श्री गोपाल कृष्ण मंदिर का 39वां स्थापना दिवस धूमधाम व हर्षोल्लास के साथ मनाया गया


देवघर

स्थानीय कास्टर टाउन स्थित श्री गोपाल कृष्ण मंदिर का 39वां स्थापना दिवस समारोह पूरे हर्षोल्लास के साथ धूमधाम से मनाया गया। 

इस अवसर पर श्री गोपाल कृष्ण मंदिर का फूलों व पुष्पों से भव्य आकर्षक श्रृंगार किया गया। साथ ही, रंग-बिरंगे लाइटों व पुष्पो से पूरे मंदिर परिसर को सजाया गया। 

इस अवसर पर गायकों द्वारा भक्तिमय भजनों की अनुपम व रोचक प्रस्तुति की गई। इस भक्तिमय प्रस्तुति से महिला-पुरुष  भक्तगण व आगंतुक भक्ति में मग्न हो उठे। पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया।।

आयोजन में उपमहापौर टीप चटर्जी, तारा चंद जैन, प्रदीप बाजला, राष्ट्रीय हिन्दू परिषद (भारत) के जिला अध्यक्ष प्रभाष गुप्ता, श्याम कीर्तन मंडल के अध्यक्ष संजय बंका (गुडु बंका) एवं अन्य अनेकों गणमान्य लोग उपस्थित रहे। 

इस अवसर पर  पुरोहितों द्वारा विधिवत पूजा-भोग व आरती की गई। आयोजन में अभिषेक तुलस्यान एवं ज्योत्सना तुलस्यान की सक्रिय व सराहनीय भूमिका रही, जिनके अथक व सक्रिय प्रयास से आयोजन का सफलतापूर्वक संचालन हुआ। आयोजन में भक्तों की भारी भीड़ देखी गई।

पं. निरंजन द्विवेदी वत्स का 75 वां जन्मदिन (अमृत महोत्सव) धूमधाम से मनाया गया 


    जबलपुर -  संस्कारधानी जबलपुर के वरिष्ठ कवि साहित्यकार समाजसेवी पं. निरंजन द्विवेदी वत्स जी का 75 वां जन्मदिन (अमृत महोत्सव) धूमधाम से मनाया गया। आयोजन के मुख्य अतिथि आचार्य डॉ हरिशंकर दुबे, कार्यक्रम अध्यक्ष शिवकुमार पटेल, सारस्वत अतिथि कुलदीप सिंह सिसोदिया, नलिन कांत बाजपेयी, संजय चौधरी। विशिष्ट अतिथि अर्चना सिसोदिया पार्षद, सोनिया रंजित सिंह पार्षद, भापकर पार्षद,  मोनिका सिंह पार्षद, विराजमान रहे। मंगल भाव राजेश पाठक प्रवीण ने अभिव्यक्त किये।

              कार्यक्रम का शुभारंभ सीता राम जी के पूजन अर्चन से प्रारंभ हुआ। सरस्वती वंदना कवयित्री वंदना सोनी विनम्र ने किया। अखिलेश खरे अखिल व सुनील तोमर के संचालन में उपस्थित कवि व कवयित्री जयप्रकाश श्रीवास्तव, दीपक तिवारी ' दीपक' , डॉ प्रशांत मिश्रा, मदन श्रीवास्तव, कृष्णा राजपूत, गणेश श्रीवास्तव प्यासा, शैली दीवान, वंदना सोनी विनम्र, तरुणा खरे ' तनु' , एम. पी. सिंह ' निकुंभ ' , अखिलेश खरे, सुनील तोमर, अनुराग तिवारी, सुंदरलाल साहू ' निर्विकार ' , राकेश राकेन्दू, विजय नेमा ' अनुज ' , सुभाष मणि बैरागी, विजय विश्वकर्मा, प्रकाश ठाकुर, कवि संगम त्रिपाठी, संतोष नेमा ' संतोष ' , पुरुषोत्तम पटेल तन्हा, रामप्रवेश निराला, सतीश नवल आदि ने काव्य पाठ किया।

      कवि संगम त्रिपाठी व निखिल द्विवेदी के निर्देशन में आयोजित वरिष्ठ कवि साहित्यकार समाजसेवी पं निरंजन द्विवेदी वत्स जी के 75 वें जन्मदिन अमृत महोत्सव में संस्कारधानी जबलपुर की साहित्यिक सामाजिक संस्थाएं पाठक मंच अमरतलाल, तुलसी साहित्य समिति, मंथन, वर्तिका, पाथेय, सशक्त हस्ताक्षर, मध्य भारत साहित्य परिषद, जबलपुर पारिवारिक प्रकाशक, सनाढ्य संगम व उपस्थित कवि कवयित्रियों, जनप्रतिनिधियों, समाजसेवियों, अतिथियों व निरंजन द्विवेदी वत्स के बाल सखाओं, सहयोगियों व अनेक शुभचिंतक की गरिमामय उपस्थिति में जन्मदिन मनाया गया वो भव्य व ऐतिहासिक रहा। निरंजन द्विवेदी वत्स आयोजन की भव्यता और दिव्यता को देखकर भावविभोर हो गये और उनकी वाणी सागर की लहरों सी तरंगों सा अमृत की बूंदों सा मन मस्तिष्क में समा गई। आभार दीपक तिवारी ' दीपक ' ने अभिव्यक्त किये।

सशक्त हस्ताक्षर की स्वर्णिम 50 वीं काव्य गोष्ठी में गूॅंजी साहित्य की स्वर धारा 


जबलपुर

सशक्त हस्ताक्षर की50 वीं काव्य गोष्ठी चंचलबाई महाविद्यालय में सानंद सम्पन्न हुई। संस्थापक गणेश श्रीवास्तव प्यासा ने सभी अतिथियों, साहित्य मनीषियों का अपनी ओर से सभी का अभिनंदन किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ अलकेश चतुर्वेदी, अध्यक्षता महामहोपाध्याय आचार्य डॉ. हरिशंकर दुबे, विशिष्ट अतिथि डॉ. सुरेन्द्रलाल साहू निर्विकार, डॉ. अरुणा पान्डे मंगल भाव कवि संगम त्रिपाठी की गरिमामय उपस्थिति रही। अरुण शुक्ल, अमरनाथ सोनी, महेश स्थापक, दिवाकर शर्मा,प्रीति शुक्ला की स्वागत अभिनंदन में सहभागिता रही। सरस्वती वंदना अनुराधा गर्ग दीप्ति ने की।

           गोष्ठी का शुभारंभ कवि कालिदास ताम्रकार काली ने की । सुवीर श्रीवास्तव वीर, शिवानी भगत, इन्द्राना से प्रकाशसिंह ठाकुर, भेड़ाघाट से कुंजीलाल चकवर्ती निर्झर , उर्मिला श्रीवास्तव, विवेक कुमार गुप्ता सहर, आशा मालवीय, अखिलेश खरे अखिल,प्रेम कुमार पालीवाल,दीनदयाल तिवारी बेताल,जय प्रकाश श्रीवास्तव,कौशिक सेन गुप्ता,प्रभा विश्वकर्मा शील,लखन रजक, विजय सिन्हा कमर इलाहावादी, सुशील श्रीवास्तव, मदन श्रीवास्तव,श्रीमती तरुणा श्रीवास्तव, प्रीति नामदेव भूमिजा,विजय विश्वकर्मा,पं निरंजन द्विवेदी वत्स ,डॉ. मुकुल तिवारी, अमर सिंह वर्मा, वंदना सोनी विनम्र, संध्या द्विवेदी,एम. एल. शर्मा नयन,ज्योति  मिश्रा ने एक से बढ़कर एक रचनाओं की प्रस्तुति देकर मंच को चरम पर पहुंचाया । मंचस्थ अतिथियों ने भी रचना पाठ कर मंच को ऊँचाईयाँ दी । संचालन गणेश श्रीवास्तव प्यासा व आभार प्रदर्शन तरुणा खरे तनु ने किया।

बाबा विश्वनाथ की नगरी में 'गंगांजलि' साझा काव्य संग्रह का भव्य लोकार्पण


वाराणसी

बाबा विश्वनाथ की पावन धरती पर आयोजित 'बाबा श्री काल भैरव कवि सम्मेलन व सम्मान समारोह' में साझा काव्य संग्रह 'गंगांजलि' का भव्य लोकार्पण किया गया। यह साहित्यिक आयोजन देश भर से आए तमाम विद्वानों, साहित्यकारों और कवियों की गरिमामयी उपस्थिति में संपन्न हुआ।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में जबलपुर से पधारे प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य कवि संगम त्रिपाठी उपस्थित रहे, जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता सागर के प्रख्यात शिक्षाविद् डॉ. महेंद्र सिंह गौर ने की।

*साहित्य मनीषियों का रहा जमावड़ा*

विद्वानों की इस सभा में 'गंगांजलि' के लोकार्पण के अवसर पर काशी हिंदी विद्यापीठ के कुलसचिव इंद्रजीत तिवारी 'निर्भीक', कुलाधिपति कवि सुखमंगल सिंह 'मंगल', उपकुलसचिव डॉ. ओमप्रकाश पांडेय 'निर्भर', डॉ. राम अवतार पांडेय (वाराणसी), शिवनाथ सिंह (रायबरेली), अभिमन्यु पांडेय (कुशीनगर) और प्रयागराज से अमित शर्मा विशेष रूप से मंचासीन रहे। इस भव्य आयोजन में राष्ट्रीय स्तर के कई जाने-माने कवि और कवयित्रियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

