विज्ञान के नाम पर तमाशा, मोबाइल साइंस प्रदर्शनी बनी आदिवासी बच्चों के लिए खुला छलावा
*मॉडल बंद, अधिकारी गायब, कैमरा देखते ही भागे कर्मी, लाखों खर्च पर उठे सवाल*
अनूपपुर
विज्ञान को बच्चों तक पहुँचाने के सरकारी दावों की पोल बदरा स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय विद्या निकेतन में आयोजित मोबाइल विज्ञान प्रदर्शनी ने खोलकर रख दी दो दिनों तक चली यह प्रदर्शनी विज्ञान शिक्षा का माध्यम बनने के बजाय पूरी तरह से खानापूर्ति और दिखावे का उदाहरण साबित हुई।
प्रदर्शनी के पहले दिन स्थल पर केवल 15–20 बच्चे ही मौजूद थे न तो किसी तरह की वैज्ञानिक जिज्ञासा दिखाई दी और न ही सीखने जैसा वातावरण बना प्रदर्शनी में तैनात कर्मी रोहित पाटिल द्वारा बच्चों को रटा-रटाया पाठ पढ़ाया गया किसी भी मॉडल को प्रयोगात्मक रूप से चलाकर नहीं दिखाया गया, न प्रश्न-उत्तर सत्र हुआ और न ही संवादात्मक गतिविधियाँ कराई गईं।
“ऊर्जा के रूप”, “विद्युत ऊर्जा”, “ध्वनि को देखें”, “एसी-डीसी करंट” और “ऊर्जा स्थानांतरण एवं संरक्षण” जैसे महत्वपूर्ण विषयों के मॉडल लगाए तो गए, लेकिन अधिकांश मॉडल या तो बंद पड़े थे या सिर्फ देखने की वस्तु बनकर रह गए पुराने और जर्जर उपकरण बच्चों में वैज्ञानिक सोच पैदा करने में पूरी तरह नाकाम रहे। दूसरे दिन जब पूछा गया कि उन्होंने क्या सीखा, तो कोई भी बच्चा कुछ बताने की स्थिति में नहीं था कई बच्चों ने साफ कहा कि उन्हें कुछ भी समझ नहीं आया, कैमरा देखते ही रोहित पाटिल बयान देने से बचते नजर आए और यह कहते हुए वहां से हट गए कि “ऊपर से बोलने का आदेश नहीं है।
विद्यालय के प्राचार्य संजू तिवारी से जब सवाल किया गया, तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि “यह आयोजन हमारे विभाग से संबंधित नहीं है, इस पर हम क्या कह सकते हैं हमारे यहां तो खुद जिला स्तरीय परीक्षा चल रही है हम उसमें व्यस्त हैं।
रोहित पाटिल ने दावा किया कि सभी इंस्ट्रूमेंट चालू हालत में हैं, लेकिन उसी समय वहां मौजूद एक छात्र ने साफ कहा—“सर, इंस्ट्रूमेंट बंद हैं” जब उन्हें चालू करने का प्रयास किया गया, तो उपकरण चला ही नहीं। इस प्रदर्शनी का आयोजन जनजाति कार्य विभाग द्वारा किया जाना बताया गया, लेकिन दो दिनों तक चले कार्यक्रम में विभाग का कोई भी अधिकारी या कर्मचारी मौके पर मौजूद नहीं था न निरीक्षण हुआ, न मार्गदर्शन, यह प्रदर्शनी भी कागजी औपचारिकता बनकर रह गई। सरकार विज्ञान शिक्षा के नाम पर लाखों रुपये खर्च कर रही है, ताकि आदिवासी और ग्रामीण बच्चों को वैज्ञानिक ज्ञान मिल सके।
