तप रहे धरती गगन, उगल रही है आग, नहाने देता नहीं टंकी का उबला पानी, उफ ये भयंकर गर्मी

तप रहे धरती गगन, उगल रही है आग, नहाने देता नहीं टंकी का उबला पानी, उफ ये भयंकर गर्मी


*उफ ये भयंकर गर्मी*


तप रहे धरती गगन उफ ये भयंकर गर्मी,

उगल रही है आग उफ ये भयंकर गर्मी।


इसके जुल्मो सितम से बिजली ही बचाती है,

एसी फ्रिज कूलरों से ठंडकें बरसाती है,

रौब बिजली ने अगर झाड़ा गर्मी मैडम पर,

वो उसके ट्रांसफार्मर ही फूंक जाती है।


 नहाने देता नहीं टंकी का उबला पानी,

फिर सताती है जमके उफ ये भयंकर गर्मी।


ब्यूटी पार्लर से सज के नौतपा में आती है,

फिर तो ये गरमा-गरम हीरोइन सी लगती हैं,

गर्मियों की लगे मिस इंडिया मिस वर्ल्ड कभी, 

मलिका-ए-तपन ग्रीष्म सुंंदरी सी लगती है।


आ रही लू की बिकनी पहने छुपा लो चेहरे, 

कनपटी सेक देगी उफ ये भयंकर गर्मी।


*गीतकार अनिल भारद्वाज एडवोकेट हाईकोर्ट ग्वालियर*

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