भाजपा नेता अपने को एक समाचार दैनिक समाचार पत्र का संपादक कहने वाला छद्म भेस में पत्रकार- सत्येंद्र स्वरूप दुबे
*राहुल गांधी ने पद का दुरुपयोग नहीं, लोकतांत्रिक जिम्मेदारी निभाई, पीड़ित की शिकायत मामला दर्ज कराना अपराध नहीं*
अनूपपुर
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के 21 अगस्त को दिल्ली के संसद मार्ग थाने पहुंचकर कथित पैलेट गन से घायल युवक साहिल लोचाब की शिकायत पर FIR दर्ज कराने की मांग को “पद का गलत और नाजायज इस्तेमाल” बताना न केवल राजनीतिक पूर्वाग्रह को दर्शाता है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था और कानून की मूल भावना को भी गलत तरीके से प्रस्तुत करता है।
सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि राहुल गांधी ने किसी पुलिसकर्मी को दोषी घोषित नहीं किया, न ही किसी व्यक्ति के विरुद्ध स्वयं सजा सुनाई। उन्होंने एक घायल युवक को साथ लेकर उसकी शिकायत दर्ज करने और पूरे मामले की जांच की मांग की। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार युवक की शिकायत पर अंततः दिल्ली पुलिस ने अज्ञात व्यक्ति/व्यक्तियों के विरुद्ध FIR दर्ज की है। FIR में भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है।
*FIR दर्ज कराने की मांग को “पद का दुरुपयोग” कैसे*
भारत के संविधान में नेता प्रतिपक्ष कोई ऐसा पद नहीं है जिसका अर्थ यह हो कि उस पद पर बैठा व्यक्ति पुलिस से ऊपर हो जाता है। लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं है कि नेता प्रतिपक्ष किसी नागरिक के साथ कथित अन्याय होने पर उसकी आवाज उठाना छोड़ दे।
यदि किसी घायल नागरिक की शिकायत पुलिस द्वारा दर्ज नहीं की जा रही हो और वह व्यक्ति स्वयं न्याय की मांग कर रहा हो, तो विपक्ष के सर्वोच्च संसदीय पद पर बैठे नेता का उसके साथ खड़ा होना लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा है।
राहुल गांधी ने पुलिस को किसी निष्कर्ष तक पहुंचने का आदेश नहीं दिया। उन्होंने सिर्फ यह सवाल उठाया कि यदि युवक घायल हुआ है और वह अपराध की शिकायत कर रहा है तो उसकी शिकायत विधिवत दर्ज कर जांच क्यों नहीं की जा रही?
*सुप्रीम कोर्ट की जांच और FIR दोनों अलग*
लेख में यह तर्क दिया गया है कि जब सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच हो रही है तो राहुल गांधी को पुलिस के पास नहीं जाना चाहिए था।
यह तर्क कानूनी रूप से स्वतः सही नहीं हो जाता।
किसी घटना की उच्चस्तरीय जांच चलना इस बात का प्रमाण नहीं है कि संबंधित व्यक्ति की शिकायत दर्ज ही नहीं की जाएगी। FIR किसी आरोप को सत्य घोषित नहीं करती; FIR तो जांच की शुरुआत का माध्यम है।
यही कारण है कि 21 अगस्त को दिल्ली पुलिस ने शिकायत स्वीकार करते हुए मामला दर्ज किया। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि राहुल गांधी द्वारा उठाया गया प्रश्न केवल राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि एक वास्तविक शिकायत के पंजीकरण से जुड़ा था।
“अगर पैलेट गन चली तो सिर्फ एक व्यक्ति कैसे घायल हुआ?” यह कैसा तर्क है?
