प्रगतिशील लेखक संघ की बैठक संपन्न, अन्य विषयों पर की चर्चा


अनूपपुर

विगत दिवस प्रलेस अनूपपुर की मार्च माह की बैठक , प्रलेस अध्यक्ष गिरीश पटेल के निवास पर संपन्न हुई । प्रलेस द्वारा प्रकाशित होने वाली पुस्तक के संबंध में चर्चा हुई, इस पुस्तक के लिए सुधा शर्मा, रामनारायण पाण्डेय, विजेंद्र सोनी, मीना सिंह, नीरज श्रीवास्तव,तापस कुमार हाजरा, अभिलाषा अग्रवाल तथा संतोष सोनी की कविताएँ प्राप्त हुईं हैं साथ ही आनंद पाण्डेय और असीम मुखर्जी के लेख प्राप्त हुए हैं । जिन लेखकों के लेख और कवियों की कविताएँ आना शेष हैं, उनके प्राप्त होते ही संपादक मंडल सारी रचनाओं का संपादन कर प्रकाशक से चर्चा कर पुस्तक के प्रकाशन हेतु पहल करेगा । बैठक में इस विषय पर भी चर्चा हुई कि जिन सदस्यों की वार्षिक सहयोग राशि बकाया है वे अविलंब इसे जमा करा दें ।

प्रदेश प्रलेस के द्वारा आरती द्वारा संपादित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका “ समय के साखी “ जिसकी एक प्रति का मूल्य 200 रुपए है, वार्षिक  700 रुपए द्विवार्षिक 1400 तथा आजीवन 5 हजार रुपए हैं, इसके लिये प्रलेस अनूपपुर का सदस्य इसका भी सदस्य हो सकता है । प्रलेस अनूपपुर के सदस्यों के अलावा और भी कोई व्यक्ति यदि यह पत्रिका प्राप्त करना चाहता है तो वह प्रलेस अनूपपुर से संपर्क कर सकता है । इस बैठक में पवन छिब्बर, आनंद पाण्डेय, रामनारायण पाण्डेय,भूपेश शर्मा, विजेंद्र सोनी, असीम मुखर्जी, नीरज श्रीवास्तव तथा गिरीश पटेल उपस्थित रहे ।

गांजा बिक्री मामले में एसआई, एएसआई को पुलिस अधीक्षक ने किया लाइन अटैच


अनूपपुर

पुलिस जिन पर कानून की रक्षा का जिम्मा होता है, जब वही नियम-कायदों को ताक पर रखकर 'खेल' करने लगें, तो सवाल उठना लाजमी है। कुछ ऐसा ही मामला सामने आया है भालूमाड़ा थाना में, जहां कानून के रखवालों ने खुद ही कानून तोड़ने की 'डील' कर ली। परिणामस्वरूप, पुलिस अधीक्षक मोती उर्र रहमान ने सख्त कार्रवाई करते हुए एसआई राघव बागरी और एएसआई अरविंद राय को तत्काल प्रभाव से लाइन अटैच कर दिया।

मामला 25 मार्च की रात का है, जब भालूमाड़ा थाना क्षेत्र के ग्राम शिकारपुर में गांजा तस्करी की सूचना पर पुलिस ने आरोपियों का पीछा किया। बताया जा रहा है कि आरोपी मौके से भाग खड़े हुए, लेकिन उनके द्वारा छोड़ा गया लगभग 80 किलो गांजा एएसआई अरविंद राय ने जब्त करने के बजाय किसी 'गौतम' नामक व्यक्ति को बेच दिया। दिलचस्प बात यह रही कि थाना प्रभारी को इसकी भनक तक नहीं लगी। लेकिन कहते हैं न, चोरी के पांव नहीं होते। जब इस गोरखधंधे की शिकायत पुलिस अधीक्षक तक पहुंची, तो कार्रवाई होना तय था और राय को तत्काल प्रभाव से लाइन हाजिर कर दिया गया।

दूसरी ओर, भालूमाड़ा थाना में पदस्थ एसआई राघव बागरी की भूमिका भी कम संदिग्ध नहीं रही। सूत्रों के मुताबिक, बागरी ने गश्त के दौरान रेत के अवैध उत्खनन और परिवहन पर जानबूझकर आंखें मूंद लीं। यानी 'चुप्पी' का कुछ खास मोल चुकाया गया होगा! यह मामला सामने आने के बाद पुलिस अधीक्षक ने उन्हें भी बिना देर किए लाइन हाजि दिया। भ्रष्टाचार चाहे छोटे स्तर पर हो या बड़े, कानून से बड़ा कोई नहीं। अनूपपुर पुलिस अधीक्षक ने इस कार्रवाई से यह साफ कर दिया है कि यदि पुलिसकर्मी अपने कर्तव्यों से भटकते हैं, तो उनकी जगह वर्दी में नहीं, बल्कि लाइन में होती है।

