नदी का पानी बना जहर, सोन को कौन पिला रहा है, केमिकल वाला शरबत, नगर परिषद व ओपीएम के बीच छिड़ी जंग
पार्षद ने अनशन चेतावनी देकर कलेक्टर के यहाँ की थी शिकायत, प्रशासन ने नही की कार्यवाही*
शहडोल
सोन नदी में बढ़ते प्रदूषण को लेकर उठे सवाल अब आरोप-प्रत्यारोप के बीच और गहराते जा रहे हैं। एक ओर सामाजिक कार्यकर्ता अवधेश पांडे ने इस गंभीर मुद्दे को उठाते हुए मध्यप्रदेश राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, शहडोल के क्षेत्रीय अधिकारी को पत्र लिखकर जांच और कार्रवाई की मांग की है, वहीं दूसरी ओर मामले में जिम्मेदारी तय करने को लेकर मिल प्रबंधन और नगर परिषद के बीच बयानबाजी शुरू हो गई है।
सामाजिक कार्यकर्ता अवधेश पांडे ने अपने पत्र में अमलाई स्थित ओरिएंट पेपर मिल से निकलने वाले रसायनयुक्त अपशिष्ट पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि इस अपशिष्ट के कारण सोन नदी का जल लगातार प्रदूषित हो रहा है, जिससे जलीय जीवों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है और आसपास के ग्रामीणों के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि समय रहते इस पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले समय में स्थिति और भयावह हो सकती है। पांडे ने अपशिष्ट जल के शोधन के लिए स्थापित एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (ईटीपी) की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करते हुए मौके पर निरीक्षण और सख्त कार्रवाई की मांग की है।
*अब ‘पानी’ पर शुरू हुआ पेंच*
मामला तब और दिलचस्प हो गया, जब इस संबंध में ओरिएंट पेपर मिल (ओपीएम) प्रबंधन से बात की गई। मिल प्रबंधन ने साफ तौर पर कहा कि नदी में जा रहा पानी फैक्ट्री का रासायनिक अपशिष्ट नहीं है, बल्कि आसपास की कालोनियों से निकलने वाला उपयोग किया गया घरेलू पानी है। उनका कहना है कि इस पानी के उपचार और प्रबंधन की जिम्मेदारी नगर परिषद बकहो की है, न कि फैक्ट्री की।
*नगर परिषद ने पलटा खेल*
मिल प्रबंधन के इस दावे को नगर परिषद बकहो के जिम्मेदारों ने सिरे से खारिज कर दिया। उनका कहना है कि नदी में बह रहा पानी केमिकल युक्त है और यह सीधे तौर पर फैक्ट्री से ही निकल रहा है। परिषद के अनुसार, घरेलू उपयोग का पानी इस स्तर का प्रदूषण नहीं फैला सकता।
*स्थानीय लोगों की गवाही भी अहम*
इस पूरे विवाद के बीच स्थानीय नागरिकों की राय भी सामने आई है, जो स्थिति को और स्पष्ट करती है। ग्रामीणों का कहना है कि वे लंबे समय से देख रहे हैं कि फैक्ट्री क्षेत्र से निकलने वाला गंदा और दुर्गंधयुक्त पानी नदी में मिल रहा है। उनका दावा है कि यह पानी सामान्य घरेलू अपशिष्ट नहीं, बल्कि रसायनयुक्त औद्योगिक अपशिष्ट है। ग्रामीणों ने बताया कि नदी का पानी अब पहले जैसा साफ नहीं रहा और इसका असर खेती, पेयजल और पशुओं के स्वास्थ्य पर भी दिखने लगा है। कई लोगों ने जलजनित बीमारियों की आशंका भी जताई है।
*जांच की मांग तेज*
अवधेश पांडे ने अपने पत्र में स्पष्ट रूप से मांग की है कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी मौके पर जाकर पारदर्शिता के साथ वास्तविक स्थिति की जांच करें और यह सुनिश्चित करें कि पर्यावरणीय मानकों का पालन हो रहा है या नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि बिना शोधन के किसी भी प्रकार का अपशिष्ट नदी में छोड़ा जाना पूरी तरह प्रतिबंधित होना चाहिए।
*इनका कहना है*
इस विषय में शिकायत प्राप्त हुई है,जांच दल गठित कर मामले की जांच करवाई जाएगी, जहां तक मुझे मालूम है कि पानी नरगड़ा नाले और सोन नदी में नहीं जा रहा है।
अशोक तिवारी, क्षेत्रीय अधिकारी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, शहडोल
"जहां की आप बात कर रहे हैं ,वहां मिल द्वारा पानी नहीं छोड़ा जाता,यह पूरा पानी कालोनियों का है ,जहां घरों का उपयोग किया पानी जाता है, पहले भी शिकायतें होती रहीं हैं ,लोग ब्लैकमेल करते हैं"
*रवि शर्मा , पीआरओ, ओपीएम अमलाई*
इस संबंध में नगर परिषद के पार्षद रामशरण चौधरी के द्वारा कलेक्टर शहडोल के समक्ष शिकायत की गई थी , और इस प्रदूषित पानी को रोकने के लिए अनशन की चेतावनी भी दी गई थी,लेकिन मिल प्रबंधन की ओर से आज तक इस पानी पर रोक नहीं लगाई गई और न प्रशासन ने सुध ली । प्रबंधन द्वारा यह कहना कि यह कालोनी के मकानों का पानी है सरासर गलत है ,यह प्रदूषित पानी मिल के द्वारा छोड़ कर नगर में प्रदूषण का जहर घोला जा रहा है।"
मौसमी केवट, अध्यक्ष नगर परिषद , बकहो