटेल कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि होंगे।

अखिल भारतीय लोधी, लोधा, लोध क्षत्रिय महासभा के प्रदेश अध्यक्ष, पूर्व मंत्री विधायक जालम सिंह पटेल एवं पूर्व विधायक एवं युवा राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष प्रध्युम्न सिंह लोधी ने संयुक्त पत्रकार वार्ता में इस वृहद आयोजन की जानकारी दी। जालम सिंह पटेल ने कहा कि यह आयोजन इतिहास की अनदेखी का शिकार उन क्रांतिवीर राजाओं और जनजातीय योद्धाओं के स्मरण का महापर्व है जिनके बलिदान से आजादी की नींव रखी जा सकी लेकिन उनके योगदान को इतिहासकारों के पूर्वाग्रहों ने गुमनाम बना दिया। 1857 में देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम से पहले ही 1842 में पिछड़े, दलित और आदिवासी राजाओं ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया था। इस विद्रोह का नेतृत्व हीरापुर के बहादुर राजा हिरदेशाह लोधी ने किया, बड़ी संख्या में बुंदेला राजा और योद्धा इस संघर्ष में जुड़ते गए। गोंड और राजगोंड राजाओं ने भी इस विद्रोह में अंग्रेजों के हौसले को पस्त किया। करीब दो साल चला यह संघर्ष आपसी दगाबाजी तथा प्रमुख राजाओं और उनके परिजनों को फांसी दिए जाने से कमजोर पड़ गया। अंग्रेजों के खिलाफ यह पहला सशस्त्र विद्रोह था लेकिन इतिहासकारों ने इसे स्वतंत्रता आंदोलन का गौरव नहीं बनने दिया।

जालम सिंह पटेल ने बताया कि ब्रिटिश हुकूमत ने देश में जमीनों को हड़पने के लिए तीन काले कानून बनाकर लागू किए थे। किसानों से 6 से 30 गुना तक लगान वसूला जाने लगा था, जमीन को सिकमी पर देने के लिए भी रोक लगा दी गई थी इस कानून का उल्लंघन करने पर जमीन राजसात कर ली जाती थी, मृत्यु के बाद जमीन का नामांतरण बंद कर दिया गया था और जमीन राज साहब की जाने लगी थी। 1836 में 5 साल के लिए ले गए कानून को बाद में 20 साल के लिए बढ़ा दिया गया इन कानूनों ने साधारण किसानों के साथ जमीदारों के लिए भी जमीन बचाना मुश्किल कर दिया था। राजा हिरदेशाह लोधी ने इन कानूनों के खिलाफ दलित, पिछड़े और आदिवासी राजाओं को एकजुट कर क्रांति का शंखनाद किया। अंग्रेजों की फौज में नर्मदा टाइगर के नाम से विख्यात राजा हिरदेशाह की गिरफ्तारी पर दस हजार का इनाम घोषित था। बड़े इनाम के लालच में शाहगढ़ के बखतबली बुंदेला ने दिसंबर 1843 को उन्हें धोखे से गिरफ्तार करा दिया। राजा हिरदेशाह को नौ महीने तक चुनार जेल में रखा गया। 1857 के विद्रोह में उनके पुत्र मेहरबान सिंह लोधी और भाई को फांसी की सजा दी गई। राजा हिरदेशाह 28 अप्रैल 1858 को शहीद हुए।