*जन्मदिन के जश्न से यादगार बना आयोजन*

समारोह के दौरान साहित्य के इस उत्सव के साथ-साथ काशी हिंदी विद्यापीठ के कुलसचिव इंद्रजीत तिवारी 'निर्भीक' का जन्मदिन भी धूमधाम से मनाया गया। उपस्थित सभी अतिथियों ने उन्हें शुभकामनाएं दीं, जिससे यह आयोजन और भी यादगार बन गया।

*भावनाओं का अद्भुत संगम है 'गंगांजलि'*

साझा काव्य संग्रह 'गंगांजलि' को भावनाओं का एक अद्भुत काव्य संगम बताया गया है। इस पुस्तक के संपादक डॉ. अजय शुक्ल हैं। इस संग्रह में मुख्य रूप से जबलपुर के हास्य-व्यंग्य कवि संगम त्रिपाठी, बुरहानपुर के कवि व लेखक पंकज बुरहानपुरी, लखनऊ (गोमती नगर) के गीतकार कवि श्याम फतनपुरी और प्रयागराज के कवि व लेखक डॉ. सोमनाथ शुक्ल की उत्कृष्ट रचनाओं को समाहित किया गया है।

जीने की आरजू छीन क्या खुश न हुआ मन तेरा, तू ने मेरी हँसी छीन ली रूप चुराया मेरा




*रूप चुराया मेरा*


जीने की आरजू छीन क्या खुश न हुआ मन तेरा,

तू ने मेरी हँसी छीन ली रूप चुराया मेरा।


तेरे सुंदर से सुंदर 

मनमोहक चित्र बनाए,

पूजा तुझे उम्र भर तुझ पर 

गीत लिखे फिर गाए।


होटों से बंसी ‌धुन छीन मधुर सुर छीना मेरा,

तू ने मेरी हँसी छीन ली रूप चुराया मेरा।


कर्क रोग जीने की मोहलत 

कम से कम देता है,

दे कर कई कष्ट जिंदगी 

घायल कर देता है।


सांसें रोईं धड़कन रोई हृदय रुलाया मेरा,

तू ने मेरी हँसी छीन ली रूप चुराया मेरा।


ये विनम्र विनती है 

अपने भक्त को क्षमा करना,

जीवन के आखिरी छोर पर 

अपने दर्शन देना। 


क्यों इतने दुख लिखे भाग्य में दोष बताना मेरा,

तू ने मेरी हंसी छीन ली रूप चुराया मेरा।


गीतकार अनिल भारद्वाज एडवोकेट हाईकोर्ट ग्वालियर

नियम, कानून ना मानने वालों का कैसा संवैधानिक अधिकार, नाबालिग से बलात्कारियों की सजा फांसी तय हो- मनोज द्विवेदी


अनूपपुर

दिल्ली के निर्भया काण्ड के बाद आज भी देश मे कुछ भी नहीं बदला है। समाज मे छुपे भेडिये और उन्हे बचाने वाले लोग बलात्कार की घटना मे बराबर के जिम्मेदार हैं । ऐसी घटनाओं की फास्ट ट्रैक अदालतों मे सुनवाई और तय समय मे फांसी की सजा नहीं दी जाएगी, राक्षसों के मन मे समाज, कानून का कोई भय उत्पन्न नहीं होगा। 

सरकार यह भी सुनिश्चित करे कि जो लोग नियम, कानून ,कायदे नहीं मानते , जिनके मन मे देश के संविधान के प्रति सम्मान ना हो ,उनके सभी संवैधानिक अधिकार स्वयमेव खत्म माने जाएं।

श्री गंगानगर राजस्थान मे एक 13 साल की बच्ची जो ट्यूशन से अपने घर जा रही थी। उसने एक रिक्शा वाले से उसने कहा कि आप मुझे घर छोड़ दीजिए रिक्शावाला उसे बहलाकर गेस्ट हाउस पर ले गया।वहां उसे न सिर्फ 10000 में बेच दिया बल्कि खुद उसका बलात्कार भी किया

उसके बाद उसे बच्ची का गेस्ट हाउस संचालक ने बलात्कार किया फिर गेस्ट हाउस वाले ने तीन दिन 12 लोगो से उसे बच्ची का बलात्कार करवाया ।फिर उस गेस्ट हाउस संचालक ने उस बच्ची को दूसरे गेस्ट हाउस वाले को 50 हजार में बेच दिया और वहां 20 से ज्यादा लोगों ने उसे बच्चे का बलात्कार किया।

इस तरह उसे बच्ची के साथ जो मात्र 13 साल की मासूम बच्ची थी 32 दरिंदों ने बलात्कार किया । बच्ची जब दर्द से चीखती तो उसे शराब पिला देते जिससे बच्ची की आवाज कमरे से बाहर नहीं जाए।‌ राजस्थान की इस रूह कंपा देने वाली घटना ने देश को झकझोर कर रख दिया।

लेकिन इससे क्या कोई फर्क पडने वाला है ? शायद बिल्कुल भी नहीं ।हमारे आसपास ऐसी ही घटनाएं हुई हैं, जहाँ  बलात्कारी नर पिशाच 32 की जगह 5-6 ही थे।

पूरा समाज ,परिस्थिति जन्य साक्ष्य चीख - चीख कर सामूहिक बलात्कार की पुष्टि कर रहे थे। लोग सडकों पर आए ,धरना - प्रदर्शन क्या नहीं किया गया ? जिन पर कार्यवाही करने की जिम्मेदारी थी ,वे ही यह भूल गये कि वो भी किसी अबोध बच्ची के पिता, भाई, परिजन होंगे। 

मरी हुई बुजदिल आत्माओं के साथ पशुवत पेट पालते लोगों के दम पर ही बलात्कारी समाज मे बेखौफ अगले शिकार की खोज मे रहता है। उसे कोई फर्क नहीं पडता कि फिर वो बच्ची केवट है, ब्राम्हण है ,  क्षत्रिय या दलित।  

बलात्कारी कमजोर वर्ग को ही शिकार बनाता है। जहाँ उसे छ: इंच छोटा हो जाने का डर हो ,वह आंख उठा कर देखता तक नहीं। तो अब यह बहुत जरुरी है कि बलात्कारियों मे गर्दन छोटी होने या सुनिश्चित लंबी होने का भय हो। नर पिशाचों मे स्पष्ट संदेश जाना चाहिए कि यदि उसने किसी बहन ,बेटी पर कुदृष्टि डाली तो उसकी जिन्दगी 6 महीने ही शेष होगी।

आज ही पश्चिम बंगाल मे हथियार छीन कर भागते एक बलात्कारी को वहाँ की पुलिस ने गति प्रदान किया है। नियम ,कायदे, संविधान केवल उनके लिये ही नहीं होना चाहिए जो उसका सम्मान करते हैं। जो इन्हे नहीं मानते, जिनके मन मे इसके प्रति कोई डर - भय ना हो, उनके सभी संवैधानिक अधिकार खत्म माना जाना चाहिए।

( मनोज कुमार द्विवेदी, अनूपपु्र ,मप्र )

यह मोह बहुत ही मोहीला होता है, लेकिन उतना ही दर्दीला होता है- अनिल भारद्वाज


*मोह बहुत मोहीला* 


यह मोह बहुत ही मोहीला होता है,

लेकिन उतना ही दर्दीला होता है।


जब कभी किसी से मोह टूट जाता है,

तो पलकों से भी अधिक हृदय रोता है।


यह सही गलत दिल से निकाल देता है,

यह वो करवाता जो इसको भाता है।


यह नागफांस में कस लेता है जिसको,

तो गरुड़ देव भी छुड़ा न पाते उसको।


क्या पता कौन किस पर मोहित हो जाए, 

फिर दुनिया चाहे उलट पलट हो जाए।


अतिमोह भी सदां दुख देता रहता है,

मीरा की तरह गरल पीना पड़ता है।


सीता ने मोह किया सोने के मृग से,

पति विरह में बहे अनगिन आंसू दृग से।

  

जब पुत्रमोह में नृप अंधा होता है, 

तो मर्यादा का चीर हरण होता है।


यदि मोह करो तो कान्हा जैसा करना,

जग निर्मोही भी कहे प्यार से सुनाना।


गीतकार अनिल भारद्वाज एडवोकेट हाईकोर्ट ग्वालियर म प्र

पंकज बुरहानपुरी के सम्मान में काव्य गोष्ठी आयोजन सम्पन्न


जबलपुर

जबलपुर संस्कारधानी में पंकज बुरहानपुरी ( डॉ यमुना प्रसाद दुबे ) गंगा जमुना के तट से पधारे वरिष्ठ कवि के सम्मान में काव्य गोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम में शहर के वरिष्ठ कवि साहित्यकार उपस्थित रहे। निरंजन द्विवेदी वत्स, कवि संगम त्रिपाठी, विजय विश्वकर्मा, मदन श्रीवास्तव, प्रकाश सिंह ठाकुर, एम. पी. सिंह ' निकुंज', मानसिंह ' दीपक', सुनील सिंह तोमर प्रमुख रूप से उपस्थित रहे। 

गीत और गज़लों के दौर में बहुत सुन्दर रचनाएं प्रस्तुत की गयीं। कवि  पंकज बुरहानपुरी जी ने अपने गीतों से आयोजन को ऊंचाईयों तक पहुंचाया। वरिष्ठ कवि विजय विश्वकर्मा के संचालन में गीत ग़ज़ल हास्य व्यंग की रचनाएं प्रवाहित हुई। आभार प्रकाश सिंह ठाकुर ने अभिव्यक्त किया।

