66 करोड़ की नल जल योजना पर श्रमिकों का विद्रोह वेतन, सुरक्षा और श्रम अधिकारों की अनदेखी का आरोप
*51 गांवों की जलापूर्ति हुई ठप्प*
अनूपपुर
मध्यप्रदेश जल निगम मर्यादित द्वारा 66 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित किरगी ग्रामीण समूह जल प्रदाय योजना का उद्देश्य 51 गांवों तक शुद्ध पेयजल पहुंचाना था। इसके संचालन एवं रखरखाव का जिम्मा सी एम आर इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड को दिया गया है। कर्मचारियों का आरोप है कि वर्ष 2018 से लगातार सेवाएं देने के बावजूद उन्हें शासन द्वारा निर्धारित न्यूनतम मानदेय तक नहीं दिया गया है। इतना ही नहीं, जल शोधन संयंत्र,पंप हाउस,फील्ड कर्मचारियों सहित संवेदनशील स्थानों पर कार्य करने वाले कर्मचारियों को सुरक्षा उपकरण, बीमा और सुरक्षा निधि जैसी सुविधाओं से भी वंचित रखा गया है। कई बार शिकायतों और ज्ञापनों के बावजूद कोई समाधान नहीं निकला जिससे परेशान हो आखिरकार कर्मचारियों ने काम बंद कर हड़ताल शुरू कर दी है, जिससे पूरी योजना की कार्यप्रणाली और कंपनी की जवाबदेही पर सवाल खड़े हो गए हैं।
कर्मचारियों का आरोप है कि उन्हें शासन द्वारा निर्धारित दरों के अनुरूप भुगतान नहीं किया जा रहा है। यदि यह आरोप सही है तो यह न्यूनतम वेतन से जुड़े श्रम प्रावधानों के उल्लंघन का मामला बन सकता है। श्रमिकों का कहना है कि कई वर्षों से वेतन वृद्धि तक नहीं हुई जबकि महंगाई लगातार बढ़ती रही है। सवाल यह है कि करोड़ों की परियोजना में श्रमिकों को उनका वैधानिक अधिकार क्यों नहीं मिला है।
जल शोधन संयंत्र, पंप हाउस और विद्युत उपकरणों के बीच काम करने वाले कर्मचारियों को सुरक्षा किट, हेलमेट, दस्ताने, जूते और अन्य सुरक्षा संसाधन उपलब्ध कराना नियोक्ता की जिम्मेदारी मानी जाती है। हड़ताली कर्मचारियों का दावा है कि वर्षों की सेवा के बावजूद उन्हें सामाजिक सुरक्षा से जुड़े लाभों की स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है और न ही लाभ मिला है। श्रमिकों का कहना है कि सुरक्षा निधि और अन्य वैधानिक लाभ आज तक नहीं मिले है। यदि कर्मचारियों की पात्रता के बावजूद ऐसे लाभ नहीं दिए गए हैं तो संबंधित विभागों को इसकी जांच करनी चाहिए।
कर्मचारियों और ग्रामीणों का आरोप है कि कई गांवों में आज भी नल कनेक्शन होने के बावजूद नियमित पानी नहीं पहुंच रहा है। इसके बावजूद पंचायतों को योजना हस्तांतरित करने की तैयारी की जा रही है। सवाल उठ रहा है कि जब व्यवस्था पूरी तरह सुचारु नहीं हुई तो उसका संचालन ग्राम पंचायतों पर क्यों डाला जा रहा है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि 66 करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी यदि कर्मचारी असंतुष्ट हैं और कई गांवों को नियमित जलापूर्ति नहीं मिल रही तो जवाबदेही किसकी तय होगी? यदि कर्मचारियों के आरोप सही हैं तो संबंधित विभागों को निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार पक्षों पर कार्यवाही करनी चाहिए, ताकि 51 गांवों की जनता पेयजल संकट का सामना न करना पड़े।
