न्यू जोन पावर प्लांट ग्रामीणों की चर्चा में उजली उम्मीद, नौजवान, बुजुर्ग, किसान तय कर रहे हैं गांव का भविष्य *मिल गया मुआवजा, मिलेगी नौकरी, होगा गांव का विकास*

न्यू जोन पावर प्लांट ग्रामीणों की चर्चा में उजली उम्मीद, नौजवान, बुजुर्ग, किसान तय कर रहे हैं गांव का भविष्य

*मिल गया मुआवजा, मिलेगी नौकरी, होगा गांव का विकास*


अनूपपुर

रक्सा और कोलमी गांव की गलियों, आँगनों और बरगद तले बैठकों में इन दिनों एक ही चर्चा है—न्यू जोन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड का पावर प्लांट और उसका हमारे जीवन पर असर। बड़े-बुजुर्ग, महिलाएं, नौजवान और किसान मिलकर यह तय कर रहे हैं कि गांव का भविष्य कैसे बेहतर बनाया जाए।

कक्का का सवाल—“कंपनी आई तो हमें क्या मिला?” कक्का ने गंभीर स्वर में पूछा—“बरसों से सरकारें आती-जाती रहीं, लेकिन हमारी सुध किसी ने नहीं ली। अब कंपनी आई है, तो हमें क्या मिला? सिर्फ बातें या सच में कुछ होगा?”

घसीटा ने थोड़ा मुस्कुराते हुए कहा, “कक्का भाई, मुआवजा तो मिला है, पर असली सवाल यह है कि हम इसका कैसे इस्तेमाल करें। कंपनी सिर्फ पैसे देने आई नहीं है, बल्कि गांव के विकास में मदद करने भी आई है। हमें धैर्य रखना होगा।”

एक बुजुर्ग ने जोड़ते हुए कहा, “बेटा, सही कहा घसीटा ने। हमें अब समझदारी से कदम उठाने होंगे, ताकि गांव का चेहरा बदले और हमारे घर, बच्चे और बुजुर्ग खुशहाल रहें।”

घसीटा का सवाल—“युवाओं का भविष्य कहां है?” घसीटा ने सवाल उठाया “हमारे नौजवानों के लिए रोजगार क्या मिलेगा? अगर प्लांट शुरू होता है तो गांव के युवा बाहर नौकरी के लिए पलायन नहीं करेंगे न?”

कक्का ने सहमति जताई, “हां, यही चिंता है। हमें देखना होगा कि युवा कैसे स्किल सीखें और अपने ही गांव में काम कर सकें। अगर हम बहकावे में आए तो यही मौका खो देंगे।”

एक युवा ने उत्साह में कहा, “धैर्य और तालमेल से काम लें, तो यह मौका हमारे लिए सुनहरा साबित होगा। प्लांट से रोजगार मिलेगा और अभी रोजगार उपलब्ध कराया गया जिससे खाली बैठे लोगों को काम में लगाया गया है और पलायन की मजबूरी खत्म होगी।”

कक्का—“कंपनी सुख-दुख में साथ होगी?” कक्का ने गंभीर स्वर में कहा—“आज मुआवजा मिल गया, पर कल अगर किसी को संकट आया तो क्या कंपनी हमारे साथ खड़ी होगी?”

घसीटा ने जवाब दिया,“कक्का भाई, कंपनी ने साफ कहा है कि यह सिर्फ उद्योग नहीं, बल्कि गांव की साझीदार है। स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं में योगदान दिया जाएगा। हमें सहयोग करना होगा और उनका भरोसा बनाना होगा।”

एक बुजुर्ग ने समझाया,“सच है। अगर हम समझदारी से काम करेंगे, तो बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्गों की सुविधा और महिलाओं की मदद सब संभव है।”

घसीटा—“प्लांट लगने के बाद गांव का चेहरा कैसा होगा?” घसीटा ने उत्सुकता जताते हुए पूछा—“अगर प्लांट लग गया, तो हमारे गांव में बदलाव कैसा दिखेगा?”

कक्का ने जवाब दिया,“सोचिए, जहां अब धूल और अंधेरा है, वहां सड़कें, बिजली और बाजार की रौनक आएगी। छोटे दुकानदारों को फायदा होगा, और गांव का जीवन स्तर सुधरेगा।”

एक महिला ने कहा, “हमारे बच्चों के लिए अच्छे स्कूल, बुजुर्गों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं और महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता—यह सब संभव होगा।”

कक्का—“कुछ लोग बहका रहे हैं, क्या सच है?” कक्का ने चिंता जताई“कुछ लोग कह रहे हैं कि कंपनी आएगी तो नुकसान होगा। हमें भ्रम में डाल रहे हैं। क्या यह सच है?”

घसीटा ने गंभीरता से कहा,“यह अफवाहें हैं। हमने मुआवजा ले लिया है, अब आगे बढ़ना ही समझदारी है। हमें बहकावे में नहीं आना है, बल्कि गांव और बच्चों के भविष्य के लिए सहयोग करना है। सभी ग्रामीण एक स्वर में बोले “अब हम किसी के बहकावे में नहीं आएंगे। यही समझदारी है।”

चौरंगी लाल का सवाल—“हमारे बच्चों का भविष्य क्या होगा?”चौरंगी लाल ने अंतिम सवाल उठाया—“हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे हमसे बेहतर जीवन जिएं। इसके लिए हमें क्या करना चाहिए?”

कक्का ने कहा,“हमें बच्चों को पढ़ाई-लिखाई, खेलकूद और अच्छे संस्कार देने होंगे। उन्हें सपने देखने दें और पूरा करने का मौका भी।”

घसीटा ने कहा, “प्लांट आने के बाद यह सब संभव होगा। हमें धैर्य और समझदारी से काम लेना होगा। बच्चियों और बेटों दोनों को बराबरी का मौका देना ही सही रास्ता है।” ग्रामीणों की आपसी समझ और नया सवेरा गांव की यह चर्चा सिर्फ सवाल-जवाब तक सीमित नहीं रही। लोगों ने महसूस किया कि पावर प्लांट उनके गांव के लिए नए युग का दरवाजा खोल रहा है।

कक्का ने अंत में कहा,“बरसों बाद किसी ने हमारी सुनी। हमने मुआवजा ले लिया, अब हमें मिलकर काम करना चाहिए। आने वाले सालों में जब गांव में सड़कें, बाजार और रोशनी होगी, तब सब समझेंगे कि यह फैसला कितना बड़ा था।”

घसीटा ने मुस्कुराते हुए कहा, “अब हमें अपने बच्चों, अपने घरों और गांव के लिए सोचकर आगे बढ़ना है। विकास का रास्ता यही है, और हमें साथ मिलकर इसे सफल बनाना है।” गांव की गलियों और आँगनों में लौटते वक्त हर किसी के मन में यही भावना थी “अब बदलाव का समय है, और हम अपने ही हाथों से इसे संभव बनाएँगे।”

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