बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में बाघ की हुई मौत, किया गया शव दाह, विभाग की जांच जारी


उमरिया

जिले के विश्वप्रसिद्ध बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व में फिर बाघ की मौत हुई हैँ। वर्ष 2026 बांधवगढ़ में बाघो के लिए अनुकूल नहीं साबित नहीं हो रहा है। बांधवगढ टाइगर रिजर्व के परिक्षेत्र पनपथा कोर की बीट बघडो में एक बाघ शावक के मृत होने की सूचना प्राप्त हुई। सूचना होने पर तत्काल एनटीसीए प्रोटोकॉल के अनुसार मौके पर वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति में डाग स्क्वाड बुलाकर क्षेत्र की सघन सचिग करायी जाकर मेटल डिटेक्टर से जांच करायी गई। उसके उपरांत निर्धारित एसओपी का पालन करते हुए वन्यप्राणी स्वास्थ्य अधिकारी, बांधवगढ टाइगर रिजर्व एवं खंड पशु चिकित्सा अधिकारी, मानपुर की टीम द्वारा शव परीक्षण किया गया। शव परीक्षण उपरांत विभागीय सक्षम अधिकारियों प्रभारी क्षेत्र संचालक एवं उपसंचालक बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व उमरिया , राजस्व अधिकारी, एनटीसीए प्रतिनिधि एवं जनप्रतिनिधि की उपस्थिति में शवदाह किया गया। शव परीक्षण में प्रथम दृष्टया मृत्यु का कारण आपसी संघर्ष में मृत्यु होना पाया गया है। क्षेत्र में विभागीय कैंप हाथियों की सहायता से सर्च कराया जा रहा है तथा विवेचना जारी है।

बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व सहित उमारिया जिले के सामान्य वन मण्डल में अब तक सात बाघ मारे जा चुके हैँ, जिनमे चार की मौत टाइगर रिज़र्व क्षेत्र सीमा पर एवं तीन सामान्य वन मण्डल की सीमा पर मारे गए है।

जंगल के खेत मे महिला का मिला संदिग्ध हालत में शव, घटना स्थल में मिला मोबाइल, पुलिस जांच में जुटी


शहडोल

धनपुरी थाना क्षेत्र के सोनहा जंगल में स्थित एक खेत की झोपड़ी के पास 40 वर्षीय महिला का संदिग्ध हालत में शव मिलने से इलाके में हड़कंप मच गया। सुबह मवेशी चराने गए ग्रामीणों ने शव देखा और उन्होंने तत्काल पुलिस को सूचना दी। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और जांच शुरू की।

पुलिस के अनुसार शव के पास एक मोबाइल फोन मिला, जिसके आधार पर मृतका की पहचान फूल मति के रूप में की गई, जो अनूपपुर जिले के भालूमाड़ा क्षेत्र की निवासी बताई जा रही है। प्रारंभिक जानकारी में सामने आया है कि जहां शव मिला है, वह खेत जंगल के बीच स्थित है और वहां आमतौर पर कोई निवास नहीं करता।

ग्रामीणों ने बताया कि महिला का शव झोपड़ी के पास पड़ा था और उसके शरीर से खून निकल रहा था, जिससे मामला संदिग्ध प्रतीत हो रहा है। घटना की सूचना के बाद पुलिस ने शव को अपने कब्जे में लेकर पंचनामा कार्रवाई की और पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।

मर्ग कायम कर पुलिस हर पहलू से जांच की जा रही है। पुलिस यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि महिला वहां कैसे पहुंची और उसकी मौत किन परिस्थितियों में हुई। प्रथम दृष्टया मामला संदिग्ध लग रहा है, इसलिए आसपास के लोगों से पूछताछ की जा रही है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही मौत के वास्तविक कारणों का खुलासा हो सकेगा। फिलहाल पुलिस सभी संभावित पहलुओं को ध्यान में रखते हुए जांच में जुटी हुई है।

​भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा वाटरशेड मिशन, रात के अंधेरे में अवैध ब्लास्टिंग से थर्राया गांव, घरों में आई दरारें

*देवरा का स्टॉप डैम बना ग्रामीणों के लिए 'काल'*


​अनूपपुर

पुष्पराजगढ़ जनपद पंचायत के अंतर्गत ग्राम देवरा मझगंवा में इन दिनों 'विकास' के नाम पर मौत का खेल खेला जा रहा है। बमणार नदी पर वाटरशेड मिशन के तहत निर्माणाधीन स्टॉप डैम ग्रामीणों के लिए सुविधा के बजाय दहशत का सबब बन चुका है। भ्रष्टाचार और घोर लापरवाही का आलम यह है कि नियमों को ताक पर रखकर घनी आबादी के बीच रात के सन्नाटे में भारी ब्लास्टिंग की जा रही है, जिससे कभी भी बड़ी जनहानि हो सकती है। निर्माण कार्य में लागत कम करने और समय सीमा की आड़ में सुरक्षा मानकों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि रात के अंधेरे में भारी मात्रा में बारूद का इस्तेमाल किया जा रहा है। धमाकों के कारण पत्थर के बड़े टुकड़े उड़कर सीधे लोगों के घरों की छतों पर गिर रहे हैं।

कई ग्रामीणों के पक्के मकानों की दीवारों में गहरी दरारें आ गई हैं, जिससे घर कभी भी जमींदोज हो सकते हैं। धमाकों की गूंज और जान जाने के डर से ग्रामीण रात भर जागकर अपने मासूम बच्चों की सुरक्षा कर रहे हैं। ब्रेकर' का बहाना, 'बम' का निशाना।

​विभागीय इंजीनियर सुशील मिश्रा की कार्यप्रणाली इस पूरे मामले में संदिग्ध नजर आ रही है। ग्रामीणों की शिकायतों पर मरहम लगाने के बजाय इंजीनियर साहब बेतुके तर्क दे रहे हैं। यदि निर्माण कार्य में नियमानुसार 'ब्रेकर' मशीन का उपयोग हो रहा है, तो पत्थर उड़कर छतों तक कैसे पहुँच रहे हैं? मौके पर बिखरा मलबा और क्षतिग्रस्त दीवारें चीख-चीख कर ब्लास्टिंग की गवाही दे रही हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी मौन साधे हुए हैं।

​आबादी क्षेत्र में ब्लास्टिंग के लिए विस्फोटक अधिनियम के तहत जिला प्रशासन से अनुमति ली गई। कार्यस्थल पर अनिवार्य 'वर्क बोर्ड' (सूचना पटल) क्यों नहीं लगाया गया? लागत और ठेकेदार की जानकारी क्यों छिपाई जा रही है। जिम्मेदार अधिकारी आखिर ग्रामीणों की गुहार सुनने और फोन उठाने से क्यों कतरा रहे हैं। जनहित का दावा करने वाले सरपंच और अन्य जनप्रतिनिधियों ने पीड़ितों के नुकसान पर आँखें क्यों मूंद ली हैं।

​यदि कार्य पारदर्शी है, तो ब्रेकर की लॉग-बुक और बिलों का भौतिक सत्यापन कराने से प्रशासन क्यों डर रहा है। आक्रोशित ग्रामीणों ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। उन्होंने जिला प्रशासन को चेतावनी देते हुए निम्नलिखित मांगें रखी हैं की निर्माण कार्य की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच की जाए। पीड़ित परिवारों को उनके मकानों में हुए नुकसान का तत्काल मुआवजा मिले। दोषी इंजीनियर और ठेकेदार के विरुद्ध आपराधिक प्रकरण दर्ज हो।

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