भारतीय भाषा दिवस पर तुलनात्मक भाषा व संस्कृति अध्ययन शाला में भाषाई उत्सव का किया गया आयोजन
इंदौर
भारतीय भाषा दिवस देवी अहिल्या बाई विश्वविद्यालय इंदौर के तुलनात्मक भाषा एवं संस्कृति अध्ययन शाला में भारतीय भाषा दिवस पर भाषाई उत्सव का आयोजन किया गया।
11 दिसंबर को भारत के शिक्षा मंत्रालय द्वारा भारतीय भाषा उत्सव को प्रत्येक भाषा संस्थानों में प्रतिवर्ष मनाया जाना तय हुआ । केवल शिक्षा संस्थान ही नहीं अपितु यह हम सब भारतीय नागरिकों का नैतिक कर्तव्य भी है कि हम सब अपनी मातृभाषा का एंंव भारतीय सभी भाषाओं का सम्मान करें। हमारे संविधान में भी 22 भाषाओं को स्वीकृति प्रदान की गई है । इनके अतिरिक्त भी अन्य भाषाएं, बोलियां एंंव उपबोलियां है। जिनमें प्रेम और आकर्षण है। जो मानव को मानव से जोड़ती है।
आज 11दिसंबर को भाषा 'सद्भाव'दिवस को भारतीय भाषा दिवस के रूप में मनाया गया। शीतल राघव द्वारा कार्यक्रम का सफल संचालन किया गया। डॉ. ज्ञान प्रकाश श्रीवास्तव जी द्वारा इस उत्सव का प्रारंभ एक महत्वपूर्ण उद्बोधन के साथ हुआ कि किस प्रकार सुब्रमण्यम भार्दयार चिन्नास्वामी के जन्मदिवस को अर्थात 11 दिसंबर 1882 को भाषा दिवस के रूप में मनाया जाना तय हुआ । इसके अतिरिक्त सभी शिक्षकों को एंंव विद्यार्थियों को कार्यक्रम की अग्रीम शुभकामनाएं दी।
इसके उपरांत डाॅ पुष्पेंद्र दुबे जी ने एक व्याख्यान दिया जिसमें भारतीय सभी भाषाओं के सम्मान की बात कही तथा कम से कम एक अन्य भाषा तथा बोलियों की सीखने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने बताया कि सुब्रमण्यम चिन्नास्वामी तमिल के एक विख्यात कवि एवं भारतीय आन्दोलन में भाग लेनेवाले एक श्रेष्ठ कवि व कार्यकर्ता थे। सुब्रमण्यम जी ने भाषा के परिप्रेक्ष्य में उद्घाटित किया कि था कि किस प्रकार भाषा द्वारा एक देश बन भी सकता है एंंव बिगड़ भी सकता है । डाॅ पुष्पेंद्र दुबे जी का कहना है कि हमें स्वयं अन्य भाषाओं का परिचय प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए। अन्य भाषाओं कै सुनकर आंनद का अनुभव किया जाना चाहिए न कि परेशानी का अनुभव किया जाना चाहिए। क्योंकि प्रत्येक मनुष्य एक दुसरे की भाषा को भले ही न समझे परंतु हम एक दूसरे की भावनाओं को अवश्य समझते हैं। इसलिए प्रत्येक भाषा का सम्मान करें।
सर का यह भी मानना है कि भारत सरकार द्वारा कुछ भाषा संबंधी कदम भी उठाए जाने आवाश्यक है जैसे 6 महीने से लेकर एक साल की अवधि के भाषा अध्ययन संबंधी निशुल्क पाठ्यक्रम चलाए जाने चाहिए। जिसके द्वारा भारत की सांस्कृतिक और भाषाई विरासत का विस्तार हो सके और गौरव पूर्ण भाषाओं का संप्रेषण किया जा सके ।
डाॅ गुहा द्वारा भाषा के माध्यम से किस प्राय आपसी सद्भावना और सौहार्द का विस्तार हो सके बताया खूब। इस सुअवसर पर सर ने "फैज अहमद फ़ैज़" के शायराना के अंदाज से अवगत कराया कि किस प्रकार वह अपनी रचनाओं में रूमानियत के साथ साथ जीवन के कठोर तत्वों का समावेश किया करते थे।
हिन्दी कवि एवं लेखक जैसे - कबीर, राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद किस प्रकार जन जन के कवि बन गए। कबीर हर घर की वाणी है क्योंकि वह सब को एक साथ आगे रखकर बढ़ने के पक्षपाती थे।
बाबा भीमराव अम्बेडकर ने सभी भाषाओं का सम्मान करते हुए भारतीय संविधान की रूपरेखा को तैयार करते हुए भाषाओं को स्थान देकर भाषाई स्वतंत्रता प्रदान की । क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति भाषा द्वारा ही सोचता है समझता है एंंव अपनी भावनाओं की सशक्त अभिव्यक्ति करता है क्योंकि भाषा ही एक ऐसा माध्यम है जो मानव को मानव के दिल तक पहुंचाता है।
अंत में डाॅ मुकेश भार्गव जी द्वारा आभार वक्तव्य दिया गया। एंंव विद्यार्थियों को कार्यक्रम के लिए एंंव भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं । उन्होंने अपने वक्तव्य के दौरान अपनी मातृभाषा निमाड़ी के प्रति स्नेह व लगाव को रखते हुए अपने किसान मित्र की जनहित से सम्बन्धित बातों को भी सामने रखा कि किस प्रकार एक किसान मेहनत से कृषि क्षेत्र में काम करता है और सम्पूर्ण विश्व की उदरपूर्ती करता है। सचमुच ही एक कृषक सम्मान का अधिकारी होता है।
कार्यक्रम की समाप्ति की घोषणा संचालिका शीतल राघव द्वारा की गई। इस सुअवसर पर भिन्न भिन्न भाषा भाषी छात्र छात्राओं ने हिंदी, तमिल, मराठी, उर्दू, अंग्रेजी आदी पर अपने विचार रखे एवं गीत व कविताओं के माध्यम से सम्पूर्ण विभाग को बहुत गुंजायमान रखा।
