पोषण माह पर राज्य स्तरीय परामर्श कार्यक्रम आयोजित, बच्चों के पोषण एवं क्रेच नीति पर दिया गया जोर
*कार्यक्रम में 68 सहयोगी संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने लिया भाग*
नई दिल्ली
नींव दिल्ली फोर्सेस द्वारा कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया, रफ़ी मार्ग, नई दिल्ली में पोषण माह राज्य स्तरीय परामर्श कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में 68 सहयोगी संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि डॉ. ओम प्रकाश व्यास (अध्यक्ष, दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग) शामिल हुए। इसके साथ अन्य नेटवर्क के प्रतिनिधि डॉ. नूपुर बिड़ला (नापी नेटवर्क), डॉ. अपराजिता शर्मा (नेशनल फोर्सेस), अमरीश दुबे (NCCM), अशिया (राइट टू फूड), अवधेश यादव (संयोजक, नींव दिल्ली फोर्सेस), अशोक कुमार झा (स्टीयरिंग सदस्य, नींव दिल्ली फोर्सेस), थानेश्वर दयाल अदिगोंड (स्टीयरिंग सदस्य, नींव दिल्ली फोर्सेस) तथा संतलाल (नींव दिल्ली फोर्सेस प्रतिनिधि) भी उपस्थित रहे।
इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य बच्चों के पोषण, प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं विकास (ECCD), घर के बने पौष्टिक भोजन को बढ़ावा देने तथा अल्ट्रा-प्रोसेस्ड और पैकेटबंद खाद्य पदार्थों के बढ़ते उपयोग को कम करने पर चर्चा करना था।
कार्यक्रम का उद्घाटन थानेश्वर दयाल अदिगोंड (स्टीयरिंग सदस्य, नींव दिल्ली फोर्सेस) ने किया। उन्होंने पोषण माह के दौरान विभिन्न संगठनों द्वारा एक महीने में की गई गतिविधियों और प्रयासों की जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि इस अभियान में विभिन्न संगठनों ने भागीदारी की और ECCD एवं बच्चों के पोषण में सुधार के लिए सामूहिक प्रयास करने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम की शुरुआत स्टीयरिंग कमेटी के सदस्यों एवं डॉ. ओ.पी. व्यास की उपस्थिति में दीप प्रज्वलन के साथ हुई। इसके बाद ज्ञानवती एवं उनके साथियों ने गीत प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में डॉ. ओ.पी. व्यास, अवधेश यादव, संतलाल, गुड्डी, फारूक और रिंकी सहित विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधियों का स्वागत किया गया।
डॉ. ओ.पी. व्यास ने बाल कल्याण के क्षेत्र में अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि बच्चों के अधिकारों, पोषण और स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर केवल चर्चा करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें व्यवहार में लागू करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि बच्चों और महिलाओं को गुणवत्तापूर्ण भोजन उपलब्ध कराना सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। सरकार, सामाजिक संगठनों और समुदाय को मिलकर काम करना होगा, ताकि बच्चों को उचित पोषण मिल सके।
उन्होंने भोजन में मिलावट, खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को गंभीर विषय बताते हुए कहा कि पोषण माह की गतिविधियों को केवल एक महीने तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इन्हें निरंतर जारी रखना चाहिए। उन्होंने पारंपरिक और घर के बने भोजन को बढ़ावा देने तथा आंगनवाड़ी और क्रेच में दिए जाने वाले भोजन की गुणवत्ता की निगरानी पर भी जोर दिया। क्रेच सुविधाओं और दिल्ली में क्रेच नीति की मांग पर भी उन्होंने सहमति दी।
बैठक में नेशनल नेटवर्क FORCES तथा क्रेच से जुड़े प्रयासों पर चर्चा की गई। नेटवर्क के प्रतिनिधियों ने बताया कि दिल्ली में विभिन्न प्रयासों के माध्यम से 611 क्रेच खोले जाने की उपलब्धि हासिल हुई है। अब आवश्यकता है कि क्रेच सुविधाओं को और मजबूत किया जाए तथा आंगनवाड़ी के साथ क्रेच सेवाओं को जोड़ने की दिशा में काम किया जाए।
बैठक में निर्माण श्रमिकों, घरेलू कामगारों और कामकाजी महिलाओं के बच्चों के लिए सुरक्षित एवं गुणवत्तापूर्ण देखभाल सुविधाओं की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया गया। प्रतिनिधियों ने दिल्ली में क्रेच नीति (Palna Policy) तैयार करने की मांग उठाई, ताकि छोटे बच्चों की देखभाल, पोषण और विकास के लिए व्यवस्थित व्यवस्था सुनिश्चित की जा सके।
कार्यक्रम के दौरान नेटवर्क की वेबसाइट और वार्षिक रिपोर्ट का डॉ. ओ.पी. व्यास द्वारा शुभारंभ किया गया। इसके साथ ही अतिथियों के कर-कमलों द्वारा वार्षिक प्रतिवेदन का विमोचन भी किया गया।
बैठक के प्रथम सत्र में विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधियों ने पोषण माह के दौरान किए गए कार्यों, समुदाय तक पहुंच और अपने अनुभव साझा किए। अवधेश यादव ने अभियान की समग्र उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए बताया कि 32 गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) ने 33 क्षेत्रों में मिलकर प्रत्यक्ष रूप से 2,622 और अप्रत्यक्ष रूप से 1,878 लोगों की अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों के प्रति समझ बढ़ाई।