प्रदेश उपाध्यक्ष गणेश सिंह राजावत के नेतृत्व में धूमधाम से मनाया गया नरेंद्र मोदी विचार मंच का 23वां स्थापना दिवस


बैढ़न/सिंगरौली

नरेंद्र मोदी विचार मंच के 23वें स्थापना दिवस के अवसर पर सिंगरौली के बैढ़न में भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन मंच के प्रदेश उपाध्यक्ष गणेश सिंह राजावत के नेतृत्व में संपन्न हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं, जनप्रतिनिधियों एवं आम नागरिकों ने सहभागिता की।

कार्यक्रम में मंच की प्रदेश सचिव रश्मि साकेत की विशेष उपस्थिति रही। उन्होंने अपने संबोधन में नरेंद्र मोदी विचार मंच की स्थापना, उद्देश्यों एवं राष्ट्र निर्माण में उसकी भूमिका पर प्रकाश डालते हुए केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा संचालित विभिन्न जनहितकारी योजनाओं की विस्तृत जानकारी उपस्थित जनसमुदाय के साथ साझा की। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री Narendra Modi के नेतृत्व में देश विकास, आत्मनिर्भरता और जनकल्याण के नए आयाम स्थापित कर रहा है तथा इन योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना सभी कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी है।

कार्यक्रम की मुख्य अतिथि सिंगरौली नगर निगम की महापौर Rani Agrawal रहीं। उन्होंने अपने संबोधन में शासन की विभिन्न महत्वाकांक्षी योजनाओं, नगरीय विकास कार्यों एवं जनकल्याणकारी कार्यक्रमों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए नागरिकों से योजनाओं का अधिक से अधिक लाभ लेने का आह्वान किया।

इस अवसर पर सिंगरौली भाजपा जिला अध्यक्ष देवेंद्र पांडे, नगर निगम अधिकारी सुंदरलाल शाह, नगर निगम के पटेल साहब, समूह अध्यक्ष उर्मिला देवी, सुमन साकेत सहित बड़ी संख्या में महिला कार्यकर्ता एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

कार्यक्रम के दौरान राष्ट्र निर्माण, सामाजिक जागरूकता, संगठन विस्तार तथा केंद्र एवं राज्य सरकार की योजनाओं को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया गया। मंच के पदाधिकारियों ने कहा कि नरेंद्र मोदी विचार मंच राष्ट्रवाद, सामाजिक समरसता और जनसेवा के मूल्यों को लेकर निरंतर कार्य कर रहा है तथा आने वाले समय में संगठन को और अधिक मजबूत बनाया जाएगा।

बैढ़न में आयोजित इस कार्यक्रम में हजारों की संख्या में लोगों की उपस्थिति रही, जिससे आयोजन स्थल राष्ट्रभक्ति, उत्साह और जनसहभागिता से सराबोर दिखाई दिया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रहित एवं जनकल्याण के संकल्प के साथ हुआ।

गंगांजलि साझा संग्रह राजेंद्र कुमार तिवारी को किया भेंट-  कवि संगम त्रिपाठी 


जबलपुर

गंगांजलि साझा काव्य संग्रह राजेंद्र कुमार तिवारी मंदसौर को उनके जबलपुर आगमन पर सौजन्य मुलाकात कर कवि संगम त्रिपाठी ने भेंट किया। राजेंद्र कुमार तिवारी मंदसौर वरिष्ठ कवि साहित्यकार समाजसेवी व हिंदी प्रेमी हैं।

गंगांजलि साझा काव्य संग्रह के संपादक डॉ अजय शुक्ल है व इस संग्रह में कवि संगम त्रिपाठी हास्य व्यंगकार जबलपुर मध्यप्रदेश, कवि पंकज बुरहानपुरी कवि लेखक बुरहानपुर,‌ कवि श्याम फतनपुरी कवि गीतकार गोमती नगर लखनऊ, डॉ सोमनाथ शुक्ल कवि लेखक प्रयागराज की रचनाएं संग्रहित हैं। गंगांजलि साझा काव्य संग्रह भावनाओं का काव्य संगम है।

बूंदों के नौलखा हार से सज, धज कर इठलाती आजा, आजा बरखा रानी आजा



 बूंदों के नौलखा हार


आजा बरखा रानी आजा।


बूंदों के नौलखा हार से सज 

धज कर इठलाती आजा,

       आजा बरखा रानी आजा।


इंद्रधनुष बनकर बूंदों की 

सतरंगी किरनें आईं हैं,

बिजली बदली पुरवा तेरी 

अगवानी करने आईं हैं।


बैठ अश्वमेघों के रथ पर 

नीलगगन से नीचे आजा। 

      आजा बरखा रानी आजा।


उमड़ घुमड़ कर तुझे बुलातीं

काली काली मस्त घटाएं,

कोयल मोर पपीहे तुझको 

रह-रह कर आवाज लगाएं।


बूंदों की पाजेब पहन कर 

छम छम छम छम करती आजा।

       आजा बरखा रानी आजा।


गीतकार अनिल भारद्वाज एडवोकेट हाईकोर्ट ग्वालियर

डॉ. अरुण अज्ञानी कलाव्योम कविश्री सम्मान से हुए सम्मानित


भोपाल

कवि, साहित्यकार, लेखक एवं प्रोफेसर डॉ. अरुण अज्ञानी (डॉ. अरुण खोबरे) को कलाव्योम कविश्री सम्मान 2026 से सम्मानित किया गया। सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्था कलाव्योम फाउंडेशन द्वारा साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें यह सम्मान प्रदान किया गया। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल में प्रोफेसर डॉ. अरुण खोबरे जिन्हें कवि के रुप अरुण अज्ञानी के नाम से भी जाना जाता है इससे पूर्व भी साहित्य के क्षेत्र में कई पुरुस्कार व सम्मान प्राप्त कर चुके हैं। इस अवसर पर संस्था के पदाधिकारी अशोक श्रीमाल, आलोक शर्मा, मोहित कुमार आदि उपस्थित थे। गौरतलब है कि डॉ. अरुण खोबरे ने विश्व की सबसे बड़ी श्रीरामचरित मानस का लेखन भी किया है। पिछले साल ही उनका नाम लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हुआ था। इससे पहले ओएमजी बुक ऑफ रिकॉर्ड, भारत वर्ल्ड रिकॉर्ड, मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड, ग्लोबल गोल्ड टैलेंट बुक ऑफ रिकॉर्ड, वंडर बुक ऑफ रिकॉर्ड, रॉयल सक्सेस इंटरनेशनल बुक ऑफ रिकॉर्ड,  गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी डॉ खोबरे का नाम दर्ज हो चुका है। उन्हें अब तक उत्कृष्ट लोक कवि सम्मान, संतश्री भूरा भगत राष्ट्रीय रत्न सम्मान, इंडियन आईकॉन अवार्ड, एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी पर्सनाल्टी ऑफ इंडिया, उत्कृष्ट मीडिया गुरु शिक्षक सम्मान, कतिया विभूति सम्मान, इंडियाज बेस्ट मीडिया टीचर अवार्ड, एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी पर्सनाल्टी ऑफ वर्ल्ड, ग्लोबल एपेक्स अवार्ड समेत कई, राष्ट्र गौरव सम्मान सहित कई सम्मानों व पुरुस्कारों से नवाजा जा चुका है। एमसीयू में शिक्षक के अलावा वे अटल बिहारी वाजपेई हिंदी विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग में विभागाध्यक्ष एवं परीक्षा नियंत्रक का दायित्व भी संभाल चुके हैं। उन्होंने कलाव्योम कविश्री सम्मान 2026 को भगवान राम जी के परम भक्त श्री हनुमान जी को समर्पित किया है।

बस व ट्रक की जोरदार टक्कर, 6 लोग हुए घायल, नाराज ग्रामीणों ने सांसद का काफिला रोका 


उमरिया

जिले के बिरसिंहपुर पाली थाना क्षेत्र में सुबह भीषण सड़क हादसा हो गया। तेंदूपत्ता गोदाम के पास कोरबा से बिलासपुर जा रही शिव ट्रेवल्स की बस और ट्रक में आमने-सामने जोरदार भिड़ंत हो गई।

टक्कर इतनी तेज थी कि बस का अगला हिस्सा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया और ड्राइवर केबिन में फंस गया। मौके पर पहुंची पुलिस और स्थानीय लोगों ने काफी मशक्कत के बाद ड्राइवर को सुरक्षित बाहर निकाला।

बस में करीब 40 से 50 यात्री सवार थे। हादसे में आगे की सीट पर बैठे करीब 6 यात्रियों को चोटें आई हैं। गनीमत रही कि कोई जनहानि नहीं हुई। सूचना मिलते ही 108 एम्बुलेंस मौके पर पहुंची। सभी घायलों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पाली ले जाया गया, जहां उनका उपचार चल रहा है। दो यात्रियों की हालत गंभीर बताई जा रही है।

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक ट्रक गलत साइड से आ रहा था, जिससे यह हादसा हुआ। पाली पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। क्रेन की मदद से दोनों वाहनों को सड़क से हटाया गया, जिसके बाद जाम खुला।

