खैरात बांटने से अच्छा है, लोगों को आत्म निर्भर बनाना, सुप्रीम कोर्ट की चिंता पर, क्या सरकारें करेंगी चिंतन?-मनोज द्विवेदी

खैरात बांटने से अच्छा है, लोगों को आत्म निर्भर बनाना, सुप्रीम कोर्ट की चिंता पर, क्या सरकारें करेंगी चिंतन?-मनोज द्विवेदी

*मुफ्त वितरण के लोक लुभावन चुनावी घोषणाओ से दूरी बनाने का वक्त*


अनूपपुर 

अब समय आ गया है कि जब सभी राजनैतिक दलों मे गैर - वाजिब मुफ्त वितरण योजना को प्रभावी तरीके से बन्द करके नैतिकता का परिचय देना होगा। जनता को अकर्मण्य बनाने से अच्छा है कि उन्हे आत्मनिर्भर और कर्तव्यनिष्ठ बनाया जाए। वास्तविक गरीब वर्ग को भी जीवन यापन की सुविधाएँ देने के साथ यह ध्यान रखना होगा कि कम से कम 8 - 10 घंटे वो कार्य करें।

सारे अधिकार जनता के लिये हैं । इसकी रक्षा के लिये देश मे मजबूत सिस्टम कार्य कर रहा है। इसे और निरापद बनाना हो तो जरुर बनाएं। लेकिन मजबूत ,सक्षम भारत के निर्माण के लिये प्रत्येक नागरिक को कार्य करने की बाध्यता होनी चाहिए। जैसे मनरेगा लागू होने के बाद अचानक खेती के लिये मजदूरों का संकट आ गया। जिन राज्यों में 1रु - 2 रु में राशन देने की योजना लागू की गयी ,उन राज्यों मे लोगों ने कार्य करना ही बंद कर दिया...ऐसी शिकायतें आने लगीं। ऐसे मे सुप्रीम कोर्ट ने जन भावनाओं को ध्यान मे रख कर और जमीनी सूचनाओं के आधार पर एक कडवी सच्चाई को सामने रखा है।

केन्द्र मे नरेन्द्र मोदी की विचारधारा और नीति युक्त मजबूत सरकार है। उससे देश यह उम्मीद कर रहा है कि "तुम मुझे वोट दो -- मैं तुम्हे मुफ्त दूंगा" की अनैतिक नीति पर रोक लगाने की दिशा मे ठोस कार्य करें।गरीबी के लिये अशिक्षा, जानकारी का आभाव , अवसरों की कमी के साथ आलस्य और निकम्मापन भी बडा कारण है।

लोग मुफ्त मे मिले राशन और सुविधाओं को बेंच कर शराब पीना पसंद करते हैं, घरों में ,चौराहों मे समय बिताते रहते हैं। लेकिन बुलाने पर भी काम पर नहीं जाते। तो जिन्हे सच में मदद की दरकार है, जो वास्तविक गरीब हैं ,सरकार को उनकी सतत मदद करना चाहिये। लेकिन चुनावी लाभ के लिये जनता के टैक्स का पैसा लोगो को खैरात मे नहीं बांटना चाहिये। इससे मेहमती, ईमानदार, नियम कायदों को मानने वालों मे हताशा और कुंठा आती है। इसे रोकने का यही तरीका है कि लोगों को आत्मनिर्भर बनाएं, रोजगार के अवसर पैदा करें ना कि खैरातीलाल बना कर देश को कमजोर करने का काम हो।

केन्द्र सरकार और राज्यों मे काबिज अलग - अलग दलों की सरकारों को देश हित को सर्वोपरि रखते हुए मुफ्त वितरण के लोक लुभावन चुनावी घोषणाओ से दूरी बनाने का वक्त आ गया है। सरकारें यदि इसे रोकने मे असहाय दिखे तो सुप्रीम कोर्ट और निर्वाचन आयोग को इस दिशा मे ठोस कदम उठाना होगा।

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