दबंग पब्लिक प्रवक्ता

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नशे पर वार, सड़क सुरक्षा बरकरार, ड्रिंक एंड ड्राइव में 2 ट्रक व 1 पिकअप जब्त

अनूपपुर

जिले में सड़क सुरक्षा को मजबूत बनाने और नशे के विरुद्ध जनजागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से पुलिस अधीक्षक अनूपपुर विक्रांत मुराब के निर्देशन में संचालित "नशे से दूरी है जरूरी 2.0" अभियान के तहत यातायात पुलिस द्वारा ड्रिंक एंड ड्राइव के विरुद्ध लगातार प्रभावी कार्यवाही की जा रही है।

इसी क्रम में विशेष चेकिंग के दौरान शराब के नशे में वाहन चलाते पाए जाने पर 2 ट्रक एवं 1 पिकअप वाहन को जब्त किया गया। तीनों चालकों के विरुद्ध वैधानिक कार्यवाही करते हुए उन्हें न्यायालय में पेश किया गया।

 नशे की हालत में वाहन चलाना सड़क दुर्घटनाओं का एक प्रमुख कारण है। अभियान का उद्देश्य केवल चालान करना नहीं, बल्कि लोगों में यह जागरूकता पैदा करना है कि नशे की स्थिति में वाहन चलाना स्वयं के साथ-साथ अन्य लोगों के जीवन को भी खतरे में डालता है।

"नशे से दूरी है जरूरी 2.0" अभियान के अंतर्गत जिलेभर में ड्रिंक एंड ड्राइव के विरुद्ध सघन जांच एवं कार्यवाही आगे भी निरंतर जारी रहेगी। आम नागरिकों से अपील की गई है कि यदि शराब का सेवन किया है तो किसी भी परिस्थिति में वाहन न चलाएं तथा सुरक्षित और जिम्मेदार यातायात का परिचय दें।

सशक्त हस्ताक्षर की स्वर्णिम 50 वीं काव्य गोष्ठी में गूॅंजी साहित्य की स्वर धारा 


जबलपुर

सशक्त हस्ताक्षर की50 वीं काव्य गोष्ठी चंचलबाई महाविद्यालय में सानंद सम्पन्न हुई। संस्थापक गणेश श्रीवास्तव प्यासा ने सभी अतिथियों, साहित्य मनीषियों का अपनी ओर से सभी का अभिनंदन किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ अलकेश चतुर्वेदी, अध्यक्षता महामहोपाध्याय आचार्य डॉ. हरिशंकर दुबे, विशिष्ट अतिथि डॉ. सुरेन्द्रलाल साहू निर्विकार, डॉ. अरुणा पान्डे मंगल भाव कवि संगम त्रिपाठी की गरिमामय उपस्थिति रही। अरुण शुक्ल, अमरनाथ सोनी, महेश स्थापक, दिवाकर शर्मा,प्रीति शुक्ला की स्वागत अभिनंदन में सहभागिता रही। सरस्वती वंदना अनुराधा गर्ग दीप्ति ने की।

           गोष्ठी का शुभारंभ कवि कालिदास ताम्रकार काली ने की । सुवीर श्रीवास्तव वीर, शिवानी भगत, इन्द्राना से प्रकाशसिंह ठाकुर, भेड़ाघाट से कुंजीलाल चकवर्ती निर्झर , उर्मिला श्रीवास्तव, विवेक कुमार गुप्ता सहर, आशा मालवीय, अखिलेश खरे अखिल,प्रेम कुमार पालीवाल,दीनदयाल तिवारी बेताल,जय प्रकाश श्रीवास्तव,कौशिक सेन गुप्ता,प्रभा विश्वकर्मा शील,लखन रजक, विजय सिन्हा कमर इलाहावादी, सुशील श्रीवास्तव, मदन श्रीवास्तव,श्रीमती तरुणा श्रीवास्तव, प्रीति नामदेव भूमिजा,विजय विश्वकर्मा,पं निरंजन द्विवेदी वत्स ,डॉ. मुकुल तिवारी, अमर सिंह वर्मा, वंदना सोनी विनम्र, संध्या द्विवेदी,एम. एल. शर्मा नयन,ज्योति  मिश्रा ने एक से बढ़कर एक रचनाओं की प्रस्तुति देकर मंच को चरम पर पहुंचाया । मंचस्थ अतिथियों ने भी रचना पाठ कर मंच को ऊँचाईयाँ दी । संचालन गणेश श्रीवास्तव प्यासा व आभार प्रदर्शन तरुणा खरे तनु ने किया।

नपा उपाध्यक्ष के परिसर से चलाया जा रहा था, 500 करोड़ का महाघोटाला, मोहरे भाग गए, सफेदपोशो को मिला संरक्षण

*​GNS फाइनेंशियल कांड में सुलगते सवाल, आखिर कब तक 'रसूखदारों' की चौखट के बाहर थमी रहेगी जांच की रफ्तार*


​शहडोल

जिले के बुढार-धनपुरी क्षेत्र में जनता के खून-पसीने की कमाई पर जो 'डाका' डाला गया है, उसका पैमाना और भी खौफनाक है। लगभग 500 करोड़ रुपये की इस कथित निवेश ठगी ने हजारों परिवारों को तबाह कर दिया है। बावजूद इसके, व्यवस्था की सुस्ती और जांच की कछुआ चाल चीख-चीखकर सवाल पूछ रही है कि क्या अपराधियों को कानून से ज्यादा किसी के रसूख का 'कवच' मिला हुआ है?

