कलेक्टर के आदेश पर खंड शिक्षा अधिकारी ने ठोकी कील
उच्च न्यायालय ने जारी किया स्थगन,
अब प्रशासन में चर्चा - जब कलेक्टर की ही नहीं सुनी तो आम आदमी की कौन सुनेगा
संतोष कुमार मिश्रा
उमरिया --- उमरिया जिले में प्रशासनिक व्यवस्था किस तरह चरमराई हुई है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कलेक्टर उमरिया के आदेश के बाद भी एक अदने से अधिकारी को राहत पहुंचाने के लिए कलेक्टर के आदेश को ही छिपा कर उनकी प्रशासनिक क्षमता पर कील ठोंक दी गई। हैरतअंगेज है कि जब कलेक्टर के आदेश ही समय पर क्रियान्वित नहीं होते तो अन्य मामलों में विभागीय अधिकारी क्या गुल खिलाते होंगे उसकी तो कल्पना ही की जा सकती है। पाली खंड शिक्षा अधिकारी सरिता जैन द्वारा छात्राओं की यूनिफॉर्म, पठन-पाठन सामग्री, चादर, तकिया, गद्दे, कंबल आदि की राशि हड़पने के मामले में यही हुआ है।
मामला सत्र 2025-26 का है। पाली विकासखंड की कक्षा 9 से 12 तक की आदिवासी छात्राओं के खातों में शासन से यूनिफॉर्म सहित अन्य सामग्री के लिए आई राशि को तत्कालीन खंड शिक्षा अधिकारी सरिता जैन के व्दारा छात्राओं के खाते से आहरित करा कर अपने स्तर पर राशि हडप ली थी। जिसकी शिकायत छात्र संगठनों ने कलेक्टर जनसुनवाई में की थी। कलेक्टर के निर्देश पर संभागीय उपायुक्त जनजातीय कार्य शहडोल ने जांच की और आरोप सही पाए। इसके बाद विभाग ने 27 जुलाई, 31 जुलाई, 3 अगस्त, 6 अगस्त और 13 अगस्त को लगातार नोटिस जारी किए, व्हाट्सएप नंबर 9407033930 पर भी सूचना भेजी, लेकिन न तो राशि वापस आई न कोई जवाब आया। अंततः पहले उनका अतिरिक्त प्रभार कन्या शिक्षा परिसर पाली से वापस लिया गया, फिर 31 जुलाई को निलंबन किया गया और 2 सितंबर को तीन गंभीर आरोपों में आरोप पत्र जारी हुआ।
इसी दौरान कलेक्टर न्यायालय की नस्ती में 27 अगस्त 2026 को पत्र क्रमांक 1269998/2026 से स्पष्ट आदेश हुआ कि सहायक आयुक्त जनजातीय कार्य पूजा द्विवेदी तत्काल पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराकर जानकारी दें। यह आदेश मैदानी स्तर पर क्रियान्वित कराने की जिम्मेदारी वर्तमान में कुर्सी पर बैठे खंड शिक्षा अधिकारी की थी, लेकिन वर्तमान खंड शिक्षा अधिकारी ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को चकमा देकर पूरे प्रकरण में कलेक्टर उमरिया को नीचा दिखाने का कुत्सित प्रयास किया, जिसकी चर्चा अब पूरे प्रशासनिक गलियारे में है।
हुआ यह कि 27 अगस्त के आदेश के बाद 23 दिन तक फाइल को जानबूझकर थाने तक नहीं पहुंचने दिया गया। कागजों में नोटिस और चार्जशीट की औपचारिकता चलती रही, लेकिन प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए पुलिस अधीक्षक या थाना पाली को एक आवेदन तक नहीं भेजा गया। इस सुनियोजित देरी का सीधा लाभ आरोपी को मिला। आरोपी ने इसी बीच हाईकोर्ट जबलपुर में याचिका WP-38539/2026 दायर कर दी और 19 सितंबर को जस्टिस विवेक कुमार सिंह की एकलपीठ से कलेक्टर के 27 अगस्त वाले प्राथमिकी दर्ज करने के आदेश पर स्थगन का आदेश ले आई। कोर्ट ने साथ ही निर्देश दिया कि विभागीय जांच प्रमाणित प्रति मिलने से 3 माह में पूरी की जाए।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब संभागीय उपायुक्त की जांच में आरोप सिद्ध हो चुका था, छात्राओं की राशि आज तक वापस नहीं आई है, तो 23 दिन तक प्राथमिकी क्यों रोकी गई? क्या वर्तमान खंड शिक्षा अधिकारी और निलंबित खंड शिक्षा अधिकारी के बीच कोई ऐसी सांठगांठ है जो कलेक्टर के आदेश पर भारी पड़ गई? क्या जानबूझकर आरोपी को हाईकोर्ट जाने का समय दिया गया ताकि कलेक्टर का आदेश ही निष्प्रभावी हो जाए?
एक तरफ कलेक्टर छात्राओं के हक की राशि के लिए प्राथमिकी तक के आदेश दे रहे हैं, दूसरी तरफ उनके ही मातहत अधिकारी आदेश को दबाकर आरोपी को राहत दिला देते हैं। यदि कलेक्टर के आदेश का ही यह हश्र है तो जिले में आम आदमी की शिकायतों पर क्या कार्रवाई होती होगी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। अब देखना यह है कि कलेक्टर अपने आदेश की इस अवहेलना और उन्हें नीचा दिखाने वाले इस खेल पर वर्तमान खंड शिक्षा अधिकारी और दोषी अमले पर क्या कार्रवाई करते हैं।