बुंदेला विद्रोह में गोंड राजा डेलन शाह ने बड़ी कुर्बानी दी। डेलन शाह को जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए अंग्रेजों ने 2000 रुपए इनाम घोषित किया था। डेलन शाह को पकड़ पाने में नाकाम अंग्रेजों की फौज ने उनके परिवार पर कहर बरपाया। 17 जनवरी 1858 को डेलन शाह के 16 परिवार सदस्यों और साथियों को एक साथ फांसी दे दी गई इसमें उनका पांच साल का पोता भी शामिल था। इसी दिन डेलन शाह के चार अन्य परिजनों को गोली मारी गई। डेलन शाह इस अन्याय से टूट गये और गिरफ्तार कर लिए गए। इन्हें 16 मई 1858 को फांसी दी गई। मदनपुर के गोंड राजा नरवर शाह पर एक हजार इनाम घोषित था, इनकी जेल में रहते मौत हुई। मधुकर शाह बुंदेला को फरवरी 1844 में नरहट सागर में फांसी दी गई। दीवान गजराज सिंह को 29 नवंबर 1857 को चडालगढ़ जबलपुर में फांसी दी गई। अंग्रेजों ने अनेक वीरों पर भारी भरकम इनाम घोषित किया था, सावंत सिंह पर5000 का इनाम, चंद्रपुर के दीवान जवाहर सिंह पर 10000, राजा परीक्षित जैतपुर पर 10000, दीवान बहादुर सिंह,  गणेश जू, गिराट के  परीक्षित, सागर के लक्ष्मण सिंह, पहलवान सिंह पर पांच-पांच शहर का इनाम घोषित किया गया गोकुल सिंह दरियाव सिंह पंचम सिंह और गणेश जी पर 3 000 आदमपुर के शाह चंदेरी के धर्म ग्रह पर ₹2000 के नाम घोषित थे। इन वीरों का नाम अमर है लेकिन इतिहास इनका उल्लेख नहीं करता। राजा हिरदेशाह लोधी शोध संस्था द्वारा अब लगातार ऐतिहासिक तथ्यों को एकत्रित कर देश के सामने लाया जा रहा है।

कार्यक्रम में मुख्‍यमंत्री डॉ. मोहन यादव, प्रहलाद सिंह पटेल (कैबिनेट मंत्री), दीदी उमा भारती (पूर्व मुख्‍य मंत्री), धर्मेन्‍द्र भाव सिंह लोधी (राज्‍यमंत्री), राहुल सिंह (सांसद), विपिन कुमार वर्मा (डेविड), कमलेश प्रताप शाह (विधायक), प्रेम शंकर वर्मा (विधायक),, प्रहलाद सिंह लोधी (विधायक), प्रीतम सिंह लोधी (विधायक), नीरज सिंह लोधी (विधायक), वीरेन्‍द्र सिंह लोधी (विधायक), अनुभा मंजारे (विधायक), दीदी रामसिया भारती (विधायक), राजकुमार कर्राहे (विधायक), राजा कौशलेन्‍द्र सिंह जूदेव लोधी (वंशज, राजा हिरदेशाह लोधी), ठाकुर राम कुमार सिंह (वंशज, गोंड राजा नरवर शाह) शामिल होंगे।

1842 की भारत की पहली अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति (बुंदेला विदोह) के जनक टाइगर राजा हिरदेशाह लोधी की पुण्यतिथि 28 अप्रैल को  जंबूरी मैदान भोपाल में मुख्यमंत्री ,मंत्री, सांसद विधायक सहित कई दिग्गज होंगे शामिल

सशक्त हस्ताक्षर की 47वीं काव्य गोष्ठी संपन्न हुई, अतिथियों, कवि-कवयित्रियों, काव्य प्रेमियों का हुआ अभिनंदन


जबलपुर -   

सशक्त हस्ताक्षर की 47 वीं काव्य गोष्ठी नूतन मराठी स्कूल गोल बाजार में सानंद सम्पन्न हुई ၊ सर्वप्रथम संस्थापक गणेश श्रीवास्तव प्यासा ने अपने शब्द सुमनों से सभी अतिथियों,कवि-कवयित्रियों,काव्य प्रेमियों का अभिनंदन किया ၊ सरस्वती वंदना लखन रजक ने की ၊

