वेंटिलेटर पर एम्बुलेंस, धक्का प्लेट स्वास्थ्य व्यवस्था, मरीज की जान बचाने परिजन लगा रहे हैं धक्का

*कबाड़ गाड़ियों से मरीजो को जीवनदान देने का सपना अधूरा*


इंट्रो -अनूपपुर की सड़कों पर दौड़ती एंबुलेंस का एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है जिसने जिला स्वास्थ्य विभाग के दावों की धज्जियाँ उड़ा दी हैं। वीडियो में सायरन की गूँज नहीं, बल्कि लाचार परिजनों के कराहने और गाड़ी को धक्का मारने की आवाजें सुनाई दे रही हैं। लोग इस वीडियो को शेयर करते हुए पूछ रहे हैं कि क्या डिजिटल इंडिया में अब मरीजों की जान बचाने के लिए धक्का मार तकनीक ही आखिरी विकल्प बची है? यह वीडियो न केवल विभाग की किरकिरी करा रहा है, बल्कि सिस्टम के गाल पर एक जोरदार तमाचा भी है।

अनूपपुर

जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था अब भगवान भरोसे नहीं बल्कि जनता के धक्कों के भरोसे चल रही है। जिले में आपातकालीन सेवा की 108 एंबुलेंस खुद आपातकाल के दौर से गुजर रही है। जिस जीवनदायिनी गाड़ी को सायरन बजाते हुए सड़कों पर रफ्तार भरनी चाहिए थी वह अब धक्का स्टार्ट तकनीक के भरोसे खड़ी है। ऐसा लगता है कि प्रशासन ने मरीजों को अस्पताल पहुँचाने के लिए वाहनों के रखरखाव के बजाय राहगीरों और परिजनों की शारीरिक शक्ति पर निर्भर रहने का नया और शर्मनाक मानक तय कर लिया है।

मेडिकल साइंस में गोल्डन ऑवर यानी वह शुरुआती घंटा जिसमें मरीज की जान बचाई जा सकती है अनूपपुर में एंबुलेंस को स्टार्ट करने की मशक्कत में ही बर्बाद हो रहा है। ताज़ा हालातों ने यह गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर एंबुलेंस के मेंटेनेंस का बजट किसकी फाइलों में दबा है? जब गाड़ी खुद वेंटिलेटर पर हो, तो वह किसी मरणासन्न मरीज के लिए संजीवनी कैसे साबित हो सकती है। सड़कों पर दम तोड़ती ये गाड़ियाँ किसी भी वक्त किसी बड़े हादसे या असमय मौत का कारण बन सकती हैं, जिसका जवाबदेह कोई नहीं है।

सड़कों पर दिखने वाले ये दृश्य दिल दहला देने वाले हैं जहाँ एक बदहवास परिजन अपने मरीज की फिक्र छोड़कर गाड़ी को धक्का लगाता नजर आता है। अस्पताल पहुँचने की जल्दी और गाड़ी के स्टार्ट न होने का डर, परिजनों को मानसिक और शारीरिक रूप से तोड़ रहा है। विडंबना देखिए कि जिस व्यवस्था को जनता को राहत देनी थी, वही व्यवस्था आज जनता के कंधों पर बोझ बन गई है। प्रशासनिक अधिकारियों की चुप्पी और इस कबाड़ हो चुकी सेवा का निरंतर संचालन स्वास्थ्य विभाग की घोर लापरवाही और संवेदनहीनता को उजागर करता है।

डॉक्टर ने ऑपरेशन करने के नाम मरीज के परिवार से लिये 25 हजार, सिविल सर्जन से हुई शिकायत


शहडोल

जिला चिकित्सालय शहडोल में इलाज के नाम पर मरीजों से अवैध वसूली का मामला एक बार फिर सामने आया है। इस बार धनपुरी निवासी एक गरीब परिवार ने अस्पताल के सर्जन वी पी पटेल पर ऑपरेशन के बदले 25 हजार रुपये लेने का आरोप लगाया है। पीड़ित परिवार ने सिविल सर्जन से लिखित शिकायत कर कार्रवाई की मांग की है।

