हिंदी-उर्दू-सिंधी अदब पर गोष्ठी संपन्न, शोषण के खिलाफ लेखन प्रगतिशील साहित्य होता है, 14वां राज्य सम्मेलन अक्टूबर में
जनवादी लेखक संघ के वरिष्ठ साथी रजनी रमण शर्मा के निधन पर दी गई भावभीनी श्रद्धांजलि*
इंदौर
प्रगतिशील लेखक संघ का गठन अदब के क्षेत्र में आया इंकलाब था। तरक्की-पसंद होना सम्मान की बात है। जब तक इंसान भूखा रहेगा, उसका शोषण होगा, ऐसे लोगों की पीड़ा पर जो कुछ भी लिखा जाएगा, वह प्रगतिशील साहित्य ही होगा।
ये विचार वरिष्ठ लेखक अज़ीज़ इरफ़ान ने व्यक्त किए। वे हिंदी-उर्दू-सिंधी अदब पर आयोजित विचार गोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। प्रगतिशील लेखक संघ का 14वाँ राज्य सम्मेलन अक्टूबर माह में आयोजित होना है। इसी सिलसिले में जारी रचनात्मक बैठकों की कड़ी में आयोजित गोष्ठी में उन्होंने कहा कि वर्तमान समय अधिक खतरनाक है। पहले जमींदारों द्वारा शोषण होता था, वर्तमान में शोषण के तरीके बदल गए हैं।
प्रगतिशील लेखक संघ राष्ट्रीय सचिव मंडल के सदस्य विनीत तिवारी ने कहा कि तरक्की-पसंद शायरों और लेखकों ने दुनिया को सुंदर बनाया है। कहा जाता है कि आज़ादी से पहले के भारत को समझने के लिए प्रेमचंद को तथा आज़ादी के बाद के हिंदुस्तान को समझने के लिए हरिशंकर परसाई और श्रीलाल शुक्ल को पढ़ा जाना चाहिए। अब इस कसौटी में राही मासूम रज़ा को भी जोड़ा जाना चाहिए, जिनका जन्म शताब्दी वर्ष प्रारंभ हो रहा है।
विनीत तिवारी ने कहा कि तरक़्क़ी पसंद की कोई एक परिभाषा नहीं हो सकती। इश्क़ और मोहब्बत भी प्रगतिशीलता के ही ज़रूरी हिस्से हैं। प्रगतिशीलता एक आंदोलन है। तरक़्क़ीपसंद होने का मतलब अपने दिल को बड़ा रखना है, हक़ीक़त को बिना डरे बयां करना है। व्यक्तिगत एवं पारिवारिक जीवन में भी दोहरी मानसिकता से बचना ज़रूरी है। ज़बान जोड़ने का काम करती है और सियासतदाँ भाषा के नाम पर लोगों को लड़ाते हैं।
मसूद बेग़ तिश्ना ने मध्य प्रदेश के विभिन्न शहरों-कस्बों—खंडवा, सिरोंज, बुरहानपुर, जावरा, रतलाम, जबलपुर, ग्वालियर, इंदौर, भोपाल, उज्जैन सहित अनेक शहरों के शायरों द्वारा रचित प्रगतिशील शायरी की जानकारी दी।
चुन्नीलाल वाधवानी के अनुसार, तरक़्क़ीपसंद वह है जो ग़रीबों के पक्ष में लिखे। चंद अच्छे शेर लिखकर ही कोई प्रगतिशील शायर नहीं हो सकता। जब तक मजलूमों का दर्द महसूस नहीं होगा, तब तक प्रगतिशील शायरी संभव नहीं है। शेख अयाज़ ने पाकिस्तान में प्रगतिशील लेखक संघ का गठन सिंधी अदब संगत के रूप में किया था। यह संगठन आज भी दोनों देशों में सक्रिय है।
जावेद आलम ने गद्य के क्षेत्र में लिखने वाले उर्दू लेखकों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि लेखक का काम अमन की हिमायत करना, मोहब्बत का पैगाम देना और इंसानों के बीच भाईचारे का पुल बनाना है।
कार्यक्रम में निर्मल जैन ने ‘हमें कैसा हिंदुस्तान चाहिए’ और नीपा पांडेय ने ‘भरोसा रख, तेरा वक्त आएगा’ कविता का पाठ किया। गोष्ठी का संचालन करते हुए सारिका श्रीवास्तव ने कहा कि यह ऐसा समय है, जब नफरत की आवाज़ ऊँची सुनाई देती है। ऐसे समय में साहित्य ही हमें याद दिलाता है कि दुनिया केवल विचारों से नहीं, बल्कि रिश्तों, भरोसे और प्रेम से भी संचालित हो सकती है।
गोष्ठी में जनवादी लेखक संघ के वरिष्ठ साथी रजनी रमण शर्मा के निधन पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। आभार अभय नेमा ने माना। गोष्ठी में समीर खान, अभय लोधी, एम. बासित, अरविंद पोरवाल, हरनाम सिंह, नेहा दुबे, सरफ़राज़ नूर इंदौरी और मोहम्मद इकबाल अंसारी ने भी शिरकत की।