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि नेत्र विशेषज्ञ डॉ.सुरेन्द्रलाल साहू निर्विकार, अध्यक्षता महामहोपाध्याय आचार्य डॉ. हरिशंकर दुबे, विशिष्ट अतिथि आचार्य विजय तिवारी किसलय, अरुण शुक्ल, सारस्वत अतिथि राजेश पाठक प्रवीण,मंगल भाव संतोष नेमा संतोष की गरिमामय उपस्थिति रही। महेश स्थापक, दिवाकर शर्मा,इन्द्र सिंह राजपूत, मंजू इंग्ले, शेखर शर्मा स्वागत, अभिनंदन में सहभागी रहे।


कवि विवेक कुमार गुप्ता ने गोष्ठी का शुभारंभ किया।  प्रेमकुमार पालीवाल ने शानदार मुक्तक पढ़े ၊ अखिलेश खरे अखिल की रचना में माटी की खुश्बू थी। लखनलाल रजक,अमरसिंह वर्मा, शिवानी भगत, कालीदास ताम्रकार,विजय सिन्हा कमर इलाहाबादी उर्फ कमर जानी,जय प्रकाश श्रीवास्तव, अभयतिवारी, दीनदयाल तिवारी बेताल, उर्मिला श्रीवास्तव, केशरी प्रसाद पाण्डेय वृहद,संजय पाण्डेय, विजय नेमा अनुज ने एक से बढ़कर एक रचनाएँ पढ़ी। मंचस्थ अतिथियों ने भी मंच को ऊँचाईयाँ दी। संचालन गणेश श्रीवास्तव प्यासा,व आभार प्रदर्शन मदन श्रीवास्तव ने किया।

सीएचसी में मरीज परेशान, मेडिकल स्टोर हो रहे मालामाल, बोलेरो पलटी, चार लोग हुए घायल


शहडोल

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सीएचसी बुढार में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को लेकर गंभीर लापरवाही सामने आ रही है। प्राथमिक उपचार में उपयोग होने वाली जरूरी दवाइयों का अभाव बना हुआ है, जिससे मरीजों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, अस्पताल में रेबीज और टीटी के इंजेक्शन उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में गरीब और दूर-दराज के गांवों से आने वाले मरीजों को मजबूरन बाहर की मेडिकल दुकानों से महंगे दामों पर दवाइयां खरीदनी पड़ रही हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि वे अपनी रोज़ी-रोटी छोड़कर इलाज के लिए अस्पताल पहुंचते हैं, लेकिन वहां भी उन्हें प्राथमिक इलाज तक नहीं मिल पा रहा। इतना ही नहीं, जब दवाइयों की कमी के बारे में पूछा जाता है तो पर्ची में लिखने के बजाय सिर्फ मौखिक रूप से बाहर से दवा लेने की सलाह दी जाती है, जिससे पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

बड़ा सवाल यह है की जब सरकारी अस्पतालों में ही जरूरी दवाइयां उपलब्ध नहीं होंगी, तो गरीब मरीजों का इलाज कैसे संभव होगा। स्वास्थ्य विभाग को इस ओर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है, ताकि मरीजों को समय पर और मुफ्त उपचार मिल सके।

इस मामले में बुढार अस्पताल की बीएमओ डॉ. शैली जैन ने बताया की पिछले दो दिनों से इंजेक्शन अस्पताल में उपलब्ध नहीं हैं। मैंने इंडेंट कर दिया है। आवश्यकता होने पर मरीज बाहर से लगवा सकते हैं।

*बोलेरो पलटी, चार लोग हुए घायल अस्पताल में भर्ती*

अनूपपुर जिले के अमरकंटक  मां नर्मदा जी की उद्गम स्थली/पवित्र नगरी अमरकंटक से लगभग 19 किमी दूर शहडोल रोड भुंडा कोना के आगे हनुमान मंदिर पास में एक सड़क हादसा सामने आया है । पौंडकी के पहले स्थित हनुमान मंदिर के पास तेज रफ्तार बोलेरो वाहन अनियंत्रित होकर पलट गई जिसमें सवार चार लोग गंभीर रूप से घायल हो गए ।