*ग्रामीणों व किसानों ने रोका सांसद का काफिला*


शहडोल जिले के ब्यौहारी विधानसभा क्षेत्र के दौरे पर पहुंचे सीधी सांसद डॉ. राजेश मिश्रा को ग्रामीणों के विरोध का सामना करना पड़ा। जन चौपाल कार्यक्रम में शामिल होने जा रहे सांसद का काफिला भमरहा प्रथम गांव में ग्रामीणों ने रोक लिया और झापर नदी पर बने पुल को चालू कराने तथा अधिग्रहित भूमि का मुआवजा दिलाने की मांग उठाई। लगभग एक घंटे तक सांसद का काफिला मौके पर रुका रहा, जहां ग्रामीणों ने अपनी समस्याएं विस्तार से बताईं।

जानकारी के अनुसार सीधी संसदीय क्षेत्र के सांसद डॉ. राजेश मिश्रा मंगलवार को ब्यौहारी विधानसभा के ग्राम कोना टोला में आयोजित जन चौपाल में शामिल होने तथा ग्रामीणों के बीच रात्रि विश्राम के लिए जा रहे थे। उनके साथ ब्यौहारी विधायक शरद जुगलाल कोल भी मौजूद थे। इसी दौरान रास्ते में भमरहा प्रथम गांव के लोगों ने उनका काफिला रोक लिया।

ग्रामीणों का आरोप है कि झापर नदी पर बना पुल करीब तीन वर्ष पहले पूरी तरह तैयार हो चुका है, लेकिन आज तक आम लोगों के लिए चालू नहीं किया गया। पुल के दोनों ओर पहुंच मार्ग के लिए स्थानीय किसानों की भूमि अधिग्रहित की गई थी, लेकिन प्रभावित किसानों को अब तक मुआवजे की राशि नहीं मिली है। इसी वजह से पुल का उपयोग शुरू नहीं हो सका है। पुल निर्माण पूरा होने के बावजूद करीब 30 किसानों को उनकी जमीन का मुआवजा नहीं मिला है। 

ग्रामीणों और किसानों ने सांसद के समक्ष अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए जल्द समाधान की मांग की। सांसद डॉ. राजेश मिश्रा ने मौके पर लोगों से चर्चा की और उन्हें आश्वस्त किया।

अमित कुमार श्रीवास्तव बने नरेंद्र मोदी विचार मंच मध्यप्रदेश के प्रदेश सह मीडिया प्रभारी


रिपोर्ट- रामकेश द्विवेदी

सीधी

नरेंद्र मोदी विचार मंच भारत, मध्यप्रदेश द्वारा अमित कुमार श्रीवास्तव, निवासी तहसील कुसमी जिला सीधी को प्रदेश सह मीडिया प्रभारी पद पर नियुक्त किया गया है। यह नियुक्ति 13 जून 2026 से आगामी आदेश तक प्रभावी रहेगी।

जारी नियुक्ति पत्र में संगठन ने विश्वास व्यक्त किया है कि अमित कुमार श्रीवास्तव अपने कर्तव्यों का निष्ठा, ईमानदारी एवं समर्पण भाव से निर्वहन करते हुए संगठन को मजबूत बनाने और राष्ट्रहित के कार्यों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

नियुक्ति पत्र में कहा गया है कि उनके द्वारा किया गया कार्य संगठन के उद्देश्यों को गति प्रदान करेगा तथा सशक्त, समृद्ध और विकसित भारत के निर्माण में योगदान देगा।

अमित कुमार श्रीवास्तव की इस नियुक्ति पर क्षेत्र के सामाजिक, राजनीतिक एवं पत्रकारिता जगत से जुड़े लोगों ने उन्हें बधाई एवं शुभकामनाएं दी हैं। समर्थकों ने आशा व्यक्त की है कि वे संगठन और समाज के हित में प्रभावी भूमिका निभाते हुए अपनी जिम्मेदारियों का सफलतापूर्वक निर्वहन करेंगे।

रसोई की सीटी से रेल के इंजन तक: प्रेशर कुकर के आविष्कार की अनोखी कहानी 


जैसा की हम सभी जानते हैं कि जेम्स वाट (James Watt) ने प्रेशर कुकर की सीटी से प्रभावित हो कर एक ऐसा आधुनिक इंजन बनाया जिसने पूरी दुनिया में औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) ला दी। लेकिन क्या आप प्रेशर कुकर के अविष्कार की कहानी जानना चाहेंगें, तो आइए जानते हैं प्रेशर कुकर के अविष्कार की कहानी क्या है? 

प्रेशर कुकर का आविष्कार डेनिस पैपिन (Denis Papin) ने 1679 में किया था। डेनिस पैपिन एक फ्रांसीसी (French) भौतिकविज्ञानी (Physicist) और गणितज्ञ थे। शुरुआत में उन्होंने इसका नाम "स्टीम डाइजेस्टर" (Steam Digester) रखा था। उस समय वैज्ञानिक इस बात पर रिसर्च कर रहे थे कि हवा और भाप (steam) का दबाव कैसे काम करता है। डेनिस पैपिन यह साबित करना चाहते थे कि यदि हम पानी और भाप को एक मजबूत, पूरी तरह बंद बर्तन में बंद कर दें, तो अंदर का दबाव (pressure) बढ़ जाता है। इस बढ़ते दबाव के कारण पानी का उबलने का तापमान (boiling point) भी बढ़ जाता है। यानी पानी 100 डिग्री सेल्सियस से भी ज्यादा गर्म हो जाता है, जिससे खाना बहुत तेजी से पक सकता है। यह विशुद्ध रूप से एक वैज्ञानिक प्रयोग था। दूसरा उस जमाने में आम लोगों और सैनिकों के लिए भोजन की कमी एक बड़ी समस्या थी। पैपिन एक ऐसा उपकरण बनाना चाहते थे जो बेकार समझे जाने वाले भोजन को भी खाने योग्य बना सके। वह देखना चाहते थे कि क्या अत्यधिक ऊंचे तापमान और दबाव से जानवरों की सख्त हड्डियों को भी इतना मुलायम बनाया जा सकता है कि उनसे पोषण (जिलेटिन और शोरबा) निकाला जा सके। उनका यह प्रयोग बेहद सफल रहा। उनके स्टीम डाइजेस्टर ने हड्डियों को पूरी तरह से नर्म कर दिया, जिससे गरीबों के लिए सूथ और स्टॉक बनाना आसान हो गया। डेनिस पैपिन का मकसद सिर्फ रोजमर्रा का खाना जल्दी पकाना नहीं था, बल्कि विज्ञान के सिद्धांतों का उपयोग करके कम संसाधनों (जैसे हड्डियों और सख्त मांस) से ज्यादा से ज्यादा पोषण निकालना और भाप की शक्ति को दुनिया के सामने साबित करना था।

डेनिस पैपिन के इस "स्टीम डाइजेस्टर" से जुड़े कुछ बहुत ही दिलचस्प और मजेदार किस्से यहाँ दिए गए हैं।

 1. शाही मेहमानों के सामने 'हड्डियों का हलवा'

1682 में, डेनिस पैपिन ने लंदन की सबसे प्रतिष्ठित विज्ञान संस्था, रॉयल सोसाइटी के वैज्ञानिकों और इंग्लैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय (King Charles II) के लिए एक शाही दावत रखी। इस दावत में सारा खाना उनके नए आविष्कार (स्टीम डाइजेस्टर) में पकाया गया था। जब मेहमानों को खाना परोसा गया, तो वे हैरान रह गए। जो जानवरों की हड्डियाँ चबाने लायक भी नहीं होती थीं, वे कुकर के भारी दबाव के कारण इतनी नर्म और जेली जैसी हो चुकी थीं कि राजा और वैज्ञानिकों ने उन्हें बड़े चाव से खाया। इस दावत को इतिहास में "द फिलॉसॉफिकल सपर" (The Philosophical Supper) के नाम से जाना जाता है।

 2. जब कुकर बन गया तो उसका पहला धमाका!

शुरुआत में जब पैपिन ने यह डिवाइस बनाया, तो इसमें कोई सेफ्टी वॉल्व नहीं था। एक प्रयोग के दौरान, भाप का दबाव इतना ज्यादा बढ़ गया कि वह लोहे का भारी बर्तन एक जोरदार धमाके के साथ फट गया। कमरे की खिड़कियां टूट गईं और दीवारें हिल गईं। इस खतरे को टालने के लिए पैपिन ने "सेफ्टी वाल्व" (Safety Valve) का आविष्कार किया। यह वही वाल्व है जो आज हमारे घरों के कुकर में 'सीटी' के रूप में काम करता है। जब अंदर का दबाव ज्यादा हो जाता है, तो यह वाल्व अतिरिक्त भाप को बाहर निकाल देता है।

3. रसोइयों का डर और 'जादू टोना'

जब यह आविष्कार पहली बार सामने आया, तो उस जमाने के आम रसोइये (Chefs) और लोग इससे बेहद डर गए थे। लोग सदियों से खुली आग पर खाना पकाते आ रहे थे। एक बंद लोहे के डिब्बे से अजीब सी आवाजें आना और अचानक सीटी से तेज भाप निकलना उन्हें किसी 'जादू-टोने' या भूतिया मशीन जैसा लगता था। कई रसोइयों ने तो इसे इस्तेमाल करने से साफ मना कर दिया था क्योंकि उन्हें डर था कि यह उनके किचन को उड़ा देगा।

