आधुनिक भारत का सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आंदोलन है इप्टा, मुंबई में संपन्न हुआ इप्टा का राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव
आधुनिक भारत का सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आंदोलन है इप्टा, मुंबई में संपन्न हुआ इप्टा का राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव
*आठ दशक से अधिक समय तक सक्रिय संगठन इप्टा देश का महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आंदोलन बन चुका है*
मुम्बई
जब देश स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत था, दुनिया विश्व युद्ध से जूझ रही थी। बंगाल के लोग अकाल की त्रासदी भोग रहे थे। उसी दौरान 25 मई 1943 को विभिन्न राज्यों, रियासतों से आए लेखकों, कलाकारों ने मुंबई में इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (भारतीय जन नाट्य संघ) इप्टा का गठन किया था। युद्ध, अकाल, राजनीतिक दमन के दौर में इप्टा ने रंगमंच, संगीत, नृत्य, सिनेमा को फासीवाद, सांप्रदायिकता, गरीबी के खिलाफ प्रतिरोध में बदल दिया। इप्टा का ध्येय वाक्य है, "इप्टा की नायक जनता है"।
आठ दशक से अधिक समय तक सक्रिय संगठन इप्टा देश का महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आंदोलन बन चुका है। संगठन ने प्रमाणित किया है कि कला केवल मनोरंजन नहीं, अपितु सामाजिक परिवर्तन की प्रेरणा भी बनती है।
वर्षों तक इप्टा मुंबई में नाट्य महोत्सव आयोजित करती रही है, लेकिन अनेक कारणों से यह सिलसिला जारी नहीं रह सका। 24 वर्ष पश्चात इप्टा ने 20 से 27 मई तक कैफ़ी और शौकत आज़मी से प्रेरित होकर तथा इप्टा के पुनर्गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले जितेंद्र रघुवंशी की स्मृति में समारोह आयोजित किया। मुंबई माटुंगा के मैसूर एसोसिएशन ऑडिटोरियम में इप्टा की राष्ट्रीय समिति के नेतृत्व एवं इप्टा मुंबई की मेजबानी में संपन्न समारोह में दिल्ली, महाराष्ट्र के नासिक, मुंबई, पंजाब के कपूरथला, मध्य प्रदेश के इंदौर, उत्तर प्रदेश के लखनऊ, तमिलनाडु, उड़ीसा, बिहार के पटना इकाइयों के कलाकारों ने हिंदी, तमिल, मराठी, उड़िया, पंजाबी में 12 नाट्य प्रस्तुतियां दीं।
आदिवासी, दलित समाज के अलावा विषमता, नारी सम्मान, सामाजिक न्याय, सांप्रदायिकता, पर्यावरण, बाजारवाद जैसे मुद्दों पर कलाकारों ने नाटकों का मंचन किया।
इप्टा जेएनयू के नाटक *गोह* में वंदना टेटे, अनुज लुगुन और जसिंता केरकेट्टा की कविताओं को आधार बनाकर आदिवासियों का जीवन, उनकी संस्कृति, मिथक, उनका रहन-सहन, पर्यावरण बचाने के संघर्ष , इन सबकी राजनीतिक वास्तविकताओं को तलाशने का प्रयास किया गया। इस प्रस्तुति का निर्देशन जेएनयू की पूरी टीम ने किया।
इप्टा तमिलनाडु का नाटक *उर्यनथा थीरप्पु* (उच्चतम निर्णय) एक राजनीतिक नाटक है, जो भव्य विकास परियोजनाओं और सामान्य नागरिकों के अधिकारों के बीच संघर्ष को सामने लाता है। नाटक प्राकृतिक संसाधनों — जल, जंगल और जमीन के बीच सामूहिक संबंधों पर जोर देता है। इस नाटक के निर्देशक आनंद बसु हैं।
इप्टा नासिक का नाटक *उपथ शुम्भ* (पथभ्रष्ट दैत्य) एक व्यंग्यात्मक कॉमेडी ड्रामा है, जो मनोरंजन उद्योग की चमक-दमक के नीचे की असली क्रूरता को उजागर करता है। यह नाटक चार संघर्षरत कलाकारों की कहानी है, जो एक ऐसी दुनिया में अपना रास्ता तलाश रहे हैं, जो सब कुछ मांगती है और बदले में कुछ नहीं देती। नाटक का निर्देशन मुकेश काले ने किया है।
इप्टा पंजाब का नाटक *कूड़े विच खिड़िया गुलाब* (कूड़े में खिला गुलाब) सफाईकर्मी पिता-पुत्र की कहानी है, जिसे वर्ण और वर्गीय नजरिए से बुना गया है। नाटक सुखांत है। यह नाटक उन लोगों को भी जवाब देता है, जो आरक्षण पर सवाल उठाते हैं। निर्देशन इंद्रजीत रूपोवाली ने किया।
