जनादेश का हुआ अपमान, पार्षद चुनाव में जनता ने नकारा, हारे हुए प्रत्याशी को बना दिये एल्डरमैन, संगठन की कार्यशैली पर सवाल
अनूपपुर
लोकतंत्र में जनता का फैसला सर्वोपरि माना जाता है। एक सच्चे जनप्रतिनिधि की पहचान यही है कि वह जनादेश का सम्मान करते हुए अपनी राजनीति को जन-सेवा के प्रति समर्पित रखे। लेकिन आज के दौर में नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं नैतिक मूल्यों पर भारी पड़ती दिखाई दे रही हैं। ऐसा ही एक ताजा और विवादित मामला नगर परिषद बरगवां से सामने आया है, जहां भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सत्ता संगठन ने जनता द्वारा पूरी तरह नकारे जा चुके नेताओं को पिछले दरवाजे से एंट्री दे दी है।
हाल ही में घोषित हुए मनोनीत पार्षदों की सूची के बाद क्षेत्र की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। इस सूची में मुख्य रूप से उन चेहरों को शामिल किया गया है, जो वार्ड पार्षद का चुनाव बुरी तरह हार चुके थे। इसमें बड़ा नाम संदीप पुरी का है कांग्रेस की अर्चना यादव से जो वार्ड सदस्य का चुनाव हारकर मैदान से बाहर हो गया था। वहीं दूसरा प्रमुख नाम अजय सिंह का है, जिन्हें संजय नगर की जनता ने पूरी तरह नकार दिया था।
अब स्थानीय जनता और राजनीतिक गलियारों में यह गंभीर सवाल उठ रहा है कि जब जनता ने इन नेताओं को एक बार पूरी तरह अस्वीकार कर दिया, तो फिर संगठन ने इन्हें मनोनीत पार्षद बनाकर पिछले दरवाजे से नगर परिषद में प्रवेश क्यों कराया? क्या यह सीधे तौर पर जनता के फैसले और लोकतंत्र का अपमान नहीं है?
इस फैसले से भाजपा के उन निष्ठावान कार्यकर्ताओं और जमीनी नेताओं में भारी असंतोष और निराशा है, जो वर्षों से पार्टी के लिए काम कर रहे हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि संगठन को ऐसे समर्पित कार्यकर्ताओं को मौका देना चाहिए था, जो चुनाव के वक्त सच्चे सिपाही की तरह पार्टी प्रत्याशी को जिताने के लिए तन, मन और धन से जुटे रहते हैं। हारे हुए प्रत्याशियो को यदि संगठन को उपकृत करना ही था तो नेताओं की योग्यता अनुसार संगठन के किसी दायित्व की जिम्मेदारी सौंप दी तो दूसरे दल से आए हुए इन नेताओं का भारतीय जनता पार्टी की संस्कृति से परिचय तो हो जाता है।