आज जो ट्रेनें पटरियों पर दौड़ रही हैं, उनकी शुरुआत एक किचन के कुकर से हुई थी!  जब वैज्ञानिकों ने देखा कि पैपिन के कुकर के अंदर की भाप में इतनी ताकत है कि वह भारी-भरकम ढक्कन और वजन को भी ऊपर उठा देती है, तो थॉमस न्यूकॉमेन और जेम्स वाट जैसे वैज्ञानिकों को एक नया विचार आया। उन्होंने सोचा, "अगर यह भाप एक ढक्कन उठा सकती है, तो यह एक बड़ा पहिया या पिस्टन भी घुमा सकती है!" इसी सोच ने आगे चलकर दुनिया के पहले भाप के इंजन (Steam Engine) को जन्म दिया। एक छोटा सा प्रयोग जो किचन में खाना जल्दी पकाने के लिए शुरू हुआ था, उसने न सिर्फ दुनिया का खान-पान बदला, बल्कि पूरी औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) की नींव रख दी। 1713 के आसपास पैपिन का लंदन में निधन हो गया। जिनका आविष्कार (प्रेशर कुकर) आज दुनिया के हर घर की रसोई में मौजूद है, और जिनके सिद्धांतों ने पूरी दुनिया को ट्रेनों और फैक्ट्रियों का 'भाप इंजन' दिया।


*सुशी सक्सेना*

आग उगलती दोपहरी ये अंगारे सा दिन, कब आषाढ़ घन गरजेंगे कब बरसेगा सावन



*गर्म हवा के झोंके*


आग उगलती दोपहरी ये अंगारे सा दिन,

कब आषाढ़ घन गरजेंगे कब बरसेगा सावन।


प्यासे अधर नदी झरनों के,

कंठ कुओं के सूखे,

दिन भर के दुबके नीड़ों में,

पंछी सोऐं भूखे।


प्रातः से ही तपन तपस्विन करने लगी हवन,

कब मेघों का बिजुरियों से होगा मधुर मिलन।


सड़कों पर सन्नाटा लेटा,

मृग मरीचिका बनकर,

गर्म हवा के झोंके चलते,

रात-रात भर तन कर।


भीषण गर्मी लगती है सूरज की सगी बहन,

कब रिमझिम के गीत गुनगुनाएंगे धरा गगन।


रखा निर्जला व्रत इस ऋतु ने,

पांव छांव के व्याकुल,

श्वेत अंगोछा बांधे सिर पर,

हांफ रहा मलयानिल।


पंखा झलती पल्लू के कोने से सांझ दुल्हन,

उमस खोल कर बैठी वक्षस्थल के सब बंधन।


आग उगलताती दोपहरी ये अंगारे सा दिन,

कब आषाढ़ घन गरजेंगे कब बरसेगा सावन।


गीतकार अनिल भारद्वाज एडवोकेट हाई कोर्ट  ग्वालियर

डॉक्टर सत्यनारायण तिवारी छत्तीसगढ आध्यात्म विभूषण सम्मान से हुए सम्मानित 


लोरमी

लोरमी-मनियारी साहित्य एवम सेवा समिति लोरमी के अध्यक्ष, श्रीमद्भागवत व मानस परिवार छत्तीसगढ के संयोजक व संस्थापक, शिक्षाविद, साहित्यकार, कथावाचक एवम समाज सेवक डाक्टर सत्यनारायण तिवारी हिमान्शु महाराज को विभिन्न क्षेत्रो मे किए गए योगदान के लिए, सरस्वती शिशु मंदिर तिलकनगर बिलासपुर के सभागार मे छत्तीसगढ राजभाषा आयोग के पूर्व अध्यक्ष डाक्टर विनय कुमार पाठक,छत्तीसगढ राज भाषा आयोग के सचिव डाक्टर अभिलाषा बेहार,वरिष्ट समाज सेवी एस डी बडगैया,डॉक्टर रमेश चंद्र श्रीवास्तव,डॉक्टर बिष्णु कुमार तिवारी के कर कमलो राज्य स्तरीय  छत्तीसगढ आध्यात्म विभूषण सम्मान 2026 से पर्यावरण एवम पर्यटन विकास समिति बिलासपुर द्वारा सम्मानित किया गया। शासकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय हरदीबान्ध के प्रधानपाठक सारधा लोरमी निवासी डॉक्टर तिवारी इसके पूर्व राज्यपाल सम्मान सहित करीब दो सौ से अधिक शासकीय/अशासकीय सम्मान से सम्मानित किए जा चूके है। सरस्वती शिशु मंदिर तिलकनगर बिलासपुर के सभागार मे शाम 6 बजे डॉक्टर  तिवारी सहित 24 विभूतियो का सम्मान तथा विभिन्न प्रकार की पर्यावरण संरक्षण व जागरण के कार्यक्रम समिति  व छात्र छात्राओ को प्रशस्तिपत्र व मेडल प्रदान कर सम्मानित किया। उक्त जानकारी समिति क अध्यक्ष डाक्टर विवेक तिवारी एवम कार्यक्रम संचालक डॉक्टर राघवेन्द्र दुबे ने दी। राज्य स्तरीय छत्तीसगढ आध्यात्म विभूषण सम्मान 2026से सम्मानित होने पर केन्द्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू उपमुख्यमंत्री अरूण साव, जनपद अध्यक्ष वर्षा विक्रम सिंह, उपाध्यक्ष राजेंद्र साहू, नगर पालिकाध्यक्ष सुजीत वर्मा, उपाध्यक्ष डाक्टर अशोक जायसवाल सहित अनेक गणमान्य नागरिको एवम संगठनो ने  डॉक्टर सत्यनारायण तिवारी हिमान्शु महाराज को हार्दिक बधाई प्रेषित किए है। कवि संगम त्रिपाठी संस्थापक प्रेरणा हिंदी प्रचारिणी सभा ने बधाई दी और कहा कि डॉ सत्यनारायण तिवारी साहित्य, समाज व धर्म सेवा में प्रेरणादायक कार्य कर रहे हैं।

आधुनिक भारत का सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आंदोलन है इप्टा, मुंबई में संपन्न हुआ इप्टा का राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव

*आठ दशक से अधिक समय तक सक्रिय संगठन इप्टा देश का महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आंदोलन बन चुका है*


मुम्बई

                 जब देश स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत था, दुनिया विश्व युद्ध से जूझ रही थी। बंगाल के लोग अकाल की त्रासदी भोग रहे थे। उसी दौरान 25 मई 1943 को विभिन्न राज्यों, रियासतों से आए लेखकों, कलाकारों ने मुंबई में इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (भारतीय जन नाट्य संघ) इप्टा का गठन किया था। युद्ध, अकाल, राजनीतिक दमन के दौर में इप्टा ने रंगमंच, संगीत, नृत्य, सिनेमा को फासीवाद, सांप्रदायिकता, गरीबी के खिलाफ प्रतिरोध में बदल दिया। इप्टा का ध्येय वाक्य है, "इप्टा की नायक जनता है"। 

                   आठ दशक से अधिक समय तक सक्रिय संगठन इप्टा देश का महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आंदोलन बन चुका है। संगठन ने प्रमाणित किया है कि कला केवल मनोरंजन नहीं, अपितु सामाजिक परिवर्तन की प्रेरणा भी बनती है।

              वर्षों तक इप्टा मुंबई में नाट्य महोत्सव आयोजित करती रही है, लेकिन अनेक कारणों से यह सिलसिला जारी नहीं रह सका। 24 वर्ष पश्चात इप्टा ने 20 से 27 मई तक कैफ़ी और शौकत आज़मी से प्रेरित होकर तथा इप्टा के पुनर्गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले जितेंद्र रघुवंशी की स्मृति में समारोह आयोजित किया। मुंबई माटुंगा के मैसूर एसोसिएशन ऑडिटोरियम में इप्टा की राष्ट्रीय समिति के नेतृत्व एवं इप्टा मुंबई की मेजबानी में संपन्न समारोह में दिल्ली, महाराष्ट्र के नासिक, मुंबई, पंजाब के कपूरथला, मध्य प्रदेश के इंदौर, उत्तर प्रदेश के लखनऊ, तमिलनाडु, उड़ीसा, बिहार के पटना इकाइयों के कलाकारों ने हिंदी, तमिल, मराठी, उड़िया, पंजाबी में 12 नाट्य प्रस्तुतियां दीं।

                 आदिवासी, दलित समाज के अलावा विषमता, नारी सम्मान, सामाजिक न्याय, सांप्रदायिकता, पर्यावरण, बाजारवाद जैसे मुद्दों पर कलाकारों ने नाटकों का मंचन किया।  

                    इप्टा जेएनयू के नाटक *गोह* में वंदना टेटे, अनुज लुगुन और जसिंता केरकेट्टा की कविताओं को आधार बनाकर आदिवासियों का जीवन, उनकी संस्कृति, मिथक, उनका रहन-सहन, पर्यावरण बचाने के संघर्ष , इन सबकी राजनीतिक वास्तविकताओं को तलाशने का प्रयास किया गया। इस प्रस्तुति का निर्देशन जेएनयू की पूरी टीम ने किया।        

                  इप्टा तमिलनाडु का नाटक *उर्यनथा थीरप्पु* (उच्चतम निर्णय) एक राजनीतिक नाटक है, जो भव्य विकास परियोजनाओं और सामान्य नागरिकों के अधिकारों के बीच संघर्ष को सामने लाता है। नाटक प्राकृतिक संसाधनों — जल, जंगल और जमीन  के बीच सामूहिक संबंधों पर जोर देता है। इस नाटक के निर्देशक आनंद बसु हैं।