किसी घटना में कितने लोग घायल हुए, इससे यह तय नहीं होता कि घटना हुई अथवा नहीं हुई। सूचना अधिकार के तहत निकाली गई जानकारी में 10 व्यक्ति पायलट से घायल होना बताया गया। परंतु यदि
किसी व्यक्ति को गोली, पैलेट या किसी अन्य वस्तु से चोट लगी है तो उसका सत्यापन मेडिकल रिपोर्ट, घटनास्थल के साक्ष्य, वीडियो फुटेज, पुलिस रिकॉर्ड, हथियार/गोला-बारूद के रिकॉर्ड और स्वतंत्र जांच से होगा।
यह कहना कि “हजारों की भीड़ थी, इसलिए केवल एक व्यक्ति घायल कैसे हुआ” अपने आप में कोई कानूनी निष्कर्ष नहीं है। बल्कि यही तो जांच का विषय है कि चोट किससे लगी, किस परिस्थिति में लगी और उस समय सुरक्षा बलों द्वारा कौन-कौन से उपकरण इस्तेमाल किए गए।
“वीडियो में पैलेट गन क्यों नहीं दिखाई दी?”वीडियो ही अंतिम सबूत नहीं
किसी घटना का वीडियो सामने न आना इस बात का प्रमाण नहीं कि घटना हुई ही नहीं। भीड़ नियंत्रण की घटनाओं में सैकड़ों कैमरों से अलग-अलग कोणों की रिकॉर्डिंग हो सकती है। किसी विशेष क्षण में किस उपकरण का इस्तेमाल हुआ, यह केवल सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो देखकर तय नहीं किया जा सकता।
मेडिकल रिपोर्ट, घटनास्थल से प्राप्त सामग्री, पुलिस की जनरल डायरी, ड्यूटी रिकॉर्ड, हथियारों और गोला-बारूद का हिसाब तथा प्रत्यक्षदर्शियों के बयान भी जांच के महत्वपूर्ण हिस्से होते हैं।
दिलचस्प तथ्य यह है कि 28 जुलाई की एक रिपोर्ट में संसद स्ट्रीट थाने की जनरल डायरी के हवाले से दावा किया गया था कि RAF ने भीड़ नियंत्रण के दौरान प्लास्टिक पैलेट वाले बैलिस्टिक कारतूस का इस्तेमाल किया था। इसलिए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होना और भी आवश्यक हो जाता है।
*कांग्रेस का सवाल सीधा है*
यदि सुरक्षा बलों ने पैलेट गन या पैलेट वाले किसी उपकरण का इस्तेमाल नहीं किया, तो निष्पक्ष जांच में यह तथ्य सामने आ जाएगा।यदि इस्तेमाल हुआ था, तो यह भी जांच में सामने आना चाहिए कि किसके आदेश पर, किस परिस्थिति में और किस नियम के तहत उसका इस्तेमाल किया गया।
*दोनों परिस्थितियों में जांच ही रास्ता है*
कांग्रेस न तो किसी निर्दोष पुलिसकर्मी को दोषी ठहराने की मांग कर रही है और न ही किसी आरोपी को बिना जांच के अपराधी घोषित कर रही है। कांग्रेस की मांग केवल इतनी है कि पीड़ित की शिकायत दर्ज हो, साक्ष्यों की जांच हो और दोषी व्यक्ति की पहचान कानून के अनुसार हो।
“क्या राहुल गांधी हर पीड़ित के साथ खड़े होते हैं?”यह मुद्दे से भटकाने वाला सवाल
यदि देश में हजारों लोग अन्याय का सामना करते हैं तो यह सरकार और व्यवस्था के लिए और बड़ा सवाल होना चाहिए, न कि राहुल गांधी के लिए।
किसी एक पीड़ित के साथ खड़े होने से दूसरे पीड़ितों के अधिकार समाप्त नहीं हो जाते। इसके बजाय सवाल यह होना चाहिए कि देश की पुलिस व्यवस्था ऐसी क्यों हो कि किसी नागरिक को अपनी शिकायत दर्ज कराने के लिए किसी बड़े नेता की आवश्यकता पड़े? यदि पुलिस हर नागरिक की शिकायत कानून के अनुसार स्वतः दर्ज करे और जांच करे, तो किसी नेता को थाने में धरना देने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।
*नेता प्रतिपक्ष की संवैधानिक भूमिका*
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का दायित्व केवल संसद के भीतर सरकार की आलोचना करना नहीं है। वह जनता की शिकायतों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही से जुड़े मुद्दों को भी उठाता है।राहुल गांधी का थाने जाना किसी जांच अधिकारी की भूमिका निभाना नहीं था। उन्होंने पुलिस से सिर्फ शिकायत दर्ज कर जांच शुरू करने की मांग की। अंततः FIR दर्ज हो चुकी है। अब न राहुल गांधी को फैसला करना है और न भाजपा को।
*फैसला साक्ष्यों के आधार पर*
इसलिए राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि जांच निष्पक्ष हो, CCTV और मोबाइल वीडियो सुरक्षित रखे जाएं, मेडिकल रिकॉर्ड की जांच हो, पुलिस की जनरल डायरी और ड्यूटी रिकॉर्ड सामने आएं तथा जिस प्रकार के हथियार या कारतूस इस्तेमाल हुए उनका आधिकारिक रिकॉर्ड जांचा जाए।
यदि राहुल गांधी गलत हैं तो जांच उन्हें गलत साबित कर देगी। यदि राहुल गांधी द्वारा उठाया गया सवाल सही है तो जांच दोषियों तक पहुंचेगी। लोकतंत्र में सवाल पूछना पद का दुरुपयोग नहीं है। सवालों को दबाना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए ज्यादा गंभीर चिंता का विषय है।
*सत्येंद्र स्वरूप दुबे जिला महामंत्री कांग्रेस जिला अनूपपुर*