इप्टा इंदौर का नाटक *आजादी के तराने* स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान भारत छोड़ो आंदोलन से होते हुए देश की आजादी तक पहुंचता है। चिमूर, बलिया, मिदनापुर में स्थानीय विद्रोह हुए, जिनमें साधारण नागरिक, श्रमिक, किसान, विद्यार्थी, गृहिणियां शामिल थीं। उनके संघर्ष को नाटक में दर्शाया गया है। शोध पर आधारित प्रस्तुति का कालखंड 1942 से 1947 तक का है। नाटक की समाप्ति पर टिप्पणी करते हुए विख्यात फिल्म निर्देशक आनंद पटवर्धन ने कहा कि "नाटक यह भी दिखाता है कि आजादी की लड़ाई में कौन शामिल नहीं था"। इस नाटक का निर्देशन गुलरेज़ और सारिका श्रीवास्तव ने किया।
इप्टा लखनऊ द्वारा प्रस्तुत नाटक *सपना मेरा यही सखी* मध्यकालीन चार कवयित्रियों की विद्रोही भावना को वर्तमान संदर्भों में समझने का प्रयास है। इन स्त्रियों ने अपने अस्तित्व के लिए समाज के रीति-रिवाज, परंपराओं को छोड़कर परिवार और समाज से विद्रोह किया तथा निर्वासन भोगा। ये महिलाएं थीं — मीराबाई, अक्का महादेवी, अंडाल और लल्लन। नाटक यह दिखाता है कि विद्रोही महिलाओं को समाज या तो देवी मानता है अथवा उनकी निंदा करता है। नाटक का निर्देशन वेद राकेश ने किया।
इप्टा मुंबई ने बलराज साहनी की *मेरी फिल्मी आत्मकथा* पर संगीतमय प्रस्तुति दी, जो संस्मरण और गीतों के माध्यम से आगे बढ़ती है। निर्देशन निधि कांत पांडे ने किया।
इप्टा मुंबई की अन्य प्रस्तुति *आनंद ही आनंद* थी। यह चेतन, देव और विजय आनंद के बीच रिश्तों की कहानी है। यह तीनों भाइयों के हिंदी सिनेमा में योगदान और देवानंद के स्टार बनने की प्रक्रिया की पड़ताल करती है। इस प्रस्तुति की निर्माता अनुराधा डार हैं।
इप्टा उड़ीसा का नाटक *एकनुआ सकलारा अपेक्षारे* (एक नई सुबह के इंतजार में) उन दो बेटों के विरोधी विचारों के संघर्ष की कहानी है। एक भ्रष्ट राजनेता है, दूसरा सशस्त्र क्रांति में विश्वास करता है। अंत में पिता के समझाने पर दोनों पुत्र गांधीवादी मूल्यों को अपनाते हैं। निर्देशन श्री विक्रम केसरी जेना ने किया।
इप्टा जोधपुर ने कृष्ण चंदर की कहानी *थाली का बैंगन* प्रस्तुत की, जो जाति और धर्म के नाम पर वसूली करने वाली प्रवृत्ति पर गहरी चोट करती है। यह गरीबों के जीवन के अंधेरे की कथा है। नाटक जीने के लिए शॉर्टकट के उपाय, अज्ञानता और अवसरवादिता पर गहरा व्यंग्य है। नाटक को दर्शक अपने समय से जोड़कर महसूस कर सकते हैं। समझ सकते हैं कि जाति-धर्म के नाम पर किस तरह बंटकर हमने जीवन को नर्क बना दिया है। इस प्रस्तुति के निर्देशक डॉक्टर विकास कपूर हैं।
इप्टा बिहार की प्रस्तुति *कोर्ट मार्शल* बहुचर्चित और सर्वाधिक देखा गया नाटक है। कहानी एक युवा सैनिक की है, जिस पर अपने अधिकारी की हत्या करने और एक अन्य को घायल करने का आरोप है। मुकदमे की अदालती कार्यवाही में इस कथित अपराध के पीछे जो कारण हैं, वे जातिवाद के घिनौने चेहरे को उजागर करते हैं। निर्देशन तनवीर अख्तर ने किया।
इप्टा मुंबई की प्रस्तुति *हम परवाने : द स्टोरी ऑफ अशफ़ाकउल्ला खान वारसी* अशफाक उल्ला और रामप्रसाद बिस्मिल से प्रेरित है। धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादी अशफाक काकोरी ट्रेन का खजाना लूटने वालों में शामिल थे। उन्होंने ब्रिटिश सरकार को चुनौती दी थी। इन्हीं के बलिदान से भगत सिंह और उनके साथियों ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन संगठन का गठन किया था। नाट्य प्रस्तुति का निर्देशन रमेश तलवार ने किया।
उल्लेखनीय है कि 25 मई 1943 को मुंबई के मारवाड़ी विद्यालय में आयोजित इप्टा के सम्मेलन को भेजे अपने संदेश में जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि "भारत में जन नाट्य के विकास की व्यापक संभावनाएं हैं, बशर्ते वह जनता और उसकी परंपराओं पर आधारित हो।"
देश में परमाणु विज्ञान के आधार स्तंभ होमी जहांगीर भाभा ने भारत सरकार द्वारा इप्टा के स्वर्ण जयंती वर्ष के अवसर पर स्मारक डाक टिकट जारी करने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा था कि "इप्टा को मिली सार्वजनिक मान्यता पर सभी को गर्व करने का पूरा अधिकार है।"उल्लेखनीय है कि "इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन" ( इप्टा) का नामकरण स्वयं डॉक्टर भाभा ने ही किया था।
हरनाम सिंह



