बंटाढ़ार के वचन ,पतन का जतन मोदी का परिवार फिर चुका विपक्षी हथियार- इंजी. अनुराग पाण्डेय

बंटाढ़ार के वचन ,पतन का जतन मोदी का परिवार फिर चुका विपक्षी हथियार- इंजी. अनुराग पाण्डेय


अनूपपुर

संसदीय चुनाव की रणभेरी बज चुकी है. सभी प्रमुख दल अपने-अपने तरकश से तीर छोड़ रहे हैं. एनडीए और इंडी गठबंधन अपने-अपने मोर्चे साध रहे हैं. पटना में विपक्षी गठबंधन की पहली रैली ही विनाशकारी साबित हुई है. चुनाव अभियान के पहले ही विपक्ष ने खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है. प्रधानमंत्री मोदी पर निजी हमला करके एनडीए को ऐसा हथियार दे दिया है कि विपक्ष उससे स्वयं लहूलुहान दिखाई पड़ेगा।

पटना से पतन की शुरुआत लालू यादव ने की है. लालू यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर परिवार को लेकर निजी हमला किया. उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि मोदी हिंदू नहीं हैं. मोदी ने अपने मां के निधन के अवसर पर सिर के बाल नहीं मुड़ाये, इसलिए वे हिंदू नहीं हैं. गुजरात में मृत्यु के अवसर पर सिर मुड़ाने का संस्कार नहीं है. विपक्ष जहां अपने पैरों पर मारने के लिए कुल्हाड़ी हाथ में लेकर चल रहा है वहीं मोदी और एनडीए विपक्ष के हथियार से ही अपनी सुनिश्चित दिख रही जीत को नई धार देने में जुटा हुआ है।

‘मोदी का परिवार’ नारा देश का नारा बनता जा रहा है. बीजेपी के तो सभी बड़े छोटे नेता और कार्यकर्ता सोशल मीडिया पर ‘मोदी का परिवार’ अभियान शुरू कर चुके हैं. सभाओं में प्रधानमंत्री स्वयं उनकी निजी आलोचना को जन भावनाओं से जोड़कर देश को ही अपना परिवार बता रहे हैं. ऐसा लगता है कि मोदी ने यह आकलन बहुत पहले कर लिया था कि परिवारवादी राजनीति पर उनके हमले से विचलित होकर विपक्ष निश्चित रूप से उनके परिवार पर निजी हमला जरूर करेगा. इसीलिए लाल किले से अपने भाषण में ही प्रधानमंत्री ने भाईयों  और बहनों के संबोधन को बदलकर ‘मेरे परिवार जनों’ कर दिया था।

‘मोदी का परिवार’ केम्पेन देश का अभियान इसीलिए बनने में सफल हुआ है क्योंकि इसकी भूमिका बहुत पहले से बीजेपी ने तैयार कर ली थी. जब-जब विपक्ष ने मोदी पर निजी हमला किया तब-तब विपक्ष को जनता ने करारा जवाब दिया है. गुजरात के चुनाव में सोनिया गांधी ने मोदी को ‘मौत का सौदागर’ कहा था. उसके बाद तो ऐसा माहौल बना था कि कांग्रेस चुनाव में चारों खाने चित हो गई थी. राहुल गांधी द्वारा ‘चौकीदार चोर है’ के नारे पर भी बीजेपी के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने ‘मैं भी चौकीदार’ केम्पेन चलाकर राहुल गांधी को सर्वोच्च न्यायालय में माफी मांगने के लिए मजबूर किया था।

विपक्षी नेताओं का प्रधानमंत्री से विरोध होना स्वाभाविक है लेकिन निजी स्तर पर उनके खिलाफ अप्रिय और अभद्र टिप्पणी भारतीय जनमानस ने न स्वीकार की है ना आगे स्वीकार करेगा. लोकसभा के चुनाव में पूरे देश में मोदी मैजिक पहले से ही चल रहा है. चुनावी मुद्दा केवल नरेंद्र मोदी को फिर से प्रधानमंत्री बनाना है. विपक्ष को थोड़ा बहुत जो समर्थन मिलने की उम्मीद थी उसे भी वह अपने हाथों से बर्बाद कर रहा है।

विधानसभा चुनाव के पहले तमिलनाडु में विपक्षी गठबंधन के सहयोगी DMK द्वारा जिस तरह से सनातन के विरुद्ध जहर उगला गया था, उसका परिणाम राज्यों के चुनाव में विपक्षी दलों ने  भोगा था. DMK सासंद ए राजा ने फिर भारत को एक देश के रूप मानने से इनकार करते हुए रामायण और प्रभु राम को लेकर अप्रिय टिप्पणी की है. अब तो ऐसा लगने लगा है कि विपक्ष अपने राजनीतिक लाभ के लिए काम कर रहा है या मोदी को राजनीतिक लाभ पहुंचाने के लिए काम कर रहा है? नीतीश कुमार के कंधे पर सवार विपक्षी गठबंधन का उत्साह तो पहले ही ठंडा हो गया है जब सूत्रधार ने ही पाला बदल लिया था।