              इप्टा नासिक का नाटक *उपथ शुम्भ* (पथभ्रष्ट दैत्य) एक व्यंग्यात्मक कॉमेडी ड्रामा है, जो मनोरंजन उद्योग की चमक-दमक के नीचे की असली क्रूरता को उजागर करता है। यह नाटक चार संघर्षरत कलाकारों की कहानी है, जो एक ऐसी दुनिया में अपना रास्ता तलाश रहे हैं, जो सब कुछ मांगती है और बदले में कुछ नहीं देती। नाटक का निर्देशन मुकेश काले ने किया है।     

                इप्टा पंजाब का नाटक *कूड़े विच खिड़िया गुलाब* (कूड़े में खिला गुलाब) सफाईकर्मी पिता-पुत्र की कहानी है, जिसे वर्ण और वर्गीय नजरिए से बुना गया है। नाटक सुखांत है। यह नाटक उन लोगों को भी जवाब देता है, जो आरक्षण पर सवाल उठाते हैं। निर्देशन इंद्रजीत रूपोवाली ने किया।  

               इप्टा इंदौर का नाटक *आजादी के तराने* स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान भारत छोड़ो आंदोलन से होते हुए देश की आजादी तक पहुंचता है। चिमूर, बलिया, मिदनापुर में स्थानीय विद्रोह हुए, जिनमें साधारण नागरिक, श्रमिक, किसान, विद्यार्थी, गृहिणियां शामिल थीं। उनके संघर्ष को नाटक में दर्शाया गया है। शोध पर आधारित प्रस्तुति का कालखंड 1942 से 1947 तक का है। नाटक की समाप्ति पर टिप्पणी करते हुए विख्यात फिल्म निर्देशक आनंद पटवर्धन ने कहा कि "नाटक यह भी दिखाता है कि आजादी की लड़ाई में कौन शामिल नहीं था"। इस नाटक का निर्देशन गुलरेज़ और सारिका श्रीवास्तव ने किया।        

                  इप्टा लखनऊ द्वारा प्रस्तुत नाटक *सपना मेरा यही सखी* मध्यकालीन चार कवयित्रियों की विद्रोही भावना को वर्तमान संदर्भों में समझने का प्रयास है। इन स्त्रियों ने अपने अस्तित्व के लिए समाज के रीति-रिवाज, परंपराओं को छोड़कर परिवार और समाज से विद्रोह किया तथा निर्वासन भोगा। ये महिलाएं थीं — मीराबाई, अक्का महादेवी, अंडाल और लल्लन। नाटक यह दिखाता है कि विद्रोही महिलाओं को समाज या तो देवी मानता है अथवा उनकी निंदा करता है। नाटक का निर्देशन वेद राकेश ने किया।       

                इप्टा मुंबई ने बलराज साहनी की *मेरी फिल्मी आत्मकथा* पर संगीतमय प्रस्तुति दी, जो संस्मरण और गीतों के माध्यम से आगे बढ़ती है। निर्देशन निधि कांत पांडे ने किया।   

           इप्टा मुंबई की अन्य प्रस्तुति *आनंद ही आनंद* थी। यह चेतन, देव और विजय आनंद के बीच रिश्तों की कहानी है। यह तीनों भाइयों के हिंदी सिनेमा में योगदान और देवानंद के स्टार बनने की प्रक्रिया की पड़ताल करती है। इस प्रस्तुति की निर्माता अनुराधा डार हैं।

                  इप्टा उड़ीसा का नाटक *एकनुआ सकलारा अपेक्षारे* (एक नई सुबह के इंतजार में) उन दो बेटों के विरोधी विचारों के संघर्ष की कहानी है। एक भ्रष्ट राजनेता है, दूसरा सशस्त्र क्रांति में विश्वास करता है। अंत में पिता के समझाने पर दोनों पुत्र गांधीवादी मूल्यों को अपनाते हैं। निर्देशन श्री विक्रम केसरी जेना ने किया।   

         इप्टा जोधपुर ने कृष्ण चंदर की कहानी *थाली का बैंगन* प्रस्तुत की, जो जाति और धर्म के नाम पर वसूली करने वाली प्रवृत्ति पर गहरी चोट करती है। यह गरीबों के जीवन के अंधेरे की कथा है। नाटक जीने के लिए शॉर्टकट के उपाय, अज्ञानता और अवसरवादिता पर गहरा व्यंग्य है। नाटक को दर्शक अपने समय से जोड़कर महसूस कर सकते हैं। समझ सकते हैं कि जाति-धर्म के नाम पर किस तरह बंटकर हमने जीवन को नर्क बना दिया है। इस प्रस्तुति के निर्देशक डॉक्टर विकास कपूर हैं।       

                इप्टा बिहार की प्रस्तुति *कोर्ट मार्शल* बहुचर्चित और सर्वाधिक देखा गया नाटक है। कहानी एक युवा सैनिक की है, जिस पर अपने अधिकारी की हत्या करने और एक अन्य को घायल करने का आरोप है। मुकदमे की अदालती कार्यवाही में इस कथित अपराध के पीछे जो कारण हैं, वे जातिवाद के घिनौने चेहरे को उजागर करते हैं। निर्देशन तनवीर अख्तर ने किया। 

              इप्टा मुंबई की प्रस्तुति *हम परवाने : द स्टोरी ऑफ अशफ़ाकउल्ला खान वारसी* अशफाक उल्ला और रामप्रसाद बिस्मिल से प्रेरित है। धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादी अशफाक काकोरी ट्रेन का खजाना लूटने वालों में शामिल थे। उन्होंने ब्रिटिश सरकार को चुनौती दी थी। इन्हीं के बलिदान से भगत सिंह और उनके साथियों ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन संगठन का गठन किया था। नाट्य प्रस्तुति का निर्देशन रमेश तलवार ने किया।        

          उल्लेखनीय है कि 25 मई 1943 को मुंबई के मारवाड़ी विद्यालय में आयोजित इप्टा के सम्मेलन को भेजे अपने संदेश में जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि "भारत में जन नाट्य के विकास की व्यापक संभावनाएं हैं, बशर्ते वह जनता और उसकी परंपराओं पर आधारित हो।"         

            देश में परमाणु विज्ञान के आधार स्तंभ होमी जहांगीर भाभा ने भारत सरकार द्वारा इप्टा के स्वर्ण जयंती वर्ष के अवसर पर स्मारक डाक टिकट जारी करने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा था कि "इप्टा को मिली सार्वजनिक मान्यता पर सभी को गर्व करने का पूरा अधिकार है।"उल्लेखनीय है कि "इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन" ( इप्टा) का नामकरण स्वयं डॉक्टर भाभा ने ही किया था।


हरनाम सिंह

कागज़ों में कैद नागरिक, पहचान, अधिकार और भारतीय लोकतंत्र का बदलता चेहरा- राजकुमार अग्रवाल


भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है। संविधान हर नागरिक को समानता, स्वतंत्रता, गरिमा और जीवन जीने का अधिकार देता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में आम भारतीय नागरिक के जीवन का एक बड़ा हिस्सा कागज़ों, प्रमाण पत्रों, बायोमेट्रिक सत्यापन, डिजिटल पहचान और सरकारी प्रक्रियाओं में उलझता चला गया है। आज भारत का नागरिक अपने अस्तित्व को साबित करने के लिए बार-बार सरकार के सामने खड़ा दिखाई देता है। वह जन्म लेता है तो जन्म प्रमाण पत्र चाहिए, स्कूल जाता है तो आधार चाहिए, मोबाइल लेना है तो बायोमेट्रिक चाहिए, बैंक खाता खोलना है तो केवाईसी चाहिए, शादी करनी है तो विवाह प्रमाण पत्र चाहिए, यात्रा करनी है तो पहचान पत्र चाहिए, जमीन खरीदनी है तो दर्जनों दस्तावेज चाहिए, सरकारी योजना लेनी है तो हर महीने जीवित होने का प्रमाण चाहिए।

यह स्थिति केवल प्रशासनिक व्यवस्था का विस्तार नहीं रह गई है, बल्कि धीरे-धीरे नागरिक और राज्य के बीच अविश्वास का प्रतीक बनती जा रही है। सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र में नागरिक सरकार के लिए बना है या सरकार नागरिकों के लिए? क्या किसी व्यक्ति की पहचान केवल कागज़ों और बायोमेट्रिक डेटा से तय होगी? क्या इंसान की गरिमा से बड़ा कोई दस्तावेज हो सकता है?