​*1200 शिकार, 500 करोड़ की 'लूट'*

​दर्ज एफआईआर के मुताबिक, GNS फाइनेंशियल कंपनी के शातिर संचालकों—सुखनंदन यादव, सरोज यादव और मुकेश यादव ने 'डबल मुनाफे' का मायाजाल बुनकर करीब 1200 से अधिक सीधे-साधे निवेशकों को अपने जाल में फंसाया। लूट का आंकड़ा शुरुआती शिकायतों में जो आंकड़ा करोड़ों में था, वह अब 250 करोड़ से लेकर 500 करोड़ रुपये के बीच बताया जा रहा है।

​जैसे ही पाप का घड़ा भरा, कंपनी के संचालक जनता की गाढ़ी कमाई समेटकर रफूचक्कर हो गए। पीड़ितों का सवाल: जब महीनों से पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा था, तब स्थानीय खुफिया तंत्र और प्रशासन की आंखें क्यों बंद थीं।

​*किराएदार भागा मकान मालिक की जिम्मेदारी कहा गई* 

​इस पूरे महाघोटाले में सबसे तीखा और गंभीर सवाल उन किरदारों' पर उठ रहा है, जिन्होंने इस अवैध धंधे को फलने-फूलने के लिए अपनी जमीन और साख उधार दी थी। ​कानून का सीधा सिद्धांत यदि किसी अवैध गोदाम, वाहन या भवन से कोई गैरकानूनी धंधा संचालित होता है, तो सबसे पहले उसके मालिक को शिकंजे में लिया जाता है। तो फिर GNS कंपनी के मामले में यह ढिलाई क्यों?

​स्थानीय गलियारों और पीड़ित जनता के बीच यह बात पूरी ताकत से गूंज रही है कि जिस आलीशान भवन से इस ठगी के साम्राज्य को चलाया जा रहा था, वह धनपुरी नगरपालिका परिषद के उपाध्यक्ष और रसूखदार कांग्रेस नेता हनुमान खंडेलवाल का है। ​क्या एक जिम्मेदार जनप्रतिनिधि को यह भनक तक नहीं थी कि उनके भवन में करोड़ों के वारे-न्यारे हो रहे हैं। ​क्या यह सिर्फ एक साधारण 'मकान-किराएदार' का रिश्ता था, या इसके पीछे संरक्षण और हिस्सेदारी का कोई गहरा खेल है?

​जनता मांग कर रही है कि जांच की सुई जब तक इस रसूखदार चौखट तक नहीं पहुंचेगी, तब तक इंसाफ की उम्मीद बेमानी है। (हालांकि, जब तक कोई सक्षम एजेंसी या अदालत इस पर मुहर नहीं लगाती, तब तक निष्पक्षता के नाते उनका पक्ष भी सामने आना जरूरी है—लेकिन जांच से परहेज क्यों?

*​सोया रह गया पुलिस प्रशासन*

​निवेशकों का सीधा आरोप है कि कंपनी के खिलाफ शिकायतें नई नहीं थीं। शुरुआती स्तर पर ही अगर प्रशासन ने अपनी चमचमाती गाड़ियों से उतरकर इन दफ्तरों की थोड़ी भी स्क्रूटनी की होती, तो आज हजारों घर बर्बाद होने से बच जाते।

​किसकी कमाई डूबी? इसमें किसी बड़े पूंजीपति का पैसा नहीं है। इसमें खेतों में पसीना बहाने वाले किसान, दिहाड़ी मजदूर, छोटे व्यापारी, अपनी पेंशन का एक-एक पैसा जोड़ने वाले बुजुर्ग और घर चलाने वाली महिलाएं शामिल हैं। कई लोगों ने अपनी पैतृक जमीनें बेचकर और रिटायरमेंट फंड इस उम्मीद में लगा दिया था कि बच्चों का भविष्य सुधरेगा। आज वे थानों और दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर अपनी चप्पलें घिस रहे हैं।

​*एजेंटों' की कार्रवाई से काम नहीं चलेगा*

​पीड़ितों और सामाजिक संगठनों ने अब आर-पार की लड़ाई का मूड बना लिया है। उनकी मांगें बिल्कुल साफ और आक्रामक हैं। डायरेक्टरों के साथ संरक्षकों की भी हो गिरफ्तारी। जांच का दायरा केवल यादव बंधुओं तक सीमित न रहे। उन्हें वर्षों तक 'अभयदान' देने वाले हर सफेदपोश की भूमिका खंगाली जाए। इस 500 करोड़ की राशि को किन-किन बैंक खातों में ट्रांसफर किया गया, किन बेनामी संपत्तियों में निवेश किया गया, इसकी फोरेंसिक ऑडिट हो।

​आरोपियों और उनके करीबियों की चल-अचल संपत्तियों को अविलंब कुर्क कर निवेशकों की पाई-पाई की रिकवरी की जाए।  जिन अधिकारियों की नाक के नीचे यह समानांतर बैंकिंग सिस्टम चल रहा था, उन पर भी लापरवाही की गाज गिरे।

​*परीक्षा की घड़ी में जांच एजेंसियां*

​बुढार-धनपुरी का यह कथित घोटाला अब महज एक आर्थिक अपराध नहीं रह गया है। यह शहडोल के पुलिस-प्रशासन की साख, रसूखदारों के दबाव के आगे कानून की ताकत और आम जनता के बचे-खुचे भरोसे की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है।

​क्या शहडोल पुलिस केवल 'भगोड़े' मोहरों की तलाश का नाटक करती रहेगी, या फिर उन असली 'शतरंज के खिलाड़ियों' के गिरेबान तक हाथ डालेगी जो शहर में ही बैठकर सत्ता और रसूख का लुत्फ उठा रहे हैं? जनता की नजरें टिकी हैं, और आक्रोश का लावा कभी भी फूट सकता है।

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