जानकारी के अनुसार धनपुरी के आलमगंज चीप हाउस निवासी मो. शिराजुद्दीन ने अपनी पत्नी असगरी बेगम (34) को 10 फरवरी को इलाज के लिए जिला अस्पताल में भर्ती कराया था। 12 फरवरी को ऑपरेशन होना था। परिजनों का आरोप है की ऑपरेशन से पहले ही सर्जन बीपी पटेल ने 25 हजार रुपये नकद देने की शर्त रख दी।

परिजनों के मुताबिक शिराजुद्दीन मूंगफली बेचकर परिवार का गुजारा करते हैं। पत्नी की जान बचाने के लिए उन्होंने रिश्तेदारों से उधार लेकर डॉक्टर को 25 हजार रुपये दिए। आरोप है कि रकम देने के बाद ही चिकित्सक ने ऑपरेशन किया। पर मरीज़ की हालत और भी ज्यादा बिगड़ गई।

हालांकि ऑपरेशन के करीब 22 दिन बीत जाने के बाद भी मरीज की हालत में कोई खास सुधार नहीं हुआ है। परिजनों का कहना है कि अब डॉक्टर जिम्मेदारी से बचते हुए मरीज को दूसरे अस्पताल रेफर करने की बात कह रहे हैं। इससे परिवार की चिंता और बढ़ गई है।

पीड़ित परिवार ने पूरे मामले की शिकायत सिविल सर्जन से की है और आरोप लगाया है कि सरकारी अस्पताल में गरीबों के मुफ्त इलाज के दावे केवल कागजों तक सीमित हैं। उनका कहना है कि आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों से भी इलाज के नाम पर पैसे लिए जा रहे हैं।

अस्पताल में बड़ी लापरवाही, प्रसव के दौरान नीचे गिरी महिला, नवजात की हुई मौत, प्रबंधन पर उठे सवाल


शहडोल 

जिले में स्वास्थ्य विभाग की गंभीर लापरवाही का मामला सामने आया है। जानकारी के अनुसार जयसिंहनगर क्षेत्र के ग्राम सेमरा निवासी उमा साकेत को प्रसव पीड़ा होने पर जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया था। प्रसव के दौरान अचानक वह नवजात शिशु सहित लेबर टेबल से नीचे गिर गईं। इस हादसे में नवजात की मौत हो गई, जबकि प्रसूता को भी अंदरूनी चोटें आई हैं। घटना के बाद परिजनों ने अस्पताल स्टाफ पर लापरवाही के गंभीर आरोप लगाए हैं।

पीड़िता के पति मुकेश साकेत का आरोप है कि प्रसव के दौरान लेबर रूम में सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया गया। उनका कहना है कि प्रसव के समय अचानक लेबर टेबल टूट गया, जिससे उमा साकेत और नवजात नीचे गिर गए। परिजनों का यह भी कहना है कि घटना के बाद अस्पताल स्टाफ ने उन्हें काफी देर तक प्रसूता से मिलने नहीं दिया। बाद में उमा साकेत को अचेत अवस्था में बाहर लाया गया और बताया गया कि मृत शिशु का जन्म हुआ है।

वहीं वर्तमान में पीएनसी वार्ड में भर्ती उमा साकेत ने भी बताया कि प्रसव के दौरान टेबल टूटने से वह नीचे गिर गई थीं। हालांकि उन्हें गंभीर चोट नहीं आई, लेकिन गिरने से उनकी हालत बिगड़ गई थी। अस्पताल सूत्रों के अनुसार भी लेबर टेबल के क्षतिग्रस्त होने के कारण यह हादसा हुआ, जिससे प्रसूता और नवजात दोनों नीचे गिर पड़े।

हालांकि, अस्पताल प्रबंधन ने इस मामले में लापरवाही से इनकार किया है। सिविल सर्जन डॉ. शिल्पी सराफ का कहना है कि उन्होंने स्वयं लेबर रूम का निरीक्षण किया है और टेबल टूटने जैसी कोई तकनीकी खराबी नहीं पाई गई। उनके अनुसार महिला का वजन अधिक होने के कारण प्रसव के दौरान संतुलन बिगड़ गया और वह नीचे गिर गईं। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि गर्भ में बच्चा आड़ा फंसा हुआ था, जो नवजात की मौत का कारण हो सकता है। 

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