सरकारी ज़मीन पर दबंगो का कब्ज़ा, प्रशासन बना मूकदर्शक, अतिक्रमणकारी के हौसले बुलंद

*रसूखदारों को सरकारी संपत्ति लूटने की मिली खुली छूट*


अनूपपुर

जिले में सरकारी ज़मीन पर अवैध कब्ज़े का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जहां अखिलेश गौतम निवासी धनगवा ने ग्राम पंचायत फुनगा, चमन चौक में शासकीय भूमि पर कब्ज़ा कर सेप्टिक टैंक का निर्माण शुरू कर दिया है। चौंकाने वाली बात यह है कि प्रशासन ने कई बार स्थगन आदेश जारी किए, लेकिन निर्माण कार्य नहीं रुका। ऐसा लगता है कि प्रशासन ने या तो आंखें मूंद ली हैं या फिर कोई ‘ऊपर से दबाव’ डलवा रहा है। क्या सरकारी तंत्र केवल कमजोर और गरीब लोगों पर ही अपना कानून चलाता है? क्योंकि जब कोई गरीब व्यक्ति फुटपाथ पर छोटी सी दुकान लगाता है, तो प्रशासन तुरंत कार्रवाई कर देता है, लेकिन जब कोई दबंग शासकीय ज़मीन पर कब्ज़ा करता है, तो अफसरों के हाथ-पैर कांपने लगते हैं!

*कब्जे का कच्चा-चिट्ठा प्रशासन मौन*

पटवारी हल्का फुनगा के प्रतिवेदन के आधार पर नायब तहसीलदार फुनगा ने इस अवैध कब्ज़े पर दिनांक 25/03/2025 को स्थगन आदेश जारी किया। रिपोर्ट के अनुसार, मामला खसरा नंबर 441/1/2/1 की 111.967 वर्गफीट सरकारी ज़मीन का है, जहां अवैध रूप से निर्माण किया जा रहा है। हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब प्रशासन ने इस अतिक्रमण को रोकने की कोशिश की हो। 2019 में भी प्रशासन ने इस अवैध निर्माण को रोकने के आदेश जारी किए थे, लेकिन अखिलेश गौतम ने कानून की धज्जियां उड़ाते हुए अपना निर्माण कार्य जारी रखा।अब सवाल यह उठता है कि अगर प्रशासन ने 2019 में कार्रवाई की होती, तो क्या आज यह अतिक्रमण जारी रहता? लेकिन हुआ क्या? प्रशासन फाइलों में आदेश पास करता रहा और दबंग अतिक्रमणकारी सरकारी ज़मीन पर खुलेआम कब्ज़ा करता रहा।

*रसूखदारों की दबंगई*

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन जानबूझकर इस अवैध कब्ज़े को नजरअंदाज कर रहा है? क्या इसमें किसी बड़े अधिकारी या नेता का हाथ है? क्योंकि जब कोई कमजोर व्यक्ति सरकारी नियमों का उल्लंघन करता है, तो प्रशासन फौरन हरकत में आ जाता है, लेकिन जब किसी रसूखदार व्यक्ति की बात आती है, तो कार्रवाई ठंडे बस्ते में डाल दी जाती है। यही कारण है कि अतिक्रमणकारी का मनोबल बढ़ता जा रहा है और प्रशासन पूरी तरह से लाचार नजर आ रहा है। अगर यही हाल रहा, तो आने वाले दिनों में जिलेभर में सरकारी ज़मीनों पर कब्ज़े का नया सिलसिला शुरू हो सकता है।

*कब जागेगा प्रशासन*

अब देखना यह होगा कि प्रशासन कब तक आंखें मूंदे बैठा रहेगा? क्या अब भी कार्रवाई होगी, या फिर रसूखदारों के आगे सरकार झुक जाएगी? अगर इस बार भी प्रशासन ने लापरवाही बरती, तो जनता के मन में यह सवाल उठना लाज़मी है कि कानून सिर्फ गरीबों के लिए है और रसूखदारों को खुली छूट मिली हुई है। जनता देख रही है, सवाल पूछ रही है और जवाब अब ज़रूरी हो गया है! प्रशासन को अब चाहिए कि अखिलेश गौतम के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करते हुए तुरंत बुलडोज़र चलाए और सरकारी भूमि को मुक्त कराए। वरना यह साफ हो जाएगा कि कानून सिर्फ कागजों तक सीमित है और रसूखदारों को सरकारी संपत्ति लूटने की खुली छूट दी गई है।

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