*पहचान का संकट: नागरिक या दस्तावेज?*

भारत में आज एक सामान्य नागरिक के पास कई प्रकार के पहचान पत्र होते हैं—आधार कार्ड, वोटर कार्ड, राशन कार्ड, पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट, परिवार पहचान पत्र, जन्म प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र, बैंक पासबुक, बिजली बिल, गैस कनेक्शन, स्वास्थ्य कार्ड और न जाने कितने अन्य दस्तावेज।

विडंबना यह है कि इनमें से कोई भी दस्तावेज हर जगह मान्य नहीं होता। एक विभाग कहता है आधार लाओ, दूसरा कहता है राशन कार्ड चाहिए, तीसरा कहता है परिवार पहचान पत्र जरूरी है, चौथा कहता है केवल पासपोर्ट चलेगा। नागरिक की पहचान कभी पूरी नहीं मानी जाती।

यह स्थिति केवल तकनीकी अव्यवस्था नहीं है, बल्कि प्रशासनिक सोच का परिणाम है जिसमें नागरिक को हमेशा “संदेह” की नजर से देखा जाता है। सरकारें मानकर चलती हैं कि व्यक्ति गलत जानकारी दे सकता है, इसलिए हर कदम पर प्रमाण मांगो, सत्यापन कराओ, बायोमेट्रिक लो, फोटो लो, हस्ताक्षर मिलाओ, फाइल बनाओ और नागरिक को दफ्तर-दफ्तर भटकाओ।

एक गरीब मजदूर, किसान, विधवा महिला या बुजुर्ग व्यक्ति के लिए यह प्रक्रिया किसी यातना से कम नहीं होती। वह सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाता है, साइबर कैफे में पैसे खर्च करता है, लाइन में खड़ा रहता है और अंत में अक्सर सुनता है—“सिस्टम डाउन है, कल आना।”

*डिजिटल इंडिया: सुविधा या नया बोझ?*

डिजिटल इंडिया का विचार सुनने में आकर्षक लगता है। सरकार ने दावा किया कि डिजिटल तकनीक भ्रष्टाचार कम करेगी, पारदर्शिता बढ़ाएगी और लोगों को सुविधा देगी। लेकिन जमीनी सच्चाई अलग दिखाई देती है।

आज गांवों में लाखों लोग ऐसे हैं जिनके पास स्मार्टफोन नहीं है। इंटरनेट की गुणवत्ता खराब है। बुजुर्गों को तकनीक समझ नहीं आती। पढ़े-लिखे लोग भी कई बार ऑनलाइन पोर्टल और ऐप्स की जटिलता से परेशान हो जाते हैं।

सरकारें मान बैठी हैं कि हर नागरिक डिजिटल रूप से सक्षम है। लेकिन भारत की वास्तविकता यह नहीं है। यहां अभी भी करोड़ों लोग ऐसे हैं जो ऑनलाइन फार्म भरने, ऐप डाउनलोड करने, ओटीपी डालने और दस्तावेज अपलोड करने की प्रक्रिया से डरते हैं।

डिजिटल इंडिया का सपना तब तक अधूरा रहेगा जब तक तकनीक इंसान के लिए सरल नहीं बनती। अगर तकनीक नागरिक को और अधिक परेशान करे, तो वह सुविधा नहीं बल्कि नया बोझ बन जाती है।

*आधार और बायोमेट्रिक का जाल*

आधार कार्ड को शुरू में केवल एक पहचान परियोजना बताया गया था। बाद में धीरे-धीरे इसे हर चीज से जोड़ दिया गया—बैंक खाते, मोबाइल नंबर, राशन, पेंशन, छात्रवृत्ति, गैस सब्सिडी, स्कूल दाखिला, अस्पताल और यहां तक कि मृत्यु प्रमाण पत्र तक।

आज स्थिति यह है कि अगर किसी व्यक्ति का फिंगरप्रिंट मशीन में मैच नहीं हुआ, तो उसका राशन रुक सकता है। बुजुर्गों के अंगूठे कई बार मशीन नहीं पहचानती। मजदूरों के हाथों की रेखाएं मिट जाती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट नहीं चलता। लेकिन सिस्टम कहता है—“ऑथेंटिकेशन फेल।”

सवाल यह है कि क्या किसी इंसान का जीवन एक मशीन के सफल या असफल होने पर निर्भर होना चाहिए?

तकनीक का उद्देश्य इंसान की मदद करना होना चाहिए, न कि इंसान को मशीन के सामने असहाय बना देना।

*नाम पर भी नियंत्रण?*

भारतीय समाज में नाम केवल पहचान नहीं होता, वह संस्कृति, परिवार, परंपरा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा होता है। लेकिन आज नाम बदलना भी एक कठिन प्रशासनिक प्रक्रिया बन चुका है।

कई राज्यों में स्कूल रिकॉर्ड, आधार, परिवार पहचान पत्र, बैंक खाते और अन्य दस्तावेजों में नाम की छोटी सी गलती सुधारने में महीनों नहीं बल्कि वर्षों लग जाते हैं।

हरियाणा जैसे राज्यों में पुराने रिकॉर्ड बदलवाना लगभग असंभव माना जाता है। जिन लोगों के नाम 1970 या 1980 के दशक में स्कूलों में गलत दर्ज हो गए थे, वे आज तक सुधार के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

लोकतंत्र में किसी व्यक्ति को अपने नाम, पहचान और निजी जीवन पर अधिकार होना चाहिए। लेकिन जब एक नागरिक अपने ही नाम में बदलाव नहीं करवा पाता, तब यह केवल प्रशासनिक समस्या नहीं रहती, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रश्न में बदल जाती है।

*हरियाणा की “जीवंत प्रमाण” व्यवस्था और महिलाओं का अपमान*

हरियाणा सरकार की दीन दयालु लाडो लक्ष्मी योजना ने एक गंभीर बहस को जन्म दिया है। योजना के तहत आर्थिक सहायता पाने वाली महिलाओं से हर महीने “जीवित होने का प्रमाण” मांगा जा रहा है। मोबाइल पर संदेश भेजे जाते हैं जिनमें महिलाओं से अपनी फोटो अपलोड करने को कहा जाता है ताकि वे साबित कर सकें कि वे जीवित हैं।

यह केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं है। यह एक सामाजिक और मानवीय प्रश्न है।

एक ओर सरकार महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की बात करती है, दूसरी ओर उन्हीं महिलाओं से हर महीने जिंदा होने का सबूत मांगती है।

ग्रामीण क्षेत्रों में हजारों महिलाएं ऐसी हैं जिनके पास स्मार्टफोन नहीं है। उन्हें साइबर कैफे या दूसरों के मोबाइल पर निर्भर रहना पड़ता है। कई महिलाएं तकनीकी जानकारी के अभाव में योजना से वंचित हो सकती हैं।

सवाल यह भी है कि जब बुजुर्ग पेंशन, विधवा पेंशन और अन्य योजनाओं में हर महीने ऐसा प्रमाण नहीं मांगा जाता, तो केवल महिलाओं के लिए यह व्यवस्था क्यों?

आर्थिक सहायता देना स्वागत योग्य कदम हो सकता है, लेकिन सहायता के बदले किसी नागरिक की गरिमा को ठेस पहुंचाना लोकतांत्रिक संवेदनशीलता नहीं कहलाता।

*सरकारी अविश्वास की राजनीति*

भारत की प्रशासनिक व्यवस्था में एक गहरी मानसिकता दिखाई देती है—नागरिक पर भरोसा मत करो।

अगर कोई व्यक्ति पेंशन ले रहा है, तो उससे बार-बार जीवित होने का प्रमाण मांगो। अगर कोई किसान सब्सिडी चाहता है, तो उससे कई प्रमाण पत्र मांगो। अगर कोई छात्र छात्रवृत्ति चाहता है, तो उसकी पहचान, आय, निवास, जाति और बैंक खाते का बार-बार सत्यापन करो।

सरकारें यह भूल जाती हैं कि हर अतिरिक्त दस्तावेज गरीब व्यक्ति के लिए अतिरिक्त बोझ होता है।.

जिस देश में करोड़ों लोग रोज कमाकर खाते हैं, वहां बार-बार दफ्तरों के चक्कर लगाना आर्थिक और मानसिक दोनों प्रकार का उत्पीड़न बन जाता है।

*क्या नागरिक की स्वतंत्रता घट रही है?*

भारतीय संविधान व्यक्ति को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है। लेकिन आज नागरिक का जीवन लगातार निगरानी, सत्यापन और डेटा संग्रह के दायरे में आ रहा है।

मोबाइल नंबर से लेकर बैंक खाते तक, यात्रा से लेकर खरीदारी तक, लगभग हर गतिविधि किसी न किसी डिजिटल रिकॉर्ड में दर्ज हो रही है।

सरकारें इसे सुरक्षा और पारदर्शिता का नाम देती हैं। लेकिन लोकतंत्र में सबसे बड़ा सवाल हमेशा यह होता है—राज्य की शक्ति की सीमा क्या होनी चाहिए?

अगर सरकार नागरिक के हर कदम पर निगरानी रखे, हर सुविधा के बदले पहचान मांगे और हर अधिकार को कागजी प्रक्रिया से जोड़ दे, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे नियंत्रण तंत्र में बदल सकता है।

*संघीय ढांचा और अलग-अलग राज्यों की समस्याएं*

भारत एक संघीय लोकतंत्र है। अलग-अलग राज्यों की अपनी प्रशासनिक व्यवस्थाएं हैं। लेकिन लगभग हर राज्य में नागरिक दस्तावेजों और सत्यापन की समस्याओं से जूझ रहा है।

*उत्तर प्रदेश*

जाति प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र और आय प्रमाण पत्र के लिए लंबी प्रक्रियाएं आम शिकायत हैं।

*बिहार*

भूमि रिकॉर्ड और पहचान दस्तावेजों में त्रुटियां वर्षों तक लोगों को परेशान करती हैं।

*राजस्थान*

डिजिटल सेवाओं के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में तकनीकी पहुंच सीमित है।

*पंजाब*

भूमि रजिस्ट्रेशन और राजस्व रिकॉर्ड में देरी आम समस्या है।

*महाराष्ट्र*

शहरी क्षेत्रों में ऑनलाइन सिस्टम होने के बावजूद कई सेवाओं में दस्तावेजों की पुनरावृत्ति होती है।

*हरियाणा*

परिवार पहचान पत्र, सामाजिक योजनाओं और दस्तावेज सत्यापन की जटिलता लगातार विवाद का विषय रही है।

इससे स्पष्ट है कि समस्या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है। यह पूरे प्रशासनिक ढांचे की सोच से जुड़ा मुद्दा है।

*गरीब सबसे ज्यादा क्यों परेशान होता है?*

एक अमीर व्यक्ति एजेंट रख सकता है, वकील कर सकता है, निजी सुविधा ले सकता है। लेकिन गरीब व्यक्ति के पास समय, संसाधन और तकनीकी सहायता नहीं होती।

अगर किसी मजदूर का राशन कार्ड बंद हो जाए, तो उसका परिवार भूखा रह सकता है। अगर किसी बुजुर्ग की पेंशन रुक जाए, तो उसकी दवा बंद हो सकती है। अगर किसी महिला का दस्तावेज गलत हो जाए, तो वह सरकारी योजना से बाहर हो सकती है।

कागजी व्यवस्था का सबसे बड़ा बोझ हमेशा कमजोर वर्ग पर पड़ता है।

*क्या यह विकास का मॉडल है?*

सरकारें अक्सर कहती हैं कि यह सब “सिस्टम सुधार” के लिए जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास का अर्थ केवल डेटा संग्रह और सत्यापन है?

