IGNTU अमरकंटक में PESA योजना के अंतर्गत कांट्रैक्चुअल भर्ती पर गंभीर सवाल, पारदर्शिता पर उठे प्रश्न
*सूची और सूचनाओं को गोपनीय रखने का आरोप, इंटरव्यू प्रक्रिया पर भी सवाल*
अनूपपुर/भोपाल
पंचायती राज मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा जुलाई 2025 में मध्यप्रदेश सरकार और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय (IGNTU), अमरकंटक के सहयोग से भोपाल में पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) से संबंधित उत्कृष्टता केंद्र (Centre of Excellence) स्थापित करने हेतु समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए थे। इस पहल को जनजातीय क्षेत्रों में स्थानीय स्वशासन को सुदृढ़ करने और PESA अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया गया था।
हालांकि, इस महत्वाकांक्षी योजना के अंतर्गत IGNTU अमरकंटक में की जा रही कांट्रैक्चुअल रिक्रूटमेंट प्रक्रिया को लेकर अब गंभीर सवाल और संदेह सामने आ रहे हैं। विश्वविद्यालय में प्रभारी कुलपति प्रो. सौभाग्य रंजन पाढ़ी सहित प्रो. भूमि नाथ त्रिपाठी, प्रो. गौरीशंकर महापात्रा, तरुण ठाकुर और जयंत बेहरा की भूमिका को लेकर प्रक्रिया की पारदर्शिता, निष्पक्षता और वैधानिकता पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।
*समर्थ पोर्टल को दरकिनार करने पर सवाल*
दिनांक 02 दिसंबर 2025 को विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर PESA योजना के अंतर्गत कांट्रैक्चुअल भर्ती का विज्ञापन प्रकाशित किया गया। हैरानी की बात यह है कि इस भर्ती के लिए विश्वविद्यालय के आधिकारिक समर्थ (Samarth) पोर्टल का उपयोग नहीं किया गया, जबकि IGNTU में अधिकांश भर्तियाँ इसी केंद्रीकृत पोर्टल के माध्यम से की जाती रही हैं। इसके बजाय आवेदन किसी अन्य माध्यम से आमंत्रित किए गए, जिससे प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
*पर्सनल ई-मेल के उपयोग पर संदेह*
भर्ती प्रक्रिया से जुड़ी सूचनाओं और संचार के लिए व्यक्तिगत (Personal) ई-मेल ID जैसे saubhagyaranjan3211@gmail.com के उपयोग की बात सामने आई है। जबकि PESA योजना से जुड़े पदाधिकारियों के विश्वविद्यालय डोमेन वाले आधिकारिक ई-मेल ID (जैसे srpadhi@igntu.ac.in) सार्वजनिक रूप से उपयोग में नहीं लाए गए। किसी केंद्रीय विश्वविद्यालय की भर्ती प्रक्रिया में पर्सनल ई-मेल का प्रयोग UGC/केंद्रीय विश्वविद्यालयों के स्थापित प्रशासनिक मानकों के विपरीत माना जाता है। उल्लेखनीय है कि पूर्व में भी IGNTU में इसी प्रकार पर्सनल ई-मेल के उपयोग के माध्यम से पीएचडी प्रवेश परीक्षाओं में अनियमितताओं के आरोप लग चुके हैं।
*सूची और सूचनाओं को गोपनीय रखने का आरोप*
आवेदन प्रक्रिया पूर्ण होने और स्क्रूटनी के बाद भी Eligible और Non-Eligible उम्मीदवारों की प्रमाणित सूची विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर प्रकाशित नहीं की गई। इतना ही नहीं, Short-listed Candidates को सूचना केवल व्यक्तिगत ई-मेल के माध्यम से दी गई, जबकि न तो वेबसाइट पर और न ही किसी सार्वजनिक माध्यम से कोई सूचना जारी की गई।
इंटरव्यू की तिथि, स्थान और प्रक्रिया से संबंधित विवरण भी सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। बताया जा रहा है कि 24 जनवरी 2026 को इंटरव्यू प्रस्तावित है, लेकिन अब तक इसकी कोई आधिकारिक सार्वजनिक सूचना जारी नहीं की गई है।
*इंटरव्यू प्रक्रिया पर भी सवाल*
सूत्रों के अनुसार प्रो. गौरीशंकर महापात्रा और जयंत बेहरा द्वारा कुछ उम्मीदवारों को व्यक्तिगत रूप से इंटरव्यू के लिए योग्य बताए जाने की जानकारी दी गई। वहीं यह भी आरोप हैं कि प्रो. भूमि नाथ त्रिपाठी और प्रो. महापात्रा मिलकर इंटरव्यू कमेटी का गठन इंटरव्यू की तिथि निर्धारणउम्मीदवारों के चयन जैसे महत्वपूर्ण निर्णय ले रहे हैं, जबकि इन निर्णयों से संबंधित कोई औपचारिक दस्तावेज़ या अधिसूचना सार्वजनिक नहीं की गई है।
*अध्यक्ष पद को लेकर भी असमंजस*
जब विज्ञापन जारी किया गया था, उस समय PESA योजना के अध्यक्ष के रूप में प्रो. भूमि नाथ त्रिपाठी का नाम सामने आता है, जबकि वर्तमान में अध्यक्ष पद को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं की गई है। यह प्रशासनिक अस्पष्टता अपने आप में गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
*कम आवेदन अवधि और मीडिया में विज्ञापन का अभाव*
आमतौर पर किसी भी भर्ती प्रक्रिया में कम से कम 30 दिनों की आवेदन अवधि निर्धारित की जाती है, लेकिन यहां केवल 16 दिनों में आवेदन प्रक्रिया बंद कर दी गई। इसके अतिरिक्त, न तो इस भर्ती का विज्ञापन किसी प्रमुख समाचार पत्र, न्यूज़ चैनल या Employment News में दिया गया, जो कि एक केंद्रीय विश्वविद्यालय की सामान्य और आवश्यक प्रक्रिया मानी जाती है।
*निष्पक्ष जांच की मांग*
इन सभी तथ्यों के आधार पर विश्वविद्यालय में यह धारणा मजबूत हो रही है कि भर्ती प्रक्रिया में गंभीर विसंगतियां और संभावित लूपहोल मौजूद हैं। आरोप यह भी हैं कि कुछ पदाधिकारी अपने करीबी या पसंदीदा उम्मीदवारों को लाभ पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं।
विश्वविद्यालय में पूर्व में भी घूसखोरी, भ्रष्टाचार और आर्थिक अनियमितताओं के आरोप सामने आते रहे हैं। दस्तावेजों के अनुसार प्रो. भूमि नाथ त्रिपाठी पर पहले भी वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े आरोप लग चुके हैं, जिससे यह मामला और गंभीर हो जाता है।
उपरोक्त परिस्थितियां PESA योजना जैसी संवेदनशील और जनजातीय हितों से जुड़ी परियोजना की विश्वसनीयता को आघात पहुंचाती हैं। विशेषज्ञों और विश्वविद्यालय समुदाय की ओर से मांग उठ रही है कि इस पूरी भर्ती प्रक्रिया की स्वतंत्र, निष्पक्ष और उच्चस्तरीय केंद्रीय जांच कराई जाए। साथ ही जांच अवधि के दौरान संबंधित पदाधिकारियों को शैक्षणिक एवं प्रशासनिक दायित्वों से पृथक रखा जाए तथा सभी दस्तावेज़, निर्णय और चयन प्रक्रियाएं सार्वजनिक की जाएं, ताकि पारदर्शिता और कानून के शासन में विश्वास बहाल हो सके।
