सहायक आयुक्त आदिवासी द्वारा अनुकम्पा नियुक्ति न देने पर हाई कोर्ट ने जारी की अवमानना नोटिस जारी
अनूपपुर
जिले की सहायक आयुक्त आदिवासी विकास सरिता नायक को अनुकम्पा नियुक्ति नहीं दिए जाने पर उच्च न्यायालय जबलपुर ने अवमानना नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जबाब मांगा हैं।
उच्च न्यायालय जबलपुर के अधिवक्ता दीपक पांडेय ने बताया कि जिले के जनपद पंचायत जैतहरी के प्राथमिक विद्यालय लेबर कॉलोनी बरगवां में श्रवण कुमार सिंह सहायक अध्यापक के रूप में पदस्थ थे, सेवावधि के पूर्व 28 अक्टूबर 2017 को निधन हो गया, जिस पर पुत्र सुल्तान सिंह ने शासन के नियमानुसार जारी निर्देशों के अंतर्गत स्व. पिता के स्थान पर नौकरी दिए जाने का आवेदन दिया था, विभाग द्वारा अनुकंपा नहीं दिए जाने पर सुल्तान सिंह द्वारा उच्च न्यायालय जबलपुर में रिट याचिका प्रस्तुत की गई। आवेदन का निराकरण करते हुए उच्च न्यायालय ने सहायक आयुक्त आदिवासी विकास अनूपपुर को निर्देश दिए कि आवेदक द्वारा दिए गए आवेदन पर तीन माह के अंदर नियमानुसार कार्यवाही करें, आवेदक ने उच्च न्यायालय जबलपुर के आदेश की प्रति सहित पुनः अपना आवेदन सहायक आयुक्त आदिवासी विकास कार्यालय में प्रस्तुत किया, परन्तु इसके बाद भी कोई कार्यवाही नहीं होने पर विवश होकर प्रार्थी ने विभाग प्रमुख सहायक आयुक्त आदिवासी विकास सरिता नायक के विरुद्ध अवमानना याचिका प्रस्तुत किया। उच्च न्यायालय जबलपुर ने मंगलवार को सुनवाई करते हुए विभाग प्रमुख सहायक आयुक्त आदिवासी विकास सरिता नायक को चार सप्ताह के अंदर (27 फरवरी) इस प्रकरण का जबबा प्रस्तुत करने के निर्देश दियें हैं।
ज्ञात हो कि जिले के सोन मौहरी निवासी आश्रित परिवार लगातार नौ वर्षों से अनुकंपा नियुक्ति के लिए भटक रहा है पर सरकार द्वारा जारी नियमों के क्रियान्वयन में अधिकारियों की जिद भारी पड़ रही है, जिले में अनुकम्पा नियुक्ति के कई प्रकरण उच्च न्यायालय और सरकारी कार्यालय में लंबित पड़े हुए हैं, परिवार के मुखिया सरकारी कर्मचारी जिसकी आय पर पूरे परिवार के भरण पोषण का दायित्व था, उसकी अकाल मृत्यु के बाद परिवार को विभाग द्वारा किस प्रकार प्रताड़ित किया जाता है। इसका उदाहरण है स्व. श्रवण सिंह के प्रकरण, जन सुनवाई, सीएम हेल्पलाइन केवल औचारिकता बन कर रह गई है, वास्तव में आम जनता को उसकी समस्या का हल तभी नसीब होगा जब वह वर्तमान व्यवस्था के अनुरूप मार्ग पर चलकर अपना काम करवा ले, सुल्तान सिंह धुर्वे के नौ वर्षों तक के संघर्ष को अगर देखें तो शासन के नियमों का कोई औचित्य नहीं रह जाता।
