पीड़ित ने जिंदा होने के लिए सीईओ से लगाई गुहार, सचिव ने ग्रामीण को किया मृत घोषित, कागजो में किया खेल
उमरिया
जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने प्रशासनिक संवेदनशीलता और नियमों की धज्जियां उड़ा दी हैं। एक पंचायत सचिव ने अपनी पदस्थापना के साथ ही ऐसा तांडव मचाया कि जीवित ग्रामीण खुद को जिंदा साबित करने के लिए अधिकारियों के चक्कर काट रहा हैं।
जनपद पंचायत करकेली के ग्राम पंचायत बड़ागांव का है। यहां पदस्थ सचिव रामू सोनी को 24 दिसंबर 2024 को लोकायुक्त की टीम ने 5 हजार रुपए की रिश्वत लेते रंगे हाथों ट्रैप किया था। हैरानी की बात यह है कि जिस सचिव को जेल की सलाखों के पीछे या कम से कम निलंबित होना चाहिए था, उसे जिला पंचायत सीईओ की 'विशेष कृपा' से दोबारा वित्तीय प्रभार के साथ बड़ागांव में पदस्थ कर दिया गया।
लोगों का आरोप है की सचिव रामू सोनी ने कार्यभार संभालते ही अपनी मनमानी शुरू कर दी। गांव के करीब 10 गरीब परिवारों को बीपीएल सूची से यह कहकर बाहर कर दिया कि, उनके घर में सरकारी नौकरी है, जबकि सच्चाई यह है कि वे परिवार मजदूरी कर अपना पेट पालते हैं। हद तो तब हो गई जब आदिवासी समुदाय के जुगराज सिंह गोंड़ और सामान्य वर्ग के अनिल कुमार को कागजों में 'मृत' घोषित कर दिया गया।
पीड़ित अनिल कुमार और जुगराज सिंह ने जिला पंचायत सीईओ के सामने पेश होकर गुहार लगाई कि, साहब! हम जिंदा हैं, आपके सामने खड़े हैं, हमें कागजों में तो जीवित मान लो।सचिव ने मुझे मृत घोषित कर दिया है, ताकि मुझे कोई भी सरकारी सुविधा न मिल सके। मैं गौंड आदिवासी समाज का हूं, इसलिए मेरा नाम काट दिया गया है, सचिव से बात करो तो धमकाता है। वही लोकायुक्त मामले में फंसे कर्मचारी को वित्तीय प्रभार देना पंचायत राज अधिनियम के विरुद्ध है।