*विकास का वास्तविक अर्थ होना चाहिए—*

शिक्षा की सरल पहुंच

स्वास्थ्य सुविधाएं

रोजगार

सुरक्षित जीवन

न्याय तक आसान पहुंच

सम्मानजनक प्रशासन

अगर नागरिक अपना अधिकांश समय केवल प्रमाण पत्र बनवाने में बिताने लगे, तो यह विकास नहीं बल्कि प्रशासनिक जटिलता का विस्तार कहलाएगा।

*लोकतंत्र का मूल प्रश्न: सरकार किसके लिए?*

लोकतंत्र का आधार नागरिक होता है। सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है ताकि वह जनता की सुविधा और अधिकारों की रक्षा कर सके।

लेकिन जब नागरिक ही सरकार के सामने बार-बार अपनी पहचान साबित करने लगे, तब लोकतांत्रिक संतुलन बिगड़ने लगता है।

सरकार का काम नागरिक को सम्मान देना है, न कि उसे हर समय शक की निगाह से देखना।

अगर कोई व्यक्ति दस्तावेज नहीं बनवाना चाहता, तो उसे बुनियादी अधिकारों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। नागरिकता का अर्थ केवल सरकारी डेटाबेस में दर्ज होना नहीं है। नागरिकता एक संवैधानिक और मानवीय संबंध है।

*कोरोना काल और पहचान की राजनीति*

कोरोना महामारी के दौरान भी लोगों को कई प्रकार के प्रमाण और दस्तावेजों से गुजरना पड़ा। कई जगह राशन, यात्रा और सहायता योजनाओं के लिए पहचान आधारित प्रक्रियाएं लागू की गईं।

इस दौरान यह स्पष्ट हुआ कि भारत की प्रशासनिक व्यवस्था संकट के समय भी कागजी नियंत्रण से बाहर नहीं निकल पाती।

जब लोगों को तत्काल राहत चाहिए थी, तब भी कई स्थानों पर दस्तावेज प्राथमिकता बन गए।

*क्या समाधान संभव है?*

समस्या केवल आलोचना से हल नहीं होगी। कुछ बुनियादी सुधार जरूरी हैं—

1. एकीकृत पहचान व्यवस्था

अगर सरकार पहचान प्रणाली बना चुकी है, तो एक ही पहचान हर विभाग में मान्य होनी चाहिए।

2. मानव आधारित विकल्प

जहां डिजिटल सत्यापन असफल हो, वहां मानवीय विकल्प उपलब्ध होना चाहिए।

3. ग्रामीण डिजिटल सहायता

हर गांव में मुफ्त तकनीकी सहायता केंद्र स्थापित होने चाहिए।

4. दस्तावेजों की संख्या कम हो

सरकारी सेवाओं में आवश्यक दस्तावेजों की सीमा तय होनी चाहिए।

5. सम्मानजनक प्रशासन

किसी भी योजना में ऐसी भाषा और प्रक्रिया न हो जो नागरिक की गरिमा को ठेस पहुंचाए।

6. डेटा सुरक्षा कानून

नागरिकों के बायोमैट्रिक और निजी डेटा की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

*सबसे बड़ा सवाल*

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है—क्या सरकार नागरिक पर भरोसा करती है?

अगर हर महीने किसी महिला से पूछा जाए कि “साबित करो कि तुम जीवित हो,” तो यह केवल तकनीकी सत्यापन नहीं बल्कि राज्य और नागरिक के बीच अविश्वास का प्रतीक बन जाता है।

एक लोकतंत्र में सरकार का दायित्व नागरिक को सम्मान देना है, न कि उसे हर समय प्रमाण देने के लिए मजबूर करना।

भारत एक महान लोकतांत्रिक राष्ट्र है, लेकिन लोकतंत्र केवल चुनावों से मजबूत नहीं होता। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब नागरिक सम्मान महसूस करे, जब प्रशासन सरल हो, जब सरकार जनता पर भरोसा करे और जब व्यक्ति की गरिमा को कागजों से ऊपर रखा जाए।

आज जरूरत इस बात की है कि भारत डिजिटल और प्रशासनिक सुधारों को मानवीय दृष्टिकोण से देखे। तकनीक नागरिक की सेवक बने, मालिक नहीं। दस्तावेज सुविधा का माध्यम बनें, उत्पीड़न का नहीं।

अगर भारत को वास्तव में विकसित राष्ट्र बनना है, तो उसे केवल डिजिटल डेटा नहीं बल्कि मानवीय गरिमा को केंद्र में रखना होगा। क्योंकि किसी भी लोकतंत्र की असली पहचान उसके नागरिकों के सम्मान से होती है, न कि उनके पास मौजूद कागजों की संख्या से।

*लेखक*

राजकुमार अग्रवाल

वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, राजनीतिक विश्लेषक एवं दुभाषी दैनिक ‘अटल हिन्द’ के सम्पादक।


नाबालिग बालिका से दुष्कर्म का आरोपी गिरफ्तार, दो ट्रको की टक्कर, दोनो चालक घायल, अस्पताल में भर्ती


अनूपपुर

कोतवाली अनूपपुर पुलिस द्वारा 17 वर्षीय नाबालिग बालिका के साथ दुष्कर्म के आरोपी को जिला शहडोल से गिरफ्तार किया गया है। नाबालिग बालिका द्वारा अपने माता पिता के साथ थाना कोतवाली अनूपपुर पहुंचकर रिपोर्ट दर्ज कराई गई कि रिस्तेदारी में बरहो के कार्यक्रम के दौरान मोहित पटेल निवासी ग्राम पड़रिया थाना बुढार जिला शहडोल से परिचय और दोस्ती होने के बाद मोहित पटेल नाबालिग बालिका के घर आना जाना करने लगा और इस बीच आरोपी द्वारा नाबालिग बालिका के साथ शारीरिक दुष्कर्म किया गया है। उक्त रिपोर्ट पर थाना कोतवाली अनूपपुर में अपराध क्रमांक 292/26 धारा 64(2) (m), बीएनएस एवं 5,6 पाक्सो एक्ट पंजीबद्ध किया गया।

टी.आई. कोतवाली अरविन्द जैन के नेतृत्व में महिला उपनिरीक्षक सरिता लकड़ा, प्रधान आरक्षक रीतेश सिहं, शेख रसीद एवं आरक्षक अब्दुल महिला आरक्षक अंकिता सोनी की टीम के द्वारा नाबालिग बालिका का मेडिकल परीक्षण कराया जाकर तत्काल चन्दघण्टो में आरोपी नवयुवक मोहित पटेल पिता भगवानदास पटेल उम्र करीब 23 साल निवासी ग्राम पड़रिया थाना बुढार जिला शहडोल को घर से गिरफ्तार कर न्यायालय पेश किये जाने पर उक्त प्रकरण में जेल भेजा गया है।

*दो ट्रको की जोरदार टक्कर, दोनो चालक हुए घायल, अस्पताल में भर्ती*


शहडोल जिले के जयसिंहनगर और गोहपारू थाना क्षेत्र की सीमा में स्थित चुन्दी नदी के पास रविवार सुबह दो ट्रकों की आमने-सामने जोरदार भिड़ंत हो गई। हादसा इतना भीषण था कि दोनों ट्रकों के केबिन बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए और चालक अंदर ही फंस गए। घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस टीम मौके पर पहुंची और स्थानीय लोगों की मदद से राहत एवं बचाव कार्य शुरू किया गया।

पुलिस और ग्रामीणों ने काफी मशक्कत के बाद दोनों ट्रकों को पीछे खिंचवाकर केबिन में फंसे चालकों को बाहर निकाला। रेस्क्यू के दौरान मौके पर लोगों की भीड़ जमा रही। गंभीर रूप से घायल दोनों चालकों को तत्काल उपचार के लिए अस्पताल भेजा गया, जहां उनका इलाज जारी है।

समय रहते पुलिस द्वारा किए गए रेस्क्यू के कारण दोनों घायलों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। प्रारंभिक जांच में तेज रफ्तार और सड़क पर नियंत्रण खोने की आशंका जताई जा रही है। पुलिस दुर्घटना के कारणों की जांच शुरू कर दी है।

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