भारतीय मध्यस्थता परिषद की बागडोर राजा-महाराजाओं को सोंपी जाये- दारा सेना-हिन्दू संगठन

भारतीय मध्यस्थता परिषद की बागडोर राजा-महाराजाओं को सोंपी जाये- दारा सेना-हिन्दू संगठन

*हिन्दू संघटनो ने निकाली रैली, सभी हिन्दू मन्दिरों को सरकारी कब्जे से मुक्त किया जाये*


 *न्यू दिल्ली से पत्रकार ऊषा माहना

नई दिल्ली

दारा सेना, सनातन धर्म रक्षा संघ, भारत साम्राज्य, हिन्दू महासभा आदि हिन्दू संगठनों की ओर से एक रैली हिन्दू महासभा भवन से जन्तर-मन्तर नई दिल्ली तक निकाली गयी। जिसमें हिन्दू संगठनों ने मांग की कि सरकारों द्वारा मन्दिरों के अरबों-खरबों रुपयों की लूटपाट बन्द की जानी चाहिये। इसी के साथ सरकार द्वारा कब्जे में लिए गये मन्दिरों की सम्पत्ति और चन्दे की राशि का प्रबन्धन राजा-महाराजाओं हाथ में दिया जाये।

रैली के दौरान हिन्दू संगठनों और कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए दारा सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुकेश जैन ने कहा कि जब से माउन्टबेटन ने साजिश रचकर भारत से राजशाही का खात्मा किया और 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने राजाओं के खिताब छीने तब से भारत में न्याय व्यवस्था बिलकुल चौपट हो गयी है। हमारे राजा-महाराजा न्याय करने में निपुण थे। हिन्दू वर्ण व्यवस्था के अनुसार भगवान मनु ने क्षत्रिय वर्ण का कर्तव्य शासन करना, राष्ट्र रक्षा करना और प्रजा को न्याय देना बताया। 

श्री जैन ने हाल ही में भारतीय मध्यस्थता परिषद अधिनियम के गठन के लिए मोदी सरकार को बधाई दी। श्री जैन ने हिन्दू संगठनों की ओर से भारत सरकार से मांग की कि चौपट हो चुकी न्याय व्यवस्था को मजबूत करने के लिए मध्यस्थता परिषद की बागडोर राजा-महाराओं की दे दी जाए। सरकार के तमाम प्रयासों यहां तक की 2 साल पहले सभी मुकदमों को मध्यस्थता केन्द्रों में सुलझाने का निर्णय लेने के बाद भी मुकदमों की संख्या कम होने के स्थान पर बढ़ ही रही है। इन मुकदमों की संख्या को कम करने के लिए हमें कुछ नया ही करना होगा। जिसके तहत मध्यस्थता परिषद की बागडोर राजा महाराजाओं के हाथ में देकर हम मुकदमों का समाधान राजशाही काल की तरह शीघ्र अतिशीघ्र कर सकते हैं। 

रैली में कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए सनातन धर्म रक्षा संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री मानिक देशमुख ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 26 ख के तहत धार्मिक संस्थओं को अपने धार्मिक कार्यो के प्रबन्धन का मूलाधिकार दिया गया है। हमारे बड़े - बड़े मन्दिरों के अरबों - खरबों के चन्दें को जिस प्रकार से तमिलनाडू के ईसाई मुख्यमंत्री स्टालिन ओर जोसफ विजय लूट रहे हैं। आंध्रप्रदेश के ईसाई मुख्य मंत्री जगन मोहन रेड्डी ने जिस प्रकार से त्रिपति मन्दिर के भगवान विष्णु के लड्डू प्रसादम् में घी के बदले गाय-सूअर ओर मछली की चर्बी मिलाई ओर सर्वोच्च न्यायालय के जजों और वकीलों ने इन दुष्टों को सजा से बचाया उससे यह तो तय हो गया है कि सर्वोच्च न्यायालय हिन्दू विरोधियों ओर दिमागी नक्सलियों का गढ़ बना हुआ है। भगवान विष्णु का अपमान करने पर उनके एक भक्त वकील ने जिस प्रकार से सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश गवई को जूता मारा उससे साफ हो चुका है कि दुष्टों के विनाश की लीला आरम्भ हो चुकी है।

हिन्दू संगठनों ने भारत सरकार से मांग की कि सभी हिन्दू मन्दिरों को सरकारी कब्जे से मुक्त किया जाये और उनके कोष सहित सभी व्यवस्था पूर्व की तरह राजा महाराजाओं को दी जाये। मन्दिरों के इस कोष का उपयोग इन राजा-महाराजाओं द्वारा गौ सरंक्षण- संवर्धन, प्रजा को मध्यस्थता के जरिये न्याय देने, अंग्रेजो द्वारा चौपट की गुरूकुल शिक्षा व्यवस्था, भारतीय न्याय व्यवस्था और आयुर्वेदिक चिकित्सा के संवर्धन के साथ-साथ छोटे मन्दिरों पंडित पुजारियों को वेतन देने और गरीबों हिन्दुओं को रोजी रोटी देने में किया जायेगा।

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