अन्य प्रतिनिधियों ने भी बताया कि बच्चों और अभिभावकों को पौष्टिक भोजन, खाद्य पदार्थों के लेबल, सामग्री, चीनी और वसा की मात्रा तथा पैकेटबंद खाद्य पदार्थों के संभावित दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक करना जरूरी है। सामाजिक संवाद और सोशल मीडिया के माध्यम से इस जानकारी को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया।
प्रतिभागियों ने भोजन की गुणवत्ता की जांच, आंगनवाड़ी एवं अन्य संस्थागत रसोई की निगरानी तथा भोजन से जुड़ी शिकायतों के लिए प्रभावी व्यवस्था विकसित करने के सुझाव दिए।
दूसरे सत्र में आयोजित पैनल चर्चा में बाल अधिकार, पोषण, खाद्य सुरक्षा, महिलाओं के अधिकार और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों के विनियमन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार साझा किए गए। अशोक झा ने बच्चों के अधिकारों और उचित पोषण के लिए प्रभावी नीतियों तथा नियमों की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बच्चों के पोषण की स्थिति को समझने और सुधारने के लिए उपलब्ध आंकड़ों, निगरानी तथा सामाजिक अंकेक्षण को महत्व देना चाहिए।
राइट टू फूड से अशिया ने कहा कि पोषण को केवल न्यूनतम आहार तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि बच्चों को पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण भोजन उपलब्ध कराने पर ध्यान देना चाहिए। बजट में पोषण के लिए पर्याप्त संसाधन, मिड-डे मील की गुणवत्ता और प्रवासी एवं विस्थापित बच्चों के भोजन के अधिकार को सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
नूपुर बिड़ला ने मातृत्व अधिकारों, स्तनपान, छोटे बच्चों के पूरक आहार और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों के नियमन से जुड़े मुद्दे उठाए। उन्होंने खाद्य पैकेटों पर सामग्री, चीनी और वसा की मात्रा स्पष्ट रूप से लिखने तथा उपभोक्ताओं को सचेत करने वाले प्रभावी चेतावनी लेबल की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने बच्चों को लक्षित करने वाले खाद्य विज्ञापनों पर उचित नियमन की भी बात कही।
डॉ. अपराजिता शर्मा ने कहा कि बच्चों की देखभाल और पोषण की जिम्मेदारी का बड़ा हिस्सा महिलाओं पर रहता है। इसलिए महिलाओं के अधिकारों, परिवारों की वास्तविक परिस्थितियों और समुदाय की जरूरतों को ध्यान में रखकर नीतियां बनानी चाहिए। उन्होंने सभी नेटवर्कों के साथ मिलकर जागरूकता अभियान चलाने और स्थानीय स्तर पर पोषण संबंधी मुद्दों को उठाने की आवश्यकता बताई।
*बैठक में प्रमुख सुझाव एवं कार्ययोजनाएं*
1. जागरूकता अभियान: घर के बने ताजे और पौष्टिक भोजन को बढ़ावा देने तथा अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों के उपयोग को कम करने के लिए समुदाय में निरंतर अभियान चलाना।
2. सामूहिक मांग-पत्र: अन्य नेटवर्कों के सहयोग से खाद्य गुणवत्ता से संबंधित मांग-पत्र तैयार करना।
3. खाद्य पैकेटों पर स्पष्ट जानकारी: खाद्य पदार्थों की सामग्री, चीनी और वसा की मात्रा तथा चेतावनी संबंधी जानकारी स्पष्ट रूप से हिंदी में उपलब्ध कराने की मांग करना।
4. बच्चों के लिए खाद्य सुरक्षा: छह वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों के नियमन और बच्चों को लक्षित विज्ञापनों पर प्रभावी नियंत्रण की मांग करना।
5. जनसुनवाई का आयोजन: चारों क्षेत्रों में अन्य नेटवर्कों और दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग (DCPCR) के सहयोग से पोषण, भोजन की गुणवत्ता और बच्चों के अधिकारों पर जनसुनवाई आयोजित करना।
6. दिल्ली में क्रेच नीति: कामकाजी महिलाओं और छोटे बच्चों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए दिल्ली में प्रभावी क्रेच नीति बनाने की मांग को आगे बढ़ाना।
7. संयुक्त शोध और दस्तावेजीकरण: पोषण, खाद्य गुणवत्ता, बच्चों के स्वास्थ्य और स्थानीय खाद्य परंपराओं पर संयुक्त शोध कर साक्ष्य-आधारित सुझाव तैयार करना।
8. सोशल मीडिया और जनसंचार: जागरूकता पोस्टर, डिजिटल सामग्री और अन्य माध्यमों से सही पोषण संबंधी जानकारी अधिक से अधिक परिवारों तक पहुंचाना।
कार्यक्रम के समापन पर कविता ने सभी प्रतिभागियों, FORCES की स्टीयरिंग कमेटी, विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधियों, सहयोगी संगठनों और नेटवर्क सदस्यों का धन्यवाद किया। ज्ञानवती जी एवं उनके साथियों की गीत प्रस्तुति के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
बैठक का मुख्य संदेश रहा कि बच्चों को उचित पोषण, सुरक्षित भोजन और गुणवत्तापूर्ण देखभाल उपलब्ध कराना केवल सरकार की नहीं, बल्कि समाज, संगठनों और समुदाय की साझा जिम्मेदारी है। पोषण माह के प्रयासों को निरंतर जारी रखते हुए बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य और समग्र विकास के लिए सामूहिक रूप से काम करना आवश्यक है।
*न्यू दिल्ली से पत्रकार ऊषा माहना*