जानकारी के अनुसार वाहन अमरकंटक से लालपुर विश्वविद्यालय की ओर जा रही थी तभी अचानक चालक का संतुलन बिगड़ने से हादसा हो गया । दुर्घटना के बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई ।

स्थानीय ग्रामीणों और राहगीरों की मदद से घायलों को तुरंत बाहर निकालकर उपचार के लिए भेजा गया । सभी की हालत गंभीर बताई जा रही है । सूचना मिलते ही पुलिस व प्रशासन मौके पर पहुंचकर जांच में जुट गए हैं । प्रारंभिक तौर पर तेज रफ्तार और सड़क की स्थिति को हादसे का कारण माना जा रहा है।

चोरी करते 4 चोर रंगे हाथों गिरफ्तार, कपड़ा दुकान में लगी आग, जला लाखो का सामान


अनूपपुर

रामनगर पुलिस ने बड़ी कार्यवाही करते हुए खदान में चोरी करते 4 आरोपियों को रंगे हाथों गिरफ्तार किया है। आरोपियों के कब्जे से कुल ₹75,000 मूल्य का माल जप्त किया गया है।

थाना रामनगर क्षेत्र के अमाडांड़ OCM खदान में सुरक्षा प्रभारी संजय कुमार मिश्रा द्वारा सूचना दी गई कि बीती रात करीब 2:30 बजे अज्ञात व्यक्ति स्टोर में रखी केबल चोरी कर रहे हैं। सूचना मिलते ही थाना प्रभारी सुमित कौशिक के नेतृत्व में पुलिस टीम ने तत्काल मौके पर पहुंचकर घेराबंदी की और आरोपियों को चोरी करते समय ही पकड़ लिया।

गिरफ्तार आरोपियों में जैनुल आबेदीन (36 वर्ष), मोहम्मद साकिल (25 वर्ष), जलेश्वर चौधरी (35 वर्ष) निवासी कोतमा एवं रामदास निवासी मलगा (42 वर्ष) शामिल हैं। पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से एक एंड्रॉइड मोबाइल, दो कीपैड मोबाइल, एक मोटरसाइकिल (टीवीएस स्पोर्ट्स, कीमत करीब ₹70,000) तथा लगभग 5-7 मीटर कॉपर केबल (कीमत करीब ₹5,000) जप्त की है। पुलिस ने आरोपियों के विरुद्ध अपराध क्रमांक 91/26 के तहत धारा 331(4), 305(B) , 3(5) बीएनएस में मामला दर्ज कर सभी आरोपियों को न्यायालय में पेश किया है ।

*कपड़ा दुकान में लगी आग*


शहडोल जिले के खैरहा थाना क्षेत्र से एक बड़ी घटना सामने आई है, जहां राजेंद्र गेस्ट हाउस के बगल में स्थित नरेंद्र जायसवाल के कॉम्प्लेक्स में संचालित कपड़े की दुकान में अचानक भीषण आग लग गई। देखते ही देखते आग ने विकराल रूप धारण कर लिया और दुकान में रखा कपड़ा सहित अन्य सामान आग की लपटों में घिर गया।

आग इतनी तेजी से फैली कि कुछ ही देर में दुकान में रखा पूरा सामान जलकर खाक हो गया। इस हादसे में दुकान मालिक को लाखों रुपए के नुकसान की आशंका जताई जा रही है। आग लगने का सही कारण फिलहाल स्पष्ट नहीं हो पाया है, हालांकि प्रारंभिक तौर पर शॉर्ट सर्किट से आग लगने की संभावना व्यक्त की जा रही है। घटना की सूचना मिलते ही खैरहा थाना पुलिस मौके पर पहुंच गई और हालात को संभाला। वहीं धनपुरी नगरपालिका की दमकल की गाड़ी ने मौके पर पहुंचकर कड़ी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया। 

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