19 मंडल, एक भी जनजातीय मंडल अध्यक्ष नही, जनजातीय बाहुल्य जिले में भाजपा संघटन आदर्श विचारधारा की कर रही है हत्या

19 मंडल, एक भी जनजातीय मंडल अध्यक्ष नही, जनजातीय बाहुल्य जिले में भाजपा संघटन आदर्श विचारधारा की कर रही है हत्या


शहडोल


19 मंडल, एक भी जनजातीय मंडल अध्यक्ष नहीं: जनजातीय बाहुल्य शहडोल में भाजपा संगठन पर उपेक्षा के आरोप

शहडोल। जनजातीय बाहुल्य शहडोल जिले में भारतीय जनता पार्टी के संगठनात्मक विस्तार को लेकर नया विवाद सामने आया है। भाजपा के हालिया मंडल अध्यक्षों की नियुक्ति के बाद संगठन पर जनजातीय समाज की उपेक्षा के आरोप लगने लगे हैं। जिले के 19 मंडलों में एक भी जनजातीय चेहरे को मंडल अध्यक्ष की जिम्मेदारी नहीं दिए जाने से पार्टी के भीतर और जनजातीय समाज में असंतोष की चर्चा तेज हो गई है। जनजातीय मंडल अध्यक्ष की नियुक्ति न होने के मामले में भाजपा जिलाध्यक्ष अमिता चपरा पूरी तरह घिरते हुए नजर आ रही है। अब देखना यह होगा की भाजपा संगठन का डंडा जिलाध्यक्ष पर चलता है या यह पूरा मामला टॉय-टॉय फिस्स हो जाएगा।

जानकारी के अनुसार, भाजपा के प्रदेश संगठन द्वारा संगठनात्मक संतुलन और सामाजिक समरसता को ध्यान में रखते हुए विभिन्न वर्गों को प्रतिनिधित्व देने पर जोर दिया जाता रहा है। पार्टी के अंदर भी यह अपेक्षा व्यक्त की जाती रही है कि जनजातीय बहुल जिलों में जनजातीय कार्यकर्ताओं को संगठन में पर्याप्त अवसर दिए जाएं। ऐसे में शहडोल जैसे आदिवासी बहुल जिले में 19 में से एक भी मंडल अध्यक्ष जनजातीय वर्ग से नहीं बनाए जाने पर सवाल उठ रहे हैं।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि शहडोल संभाग लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता है। नगर निकाय से लेकर विधानसभा और लोकसभा चुनावों तक भाजपा को लगातार सफलता मिलती रही है। इस सफलता में जनजातीय समाज की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ऐसे में संगठनात्मक नियुक्तियों में इस वर्ग को प्रतिनिधित्व नहीं मिलना भविष्य की राजनीति पर प्रभाव डाल सकता है।

शहडोल संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व सांसद हिमाद्रि सिंह कर रही हैं, जिन्होंने पिछले लोकसभा चुनाव में रिकॉर्ड मतों से जीत दर्ज की थी। वहीं जिले की जयसिंहनगर विधानसभा से विधायक मनीषा सिंह प्रदेश भाजपा की उपाध्यक्ष होने के साथ संगठन में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा रही हैं। इसके अलावा ब्यौहारी से विधायक शरद कोल, जिन्हें प्रदेश के सबसे युवा विधायकों में गिना जाता है, तथा वरिष्ठ विधायक जय सिंह मरावी, जो लगातार छह बार विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं, भी जनजातीय समाज से आते हैं।

इतने प्रभावशाली जनजातीय जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी के बावजूद जिला संगठन में जनजातीय नेतृत्व को स्थान नहीं मिलने पर कई कार्यकर्ता इसे संगठनात्मक असंतुलन मान रहे हैं। उनका कहना है कि मंडल स्तर पर नेतृत्व तैयार करने का अवसर नहीं मिलने से युवा कार्यकर्ताओं का मनोबल प्रभावित हो सकता है।

सूत्रों के अनुसार, कई भाजपा कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि संगठन में सभी वर्गों को समान अवसर मिले तो पार्टी की जमीनी पकड़ और अधिक मजबूत होगी। उनका कहना है कि जनजातीय समाज हमेशा भाजपा के साथ मजबूती से खड़ा रहा है और संगठन में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संगठनात्मक नियुक्तियां केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं होतीं, बल्कि उनका सामाजिक और राजनीतिक संदेश भी जाता है। विशेषकर उन जिलों में जहां किसी वर्ग की आबादी और राजनीतिक भागीदारी अधिक हो, वहां उस वर्ग को संगठन में उचित प्रतिनिधित्व देना भविष्य की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

हालांकि, भाजपा जिला संगठन की ओर से इस विषय पर अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यदि संगठन की ओर से स्थिति स्पष्ट की जाती है तो इस विवाद की तस्वीर और साफ हो सकती है।

फिलहाल, 19 मंडलों में एक भी जनजातीय मंडल अध्यक्ष नहीं बनाए जाने का मुद्दा जिले में राजनीतिक चर्चा का केंद्र बना हुआ है। आने वाले समय में प्रदेश नेतृत्व इस विषय पर क्या रुख अपनाता है और संगठनात्मक स्तर पर कोई पुनर्विचार होता है या नहीं, इस पर राजनीतिक हलकों की नजर बनी हुई है। जनजातीय समाज के प्रतिनिधित्व को लेकर उठे इस विवाद का असर भविष्य में भाजपा की संगठनात्मक मजबूती और चुनावी रणनीति पर पड़ सकता है।

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