देश में एक अजीब स्थिति है कि बीजेपी के अलावा ऐसा कोई भी राजनीतिक दल नहीं है जो परिवारवादी राजनीति से ग्रसित ना हो. परिवारवादी राजनीति को लेकर अलग-अलग तर्क और विचार हो सकते हैं लेकिन कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों की राजनीति पूरी तौर से परिवार की राजनीति है. बिहार में जनता दल में लालू परिवार, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी में अखिलेश यादव परिवार,बंगाल में ममता बनर्जी का परिवार, झारखंड में शिबू सोरेन का परिवार, तमिलनाडु में करुणानिधि का परिवार, तेलंगाना में चंद्रशेखर का परिवार. कमोबेश क्षेत्रीय दलों में सभी राज्यों में ऐसे ही परिवार वाली राजनीति का बोलबाला है।

यह भी एक संयोग है कि सभी राजनीतिक दल नियंत्रित करने वाले परिवारों पर या तो भ्रष्टाचार के मुकदमे चल रहे हैं या जांच एजेंसियां जांच कर रही हैं. इन परिवारों के नेता या तो जेल में हैं या बेल पर हैं. राजनीति में भ्रष्टाचार विपक्षी राजनीति की गठबंधन का आधार बना हुआ है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर तमाम विरोध-अंतरविरोध हो सकते हैं लेकिन उन पर भ्रष्टाचार के कोई आरोप नहीं हैं. इसके साथ ही हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और विकास के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और गरीब कल्याण की योजनाओं से पूरा देश जुड़ा हुआ है. मोदी के कारण ही जातियों की राजनीति सफल नहीं हो पा रही है. विकास की राजनीति, जातियों की राजनीति पर हावी होती हुई आगे बढ़ रही है. हिंदुत्व की राजनीति विपक्षियों के गले की हड्डी बनी हुई है।

अयोध्या में राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के समय विपक्षी गठबंधन के नेताओं ने समारोह में जाने से इनकार करके भारतीय जन भावनाओं को पहले ही आहत किया है. राम मंदिर का निर्माण सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद हो रहा था. यह किसी राजनीतिक दल का विषय नहीं था. इसमें सभी राजनीतिक दलों को भागीदारी करना था लेकिन विपक्षी गठबंधन वह अवसर भी चूक गया है. नरेंद्र मोदी के मैजिक में राम मंदिर का मैजिक भी जुड़ गया है. यह दोनों मैजिक लोकसभा चुनाव में बड़ा चमत्कार कर सकते हैं।

नरेंद्र मोदी के तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने में विपक्षी गठबंधन को संशय भले हो लेकिन भारत को कोई संशय नहीं है. चुनाव परिणाम के पहले ही भारत का जनादेश दीवार पर लिखी हुई इबारत जैसा साफ-साफ दिखाई पड़ रहा है. विपक्षी गठबंधन में ना जीतने का नैतिक बल दिखाई पड़ रहा है और ना ही मुद्दों की समझ दिखाई पड़ रही है. मोदी पर निजी हमले विपक्षी गठबंधन को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं।

जैसे राम और कृष्ण के विरुद्ध भारत एक भी शब्द नहीं सुनना चाहता वैसे ही मोदी के विरुद्ध विपक्ष के निजी हमले भी देश नहीं सुनना चाहता. विपक्ष मुद्दों पर बात कर सकता है लेकिन शायद विपक्ष मुद्दों से भटक गया है. मानव स्वयं अपना मित्र भी हो सकता है और शत्रु भी हो सकता है. लक्ष्य से लटका हुआ मनुष्य स्वयं अपना नाश करता है. पतन के लिए बस वह स्वयं जिम्मेदार होता है. भारत के विपक्षी मानव शायद अपनी पतन की स्क्रिप्ट लिखने में ही लगे हुए हैं।

भारत में राजनीति की दिशा बदल चुकी है. विपक्षी गठबंधन के नेताओं को यह बात शायद समझ नहीं आ रही है. राजनीति केवल विषय भोगों के लिए ही अब नहीं रही है. गठबंधन में शामिल अनेक दल और नेता वर्षों तक सत्ता सुख का भोग कर चुके हैं. भारत के अमृतकाल में राजनीति से सेवा के महान दायित्व पूरा करने में विष घोलकर विपक्षी गठबंधन अपने लिए अब सुख की कल्पना नहीं कर सकता।

भारतीय लोकतंत्र बहुत आगे बढ़ चुका है. हर नेता के व्यक्तित्व और कृतित्व पर पब्लिक की बारीक नजर है. अवेयरनेस नए दौर में पहुंच चुकी है. मोदी को मोदी, देश ने और जनता ने बनाया है. यह बात जितनी जल्दी विपक्षी गठबंधन समझ ले और साफ सुथरी राजनीति में जनसेवा के वायदे के साथ जनता का विश्वास हासिल करने का ईमानदार प्रयास करे तो ही उनका राजनीतिक भविष्य बच सकता है. भारत ने तो अपना भविष्य तय कर लिया है।

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